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घाटी के निकाय चुनाव से मिले संकेतों को समझने की जरूरत

ज्ममू-कश्मीर में निकाय चुनाव

जम्मू-कश्मीर में हाल में संपन्न स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी मिली-जुली रही। लद्दाख क्षेत्र में जहां 60 प्रतिशत मतदान हुआ, वहीं जम्मू में इसका प्रतिशत 70 रहा। कश्मीर घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत अलग-अलग रहा और उनका औसत लगभग 4.5 प्रतिशत रहा। राज्य के भीतर मतदान के प्रतिशत में इतना विशाल अंतर क्षेत्र में व्याप्त विषमता और असहमति प्रदर्शित करता है। जम्मू एवं लद्दाख अलग राज्य या संघ शासित प्रदेश बन जाने के ज्यादा इच्छुक होंगे, बजाए जम्मू एवं कश्मीर का एक हिस्सा बने रहने के।





घाटी के भीतर भी मतदान के पैटर्न में फर्क रहा। दक्षिण कश्मीर में मतदान लगभग शून्य रहा जहां आतंकियों की संख्या अधिक बताई जाती है। वहां केवल 1.2 प्रतिशत मत डाले गए और लगभग 20 नगरपालिकाओं में कोई भी उम्मीदवार नहीं था। मध्य कश्मीर में मिला-जुला प्रतिशत रहा। बडगाम में 17 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड किया गया जबकि कश्मीर क्षेत्र में सबसे कम लगभग 3 प्रतिशत मत डाले गए। औसत मतदान पांच प्रतिशत के लगभग रहा। उत्तर कश्मीर 16 प्रतिशत के साथ सर्वाधिक मतदान वाला क्षेत्र रहा। इस क्षेत्र के सोपोर में 3 प्रतिशत डाले गए जबकि कुपवाड़ा में यह लगभग 36 प्रतिशत के करीब रहा।

इन चुनावों के नतीजों के विश्लेषण से कुछ रुझानों का संकेत मिलेगा जिनका भविष्य में उपयोग किया जा सकता है। पहली बात यह कि बहिष्कार की अपील ने घाटी के केवल कुछ ही हिस्सों को प्रभावित किया। इस प्रकार अलगाववादियों का गढ़ माने जाने वाली जगहों में कमी आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका प्रभाव केवल दक्षिण कश्मीर एवं श्रीनगर तथा सोपोर सहित कुछ अन्य क्षेत्रों तक सीमित रह गया है। आम कश्मीरी हड़तालों तथा बंद की अपीलों से त्रस्त आ चुका है। उसे अब अमन और विकास की दरकार है। दूसरी बात यह कि पीडीपी एवं एनसी द्वारा भागीदारी न करने का असर पूरे राज्य के मतदाताओं पर नहीं पड़ा। भविष्य में ऐसे फैसले करने से पहले ये पार्टियां सावधान हो जाएंगी।

घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में मतदान में रहे विशाल अंतर की कई वजहें थीं जिनमें आतंकवादियों की धमकी सबसे प्रमुख कारणों में एक था। इसका सर्वाधिक असर दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले दक्षिण कश्मीर में अधिक नजर आया। घाटी की दो प्रमुख सियासी पार्टियों ने अनुच्छेद 35 ए पर केंद्र सरकार द्वारा अपने रुख को स्पष्ट किए जाने के विरोध के बहाने से चुनावों का बहिष्कार किया जिसे वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है। दूसरी वजह आतंकवादियों की धमकियों के कारण उनके कार्यकर्ता चुनाव लड़ने से खौफजदा थे।

इन दलों के चुनाव में भाग न लेने से कई नए योग्य स्वतंत्र उम्मीदवारों ने चुनाव में भाग लिया और जीते। उन्होंने यह संदेश दिया कि क्षेत्र के लोगों की सेवा करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका राजनीति में शामिल होना और विकास की प्रक्रिया में भाग लेना है। उन्होंने अपनी जान पर आसन्न खतरे के बावजूद चुनाव में भाग लिया।

इन चुनावों ने घाटी में भाजपा के लिए दरवाजे खोल दिए जो मुख्यधारा की सियासी पार्टियों के चुनाव में भाग लेने पर शायद मुमकिन नहीं हो पाता। घाटी के कुछ हिस्सों में मतदान के अधिक प्रतिशत से यह संकेत भी मिला कि आम लोगों का विश्वास लोकतांत्रिक प्रक्रिया में है। इन चुनावों ने आतंकियों की बंदूकों के बजाए अमन चाहने की उनकी इच्छा भी स्पष्ट रूप से जाहिर की। उन जगहों को छोड़कर, जहां आतंकियों की धमकियों के कारण उनके जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से खतरा था, लोग अच्छी खासी संख्या में मतदान में भाग लेने के लिए अपने घरों से बाहर निकले और वोट डाला। इसने पिछले लोकसभा चुनावों में मतदान के कम प्रतिशत की धारणा को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया।

सुरक्षा बलों की भारी तैनाती और चुनाव से पूर्व सीमित घेरा और खोज अभियानों से भी माहौल बदला और सुरक्षा एजेन्सियों के प्रति विश्वास बढ़ा। अगर सरकार इसी भावना से काम करे तो राज्य में अमन चैन बहाल होना मुश्किल नहीं है।

चुनावों का सफलतापूर्वक संपन्न हो जाना इस बात का संकेत था कि अगर मजबूर न किया जाए तो स्थानीय निवासी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए काफी इच्छुक हैं और उनका राष्ट्रीय नेतृत्व में भी विश्वास बना हुआ है। मीडिया द्वारा जो भी छवि प्रस्तुत की जा रही है वह घाटी में राष्ट्रविरोधी रुझान प्रदर्शित कर अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने की मंशा से की जा रही है और उसमें निश्चित रूप से बदलाव लाया जाना चाहिए। सुरक्षा बल माहौल में बदलाव लाने में सफल रहे हैं जैसाकि क्षेत्र के बड़े हिस्से में माहौल बदला दिख रहा है और ऐसा वे लगातार करते रहेंगे।

घाटी स्थित सियासी पार्टियों और अलगाववादियों को, जो स्वायत्ता और आजादी की मांग कर रहे हैं, घाटी में हुए इस चुनाव से संकेत प्राप्त करना चाहिए और अहसास करना चाहिए कि वे जो प्रदर्शित करते हैं, हकीकत उससे अलग है। कुछ युवा उनकी अपीलों के प्रभाव में आ सकते हैं, पर ज्यादातर पर उनका असर नहीं है। पाकिस्तान को भी क्षेत्र की वास्तविकता के प्रति अपनी आंखें खोलनी चाहिए और यह समझना चाहिए कि दक्षिण कश्मीर के कुछ जिलों को छोड़कर, जहां आतंकवाद अभी कायम है, दूसरे ज्यादातर क्षेत्र विकास और अमन चाहते हैं और उनकी ख्वाहिश भारतीय बने रहने की है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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