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पुलवामा घटना के बाद सधे कदमों से तेज चलने की जरूरत

CRPF के काफिले पर हमला

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हालिया हमला हाल के दिनों का सबसे बड़ा हमला है। पूरा देश बदले की आग में सुलग रहा है। यह पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं था। मैंने पिछले कुछ महीनों के दौरान कई अवसरों पर लिखा भी था कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं पाक कोई हमला करने के द्वारा सियासी फसाने को बदलने की कोशिश करेगा। फिलहाल सभी राजनीतिक दल एक साथ खड़े हैं, हालांकि आरोप-प्रत्यारोप का दौर एक सप्ताह के बाद शुरू हो जाएगा।





पाकिस्तान की यही मंशा थी भी। वह भारत में किसी ताकतवर नेता, जिसने अंतरराष्ट्रीय माहौल में भारत की छवि मजबूत बनाई है, से उलट एक कमजोर गठबंधन सरकार देखना चाहता है। जल्द ही हर सियासी दल इस हमले का इस्तेमाल भाजपा को निशाना बनाने के लिए करेगा। यह सरकार को हड़बड़ी में प्रतिशोध का कोई कदम उठाने के लिए बाध्य कर सकता है जिसका अगर किसी वजह से कोई वांछित परिणाम नहीं निकला तो उससे लाभ के बजाये नुकसान अधिक हो सकता है। इसलिए  राष्ट्रीय स्तर पर परिपक्वता प्रदर्शित करना जरूरी है।

हालांकि सरकार ने अपने पहले कदम के रूप में पाकिस्तान को सर्वाधिक वरीयता वाले देश (एमएफएन) का दर्जा हटा दिया है, लेकिन इसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे व्यापार सीमित हो सकता है जिससे केवल कुछ ही तबके प्रभावित होंगे लेकिन यह पहले कदमों में से एक है जो सरकार को उठाना चाहिए था। इसी प्रकार वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) के लिए डोसियर तैयार करना भी एक कदम है , जिसकी पाकिस्तान को लेकर समीक्षा बैठक आरंभ हो चुकी है और यह भी पाकिस्तान के दर्जे को और नीचा (ग्रेट से ब्लैक) कर देगी। भले ही ऐसा न हो लेकिन इससे निवेशक कंपनियों और देशों के बीच उसकी कमतर स्थिति जरूर सुनिश्चित होगी।

कूटनीतिक रूप से इन कदमों में इस संदेश को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में फैलाये जाने से पहले  भारत सरकार द्वारा पाक को आतंकवाद का समर्थक घोषित किया जाना शामिल है। इसका प्रमुख निहितार्थ फिलहाल बातचीत के लिए सभी विकल्पों को बंद कर देना है जो फिलहाल वैसे भी योजना में नहीं है। इन कदमों में पाकिस्तान सैन्य कर्मचारियों को निर्वासित करने सहित दोनों ही देशों द्वारा दूतावासों में कर्मचारियों में कमी करना भी शामिल है। करतारपुर पर चर्चाओं को भी पीछे धकेल दिए जाने की जरूरत है। इससे एक मजबूत संदेश जाएगा।

भारत का लक्ष्य एक मजबूत प्रत्युत्तर देने में ईरान को हाथ मिलाने के लिए आश्वस्त करना होना चाहिए क्योंकि उनके सुरक्षा बलों पर भी लगभग ठीक उसी समय और उसी प्रकार हमला किया गया था जैसे अभी पुलवामा में किया गया। भारत को बलूच स्वतंत्रता संग्राम सहित पाकिस्तान के भीतर अलगाववादी आंदोलनों का समर्थन करना चाहिए।

इस बात के आसार नहीं हैं कि अमेरिका और चीन पाकिस्तान के खिलाफ कोई मजबूत कार्रवाई करेगा क्यांकि दोनों ही अपने अपने निजी कारणों से पाकिस्तान के साथ गलबहियां कर रहे हैं। अमेरिका तालिबान के साथ बातचीत करने के लिए एवं चीन पाकिस्तान में अपने भारी निवेश के कारण। अरब के देश भी पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाएंगे क्योंकि पाकिस्तान का एक पूर्व सेना प्रमुख 41 देशों की सेना के गठबंधन का प्रमुख है। इसलिए सभी प्रयासों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दबाव बहुत कारगर साबित नहीं होगा।

सैन्य लिहाज से पाक को इस प्रकार निशाना बनाने का लक्ष्य होना चाहिए कि उनकी सेना पर प्रभाव पड़े। यह ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिसका पाक खंडन कर सके जैसाकि उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त किया था। यह पाक की जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए इसलिए इसे अधिक गहराई से और अधिक जोखिम उठा कर किया जाना चाहिए। अगर पाक को जवाबी कार्रवाई करने पर मजबूर किया जाता है तो होने दिया जाए। नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर की जाने वाली कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नहीं बढ़ सकती क्योंकि नियंत्रण रेखा बदल भी सकती है।

घाटी के भीतर  अलगाववादियों को दी जाने वाली सभी सुविधाएं पहले ही वापस ले ली गई है। वे दावा कर सकते हैं कि उन्होंने ये सुविधाएं नहीं मांगी थीं लेकिन चिकित्सा उपचार एवं वायु यात्रा सहित उन्होंने इसका भरपूर लाभ उठाया है। उनके धन के स्रोत की जांच अवश्य होनी चाहिए। घाटी में सभी प्रकार के राष्ट्र विरोधी तत्वों पर निश्चित रूप से दबाव डाला जाना चाहिए और उनकी आजादी पर अंकुश लगाया जाना चाहिए।

आंतरिक रूप से  सरकार तथा विपक्षी दलों को स्ट्राइक का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए नहीं करना चाहिए। इसका लाभ उठाने की कोशिशें पाक के हाथों में खेलने के बराबर होगा। ऐसा ही दुष्परिणाम स्थानीय कश्मीरियों तथा भारत के विभिन्न हिस्सों में तालीम हासिल करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भी हासिल होगा। ऐसा ही मंसूबा पाकिस्तान और भारत में स्थित उसके छद्म समर्थकों ने पाल रखा है। आत्मघाती हमले में मारे गए जवानों को श्रद्धांजलि दे रहे राष्ट्र को सरकार पर हड़बड़ी में कोई कदम उठाने का दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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