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केंद्रीय पुलिस बल संगठनों के नेतृत्व में बदलाव की जरूरत

CAPF
फाइल फोटो

विभिन्न प्रकार के कार्यों में लगे किसी भी सुरक्षा संगठन को सफल होने के लिए एक दृढ़ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। आदर्श स्थिति यह है कि नेतृत्व को नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना चाहिए जिसमें ऊपर की ओर बढ़ने वाले व्यक्ति को जमीनी स्तर पर कठिनाईयों एवं दबावों का अनुभव रहना चाहिए और इस प्रकार उसे ऐसे लोगों की बेहतर समझ भी होनी चाहिए जिन पर अंततोगत्वा उसे कमान करना है। यही वह अंतर है जो केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के संग्रह और सेना के प्रदर्शन को अलग करता है। हालांकि इस सभी संगठनों के लिए जवान लगभग एक जैसे ही होते हैं, लगभग एक ही प्रकार के प्रशिक्षण से गुजरते हैं और जम्मू-कश्मीर घाटी तथा उत्तर पूर्व में आतंक विरोधी अभियानों में संयुक्त रूप से कार्य करते हैं।





सशस्त्र बल ही एकमात्र ऐसा संगठन है जिसमें कोई बगैर उचित प्रक्रिया का पालन किए या बिना मेहनत के नहीं आ सकता। जो नीचे से उठ कर ऊंचाई तक पहुंचते हैं  वे अपनी टुकडि़यों के साथ साथ खुद मेहनत करते हैं, एक ही प्रकार की सुविधाओं का लाभ उठाते हैं और समान प्रकार के खतरे मोल लेते हैं। वे टुकडि़यों का नेतृत्व करते हैं और खुद भी अपने सीनियरों की अगुवाई में काम कर चुके होते हैं। सरल तरीके से कहा जाए तो यह ऐसा एकमात्र संगठन है जो लीडर बनाता है और लीडरों का नेतृत्व करता है।

इसलिए इसमें हमेशा अधिक मिलनसार होने का स्वभाव और आपसी समझ होती है। यह नेतृत्व में विश्वास और भरोसे का निर्माण करती है, आदेशों की स्वीकृति को आसान बनाती है और सौहार्द तथा बलिदान की भावना को आत्मसात करती है। यहां तक कि दूसरी बटालियन या रेजीमेंट के कमान अधिकारी को भी टुकड़ी द्वारा स्वीकार करने से पहले खुद को साबित करना पड़ता है।

दूसरी तरफ सीएपीएफ के अपने कैडर की ही अनदेखी होती है जब उन्हें आईपीएस से भर्ती को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बचने की यह भावना सीधे सेना के ऊंचे रैंक से आती है। ऐसे लोगों में जिन्हें शामिल किया गया है, किसी ने भी उन जवानों के साथ कभी काम नहीं किया होता है जिन पर उनसे कमान करने की अपेक्षा की जाती है, उन्हें जमीनी हकीकत का कोई पता नहीं होता और वे सैन्य टुकडि़यों से कटे हुए होते हैं। जो लोग सीएपीएफ में प्रवेश करने में सफल हो जाते हैं, उन्होंने केवल राज्य पुलिस स्तर में काम किया होता है, उनके पास उस माहौल का अनुभव और समझ नहीं होती जहां सीएपीएफ संचालित होता है। ऊपरी रैंक में इस समावेश का इस श्रृंखला में नीचे तक प्रभाव पड़ता है।

ऐसा देखा गया है कि सीएपीएफ में कनिष्ठ नेतृत्व मजबूत और आदर्श होता है लेकिन उनके एवं उनके वरिष्ठ अधिकारियों के बीच का अंतराल बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि सीनियर अधिकारियों में इन संगठनों को लेकर सीमित समझ होती है। अधिकारियों को ऊपर से लाए जाने से अधिकारी कैडर का हौसला भी प्रभावित होता है। उन्हें पता होता है कि अपनी काबिलियत और प्रदर्शन के बावजूद वे कभी भी शीर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे क्योंकि वह पद आईपीएस के लिए आरक्षित होता है। इस प्रणाली के खिलाफ नाराजगी का इजहार निचले स्तर के अधिकारियों द्वारा नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें भी उसी प्रक्रिया से गुजरना होता है जिन्हें वे नामंजूर करना चाहते हैं।

ऐसा संभव है कि आरंभ में यह प्रणाली इसलिए बनाई गई हो क्योंकि इस संगठन में आवश्यक स्तर पर इसके अपने सीनियर कैडर की कमी थी  क्योंकि ये पद ज्यादातर आजादी के बाद गठित किए गए थे। समय गुजरने के साथ बल की ताकत कई गुना बढ़ती गई और इसके साथ साथ इसका अपना कैडर भी हो गया। अधिकारी कैडर को पर्याप्त जमीनी अनुभव प्राप्त हो गया है और उन्होंने सफलतापूर्वक ऑपरेशनों में अपनी कमान का नेतृत्व किया है, इसलिए वे इसी सोपान पर आगे चढ़ने और अपने खुद के संगठनों की कमान करने के सर्वथा योग्य हैं।

किसी भी संगठन का प्रदर्शन उसके शीर्ष नेतृत्व की प्रकृति से उत्पन्न होता है। अगर वही कमजोर, नापसंद, नावाकिफ और दूसरे कैडर से उनके ऊपर से लादा हुआ है तो हमेशा ही भरोसे की कमी रहेगी जिससे प्रदर्शन प्रभावित होगा। अगर नेतृत्व अपने भीतर से उठ कर आता है तो प्रदर्शन में बहुत बड़ा अंतर दिखेगा।

इसलिए सीएपीएफ के नेतृत्व स्तरों में सुधार लाने के दो विकल्प बच जाते हैं। पहला यह है कि अगर इसी प्रक्रिया को जारी रखा जाना है तो प्रत्येक आईपीएस अधिकारी को अनिवार्य रूप से अराजकता विरोधी मुहिमों में तैनात किसी सीएपीएफ बटालियनों में कंपनी कमांडर के रूप में एक निश्चित कार्यकाल तक काम करना चाहिए। केवल इस प्रकार के कार्य अनुभव प्राप्त लोगों को ही बाद में इसमें शामिल किया जाना चाहिए। दूसरा विकल्प, किसी और संगठन से शीर्ष पद पर लाकर बिठाने की इस पद्धति को रद्द कर देने और खुद सीएपीएफ के कैडर को पदोन्नत करना है।

सरकार को निश्चित रूप से सीएपीएफ के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए और उन्हें केवल आईपीएस का विशिष्ट अधिकार समझना तथा उनके साथ एक दूसरी श्रेणी के बल के रूप में बर्ताव करना छोड़ देना चाहिए। उनके अपने कैडर अब बलों को कमान करने में सक्षम हैं और उन्हें आवश्यक अवसर दिया जाना चाहिए। आईपीएस को राज्य स्तर पर उनके अपने संगठन को संचालित करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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