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नक्सलियों की कमर टूटी, पर और अलर्ट रहने की जरूरत

जंगल में नक्सली
जंगल में नक्सली (प्रतीकात्मक)

बेशक यह खबर राहत देने वाली है कि गत चार वर्षों में नक्सली हिंसा के विस्तार में उल्लेखनीय ढंग से कमी आई है और केन्द्र सरकार ने 126 में 44 जिलों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया है। पर साथ में यह खबर परेशान करने वाली है कि देश के आठ ऐसे नए जिले हैं जहां नक्सली अपना आधार बनाने में जुटे हैं। इनमें तीन जिले केरल के हैं-मलप्पुरम, पलक्कड़ औऱ वायनाड। अन्य पांच जिलों में दो बिहार (नवादा और मुजफ्फरपुर) तथा झारखंड के तीन जिले (दुमका, सिंहभूम और रामगढ़) शामिल हैं।





यह सही है कि नक्सली हिंसा से प्रभावित तमाम इलाका या तो सामान्य हो गया है या फिर वहां उनके पांव उखड़कर उनकी मौजूदगी नाम मात्र का बताने की रह गई है। इसका सारा श्रेय उचित कार्यनीति, सही रणनीति तथा सुरक्षाबलों को जाता है जिन्होंने लगातार सर्च अभियान, सशक्त ऑपरेशन के जरिए नक्सलियों और उनके नुमाइंदों की कमर तोड़ दी है। रात-दिन अंधेरे खतरनाक जंगलों में रहकर नक्सलियों की चालबाजियों, कारस्तानियों के बीच शहादत दी और जता दिया कि संविधान, कानून से बढ़कर कोई नहीं। सुरक्षा बलों की मुस्तैद तैनाती के अलावा दूसरा बड़ा कारण है विकास योजनाओं की तेज शुरुआत। विकास योजनाओं के शुरू हो जाने के बाद नक्सल प्रभावित जिलों का तमाम हिस्सा व अधिकांश आबादी मुख्य़धारा से जुड़ी और उसने नक्सलियों की बात को कम और विकास की बात को ज्यादा तरजीह दी। इसी बात का प्रतिफल सबके सामने है। इन इलाकों में सड़क व पुल निर्माण, टेलीफोन टॉवर लग जाने से संचार व्यवस्था में तेजी आई तथा पल-पल की खबर से नक्सलियों की निशानदेही से सुरक्षा बलों और पुलिस को काम करने में आसानी हुई। ऐसे ही कार्यों को अभी इसी रफ्तार के साथ काम करते रहने की जरूरत है।

नक्सलियों की कमर तोड़ने और कुछ इलाकों में उनका जमीनी आधार खत्म करने में एक बात और महत्वपूर्ण रही। वह है ITBP तथा CRPF की नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों को शिक्षा तथा रोजगार से जोड़ने की पहल। दोनों सशस्त्र बलों ने छत्तीसगढ़ व झारखंड के सैकड़ों गांव में स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत किशोरों, युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा है। इसी पहल को पूरे जोर-शोर के साथ देश के अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और नए चिह्नित जिलों में अविलंब शुरू करने की जरूरत है ताकि नक्सलवाद का सांप कुंडली मारकर अपना फन न उठा सके। हमें यह समझना होगा कि उचित शिक्षा और हाथों को काम देने वाला रोजगार जिंदगी को सरल सुगम बनाकर युवाओं को समाज और देश के प्रति जिम्मेदार बनाता है। इसी कार्य की दरकार सरकारों और जिला प्रशासन से है।

लिहाजा मौजूदा हालात में सरकारों, सुरक्षा तंत्र से जुड़ी एजेंसियों तथा सुरक्षा बलों को अपनी अब तक की कामयाबी के दायरे को और बढ़ाना होगा। नक्सलियों से मुठभेड़ का पुराना अनुभव यह बताता है कि वे कई बार अपनी रणनीति के तहत कुछ इलाकों में कई महीनों तक चुप होकर बैठ जाते हैं और बाद में बदले की भावना से जानलेवा हमला करते हैं। यह बात सुरक्षा एजेंसियों को भली-भांति समझनी होगी। जिन ऩए जिलों में नक्सली अपनी नई जमीन तलाश रहे हैं अथवा काबिज होना चाहते हैं वहां स्थानीय पुलिस को हर वक्त अलर्ट रहने की जरूरत है। आखिर बिना पुलिस के संज्ञान में आये नक्सली भला कैसे अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं? इन सशस्त्र विद्रोहियों की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसलिए केन्द्र से लेकर तहसील, ब्लॉक व गांव स्तर तक एक मजबूत निगरानी तंत्र भी विकसित करने की आवश्यकता है।

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