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हताशा के दौर से गुजर रहे हैं नक्सली

नक्सली

यूं तो सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाइयों, पुलिस के बढ़ते दबाव तथा स्थानीय नागरिकों का साथ न देने से देश के विभिन्न राज्यों में नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र सिमटता जा रहा है। लेकिन बीते 15-20 दिनों में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस तरह एक के बाद एक तीन हमले किए हैं, वह उनकी निराशा, हताशा को दर्शाता है। और यह जताता है कि उनके पांव उखड़ चुके हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली नहीं चाहते कि वहां चुनाव हो, लोकतंत्र की स्थापना हो। उन्हें लगता है कि यदि ठीक-ठाक तरह से राज्य के विधानसभा के चुनाव संपन्न हो गए तो चुनाव बाद की स्थितियां उनका जीना हराम कर देंगी और वह तेजी से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने के लिए विवश हो जाएंगे। इसलिए वह आतंक का सहारा लेकर लोकतंत्र का गला घोंटना चाहते हैं। वह स्थानीय मतदाताओं को डरा-धमका रहे हैं, चेतावनी दे रहे हैं कि मतदान बुतों पर न जाएं। सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं। राज्य में दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं- 12 नवंबर और 20 नवंबर। कहा जा रहा है कि नक्सलियों के लिए यह आर-पार की लड़ाई है लिहाजा वह लगातार खून-खराबे से भरा रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। वह जान रहे हैं कि बाजी हाथ से निकल रही है।





दूसरी तरफ चार दिन पहले छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में 62 हथियारबंद नक्सलियों द्वारा किए गए आत्म- समर्पण से इस इलाके के नक्सली नेता बौखलाए हुए हैं। उन्हें लग रहा है कि शासन, प्रशासन व केंद्र ने उनकी रणनीति पर पानी फेर दिया है। यह अलग बात है कि इन 62 नक्सलियों के आत्म समर्पण की वजह नक्सली संगठन में आपसी फूट और स्थानीय नागरिकों से मिल रहा असहयोग है। शहर में रह रहे तथा अपने बच्चों की पढ़ाई विदेश में करवा रहे नक्सलियों के आकाओं को लग चुका है कि घने जंगलों के बीच बसी आबादी में उनका आधार बिखर गया है।

सुकमा में नक्सली

इन हालात के बीच एक गंभीर सवाल यह भी है कि आखिर चुनाव के इस दौर में नक्सलियों या नक्सलवाद के नाम पर राजनीति क्यों की जा रही है? राजनेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर आजाद भारत के बाद भी चुनाव होते रहे हैं, सरकारें बनती रही है और विकास से जुड़े काम होते रहे हैं। अगर स्थानीय युवाओं ने किन्हीं कारणोंवश हाथ में बंदूक लेकर अपनी समस्या का हल खोजने का खून-खराबे भरा रास्ता चुना है तो क्या यह सही है? लोकतंत्र में मुख्य धारा में शामिल होने का ये रास्ता तो कदापि नहीं है। इन परिस्थितियों के बीच देश की एक बड़ी जिम्मेदार राजनीतिक दल के एक जिम्मेदार पद पर बैठे नेता भला कैसे नक्सलियों को क्रांतिकारी कह सकते हैं।

केंद्र व राज्य सरकारों के लगातार प्रयासों का ही प्रतिफल है कि देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित 35 जिलों के किशोर व युवा मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं। उन्हें नौकरी के लिए हुनरमंद व कौशलयुक्त बनाया जा रहा है। वह रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों का प्राशिक्षण पाकर बारोजगार हो रहे हैं। सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) आदि की पहल का परिणाम है कि स्थानीय युवक-युवतियां सुरक्षा बलों में तैनात होकर देश व समाज की रक्षा-सुरक्षा कर रही हैं। सरकार के इन्हीं अभियानों को हथियारबंद नक्सली पसंद नहीं कर रहे, इसीलिए वह लोकतंत्र की हत्या करने पर आमादा हैं। पिछली 30 अक्टूबर को दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में नक्सली हमले में डीडी न्यूज के कैमरामैन अच्चुतानंद की हुई मौत को इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। ऐसे में नक्सलवाद पर हर राजनीतिक दल को राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति करने की जरूरत है। यह मसला राज्यों तथा देश के विकास व समृद्धि से जुड़ा है। यहां के युवक-युवतियां बंदूक- एके 47 नहीं बल्कि कलम-कंप्यूटर पर काम करने के लिए हैं, ऐसी मानसिकता हम सभी को बनानी होगी।

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