vishesh

चुनाव के दौरान नक्सली समस्या पर भी गौर हो

जंगल में नक्सली

देश के कई नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली जिस तरह लोकसभा चुनाव का बहिष्कार कर मतदान प्रक्रिया में बंदूक के जरिए दहशत का सहारा लेकर सनसनी फैला रहे हैं और सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे हैं। उससे लगता है कि वे हताशा के दौर से गुजर रहे हैं। यह भी कहना उचित होगा कि उनका क्षेत्र में आधार खिसक चुका है। केवल अपनी मौजूदगी का एहसास कराने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हाल में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के नक्सल बहुल जिले कांकेर, धमतरी में सुरक्षाबलों को निशाना बनाया जिसमें सीमा सुरक्षा बल के चार जवान तथा सीआरपीएफ का एक जवान शहीद हो गया। यह चिंताजनक है। सूबे की नक्सल प्रभावित कांकेर लोकसभा सीट में इसी महीने 18 अप्रैल को मतदान होना है और राज्य की 11 लोकसभा सीटों के लिए तीन चरणों में 11 अप्रैल, 18 अप्रैल तथा 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। देश के अन्य नक्सली बहुल इलाकों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की सक्रियता अधिक है। मुठभेड़, हिंसा, बारूदी सुरंग बिछाए जाने, नक्सली साहित्य मिलने आदि की तमाम घटनाएं यहां आए दिन सुर्खियों में रहती हैं। कमजोर पड़ने के बावजूद पिछले साल नवंबर में राज्य में विधानसभा चुनाव के दौरान नक्सली एक के बाद एक हमले करने में सफल रहे थे। मौजूदा लोकसभा चुनाव के दौरान हाल की घटनाओं ने इस ओर इशारा किया है कि उनके दुस्साहस का दमन होना अभी बाकी है।





कांकेर में नक्सली हमले में चार बीएसएफ जवानों के शहीद होने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ की उस टिप्पणी पर गौर करना जरूरी है जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में छिपे दुश्मनों से निपटना जरूरी है। सुरक्षाबलों ने पाकिस्तान में संचालित भारत विरोधी आतंकी शिविरों को जमींदोज करने का साहस दिखाया है तो नक्सलवाद से भी निपटा जाएगा। यह सही है कि सख्ती तथा सहानूभुति के आधार पर नक्सली समस्या से निजात पाने में मदद मिल रही है। यहां पर सहानूभुति व हमदर्दी शब्द को रेखांकित करना जरूरी है। सहानूभुति तथा हमदर्दी का आशय नक्सलियों को संविधान के दायरे में बातचीत का आमंत्रण देने तथा मुख्यधारा से जोड़ने से होना चाहिए न कि उन्हें क्रांतिकारी बताने से। जैसा कि पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान छ्त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राजबब्बर नक्सलियों को क्रांतिकारी की श्रेणी में रख रहे थे। कांग्रेस नेता के इस गैरजरूरी बयान पर कांग्रेस पार्टी ने क्यों मौन साधे रखा। समझ से परे है। नक्सलियों की समस्या को समझा जाना तथा उसपर शिद्दत से काम करना बेहद जरूरी है। यह समय की मांग है कि राजनीतिक दलों को आतंकवाद की तरह नक्सलवाद पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए और उससे निपटने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। यह अच्छा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। यह जिला केरल में माओवादियों के लिए गहरे प्रभाव वाले क्षेत्रों में जाना जाता है। हालांकि यहां माओवादी छत्तीसगढ़ और झारखंड की तरह नागरिकों को निशाना नहीं बनाते हैं लेकिन शासन-प्रशासन के लिए चुनौती जरूर हैं। प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष को माओवादियों की समस्या से दो-चार होना पड़ेगा।

दरअसल केंद्र की कई नीतियों, कार्यक्रमों को नक्सल प्रभावित इलाकों में जमीनी स्तर पर उतारे जाने के बाद नक्सलियों का विस्तार क्षेत्र कम हुआ है। इसे लेकर नक्सली आका बौखलाहट में हैं। लेकिन इन सब के बावजूद नक्सलियों को यह बात समझाई जानी चाहिए कि उनका विकास देश की मुख्यधारा से जुड़कर ही संभव है। बातचीत का रास्ता सर्वश्रेष्ठ रास्ता होता है। संविधान तथा कानून के दायरे में बातचीत करने में ही हर समस्या का समाधान निहित है। हाथ में बंदूक थामकर घने जंगलों का रास्ता खून खराबे और बर्बादी का रास्ता है। ये सारी बातें आम चुनाव के दौरान ईमानदारी के साथ नक्सलियों-माओवादियों को राजनीतिक दलों द्वारा पार्टी के घोषणा पत्रों, बहसों, मंचों व सभाओं के माध्यम से समझाए जाने की जरूरत है।

Comments

Most Popular

To Top