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क्या अंतिम दौर में है नक्सलवाद !

जंगल में नक्सली

नक्सली आतंक के लिए कुख्यात छत्तीसगढ़ संभाग की 18 सीटों पर हुए विधानसभा चुनाव के मतदान का प्रतिशत इस ओर इंगित करता है कि वहां का आम नागरिक लोकतंत्र की ओर उत्सुक तथा उन्मुख है। नक्सलियों की लगातार धमकियां कि मतदाताओं की मतदान पहचान की स्याही लगी अंगुली काट दी जाएगी, का असर वोटरों पर नहीं पड़ा और वे पूरे जोश और साहस के साथ लोकतंत्र की नई इबारत लिखने मतदान केंद्रों पर पहुंचे। निश्चय ही यह माओवादियों-नक्सलवादियों की हार है और कहा जा सकता है कि नक्सलवाद अंतिम दौर से गुजर रहा है। हालांकि 12 नवंबर को हुए प्रथम चरण के मतदान के तकरीबन एक पखवाड़े और बाद में भी नक्सलियों ने घातक हमला कर खौफ पैदा करने, सुरक्षाबलों को निशाना बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। उनकी पूरी कोशिश थी कि चुनाव में हर तरह का रोड़ा अटका कर अपना वजूद वह कायम रखें।





दरअसल पिछले कुछ दिनों या यूं कहें कुछ वर्षों से केंद्र, राज्य व सुरक्षाबलों का लगातार यह प्रयास रहा कि देश के करीब 90 जिलों में फैले नक्सलियों का प्रभाव खत्म कर हर हाल में लोकतंत्र कायम किया जाए। भूले-भटके, गुमराह हुए स्थानीय बाशिंदों को मुख्यधारा से जोड़ा जाए। सुरक्षा बलों विशेष रूप से BSF, CRPF, ITBP आदि ने किशोरों-युवाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित कर उन्हें इस प्रकार हुनरबंद कराया कि वे आज प्रदेश और देश में नौकरी कर पा रहे हैं। मतदान का प्रतिशत भी असी बात की तस्दीक कर रहा है। इसी तरह पिछले पखवाड़े छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में 62 हथियारबंद नक्सलियों का आत्मसमर्पण भी इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि वे खून-खराबे और हिंसा की दुनिया को छोड़कर सुकून व विकास के रास्ते पर चलना चाहते हैं।

 

लेकिन इन सब के बीच एक प्रश्न यह खड़ा होता है कि इन चुनाव में लाखों सुरक्षाकर्मियों को क्यों लगाना पड़ रहा है? जबकि खासतौर पर छत्तीसगढ़ सूबे में वर्तमान सरकार लगातार तीन बार से शासन कर रही है। कायदे से तो सरकार को स्थानीय बाशिंदों को मुख्यधारा में शामिल करने की कोशिश लगातार तेज करनी चाहिए थी। उनकी हर बात को संवेदनशील मन से पूरे मनोयोग से सुनना चाहिए था। आंखों से झलकती उनकी व्यथा समझनी चाहिए थी। जल, जमीन, जंगल पर पहला अधिकार उन्हीं का है, कॉरपोरेट घरानों का नहीं। सब का विकास तभी होगा जब हर एक का साथ होगा। पंक्ति में सबसे पीछे खड़े नागरिक की भागीदारी पहले होनी चाहिए थी। रायपुर में केंद्रीय गृहमंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना सही है कि पहले जहां देश के 90 जिले आतंकवाद से प्रभावित थे वे अब सिमट के 11-12 ही रह गए हैं। अगले तीन-पांच वर्षों में नक्सल समस्या का समाधान हो जाएगा।

यह सही है कि नक्सलियों के पांव लगातार सिमटते जा रहे हैं। प्रभावित इलाकों में स्थानीय नागरिकों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश, सड़क निर्माण, संचार माध्यमों की स्थापना आदि से नक्सली आकाओं को सूझ नहीं रहा कि अब वह क्या करें। लिहाजा घातक हमला कर निराशा भरे कदम उठा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि उनसे बातचीत का रास्ता ना केवल खुला रखा जाए बल्कि उन्हें संविधान के दायरे के तहत विकास पथ पर आगे बढ़ने की ओर लगातार प्रेरित भी किया जाए। यह जिम्मेदारी हम सब की है। केवल किसी सुरक्षा बल या सरकार की नहीं।

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