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डीआरडीओ-सेना का बेमेल

DRDO

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने पिछले सप्ताह मरुस्थल की स्थितियों में दो लक्ष्यों पर निशाना भेदने के बाद नाग मिसाइल के सफल प्रक्षेपण की घोषणा की। उसने एक बयान जारी करते हुए कहा ‘ इसके साथ ही, मिसाइलों का विकास परीक्षण संपन्न हो गया है और यह सेना में शामिल किए जाने के लिए तैयार है।





सेना ने इस पर कोई टिपण्णी नहीं की है। यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह सेना द्वारा संचालित परीक्षण था या अकेले डीआरडीओ द्वारा इसका परीक्षण किया गया था। पिछले साल सितंबर में डीआरडीओ ने इसी प्रकार की घोषणा की थी। जब उसने खुद यह बयान दिया कि वह 2018 के आखिर तक विकास परीक्षणों के संपन्न हो जाने की उम्मीद करता है तो सेना ने उसे कड़ी फटकार लगाई थी।

सितंबर में हुए परीक्षणों के बाद सेना इसके थर्मल सेंसरों एवं अधिक कीमत समेत मिसाइल के कई मानकों को लेकर असंतुष्ट थी, इसलिए उसने इसका फिर से परीक्षण किए जाने की सिफारिश की। यह पहला अवसर नहीं है जब सेना और डीआरडीओ समान धरातल पर नहीं दिख रहे हैं। अर्जुन टैंकों के भारी वजन, जिससे अधिकांश सड़कों और पुलों पर इसकी आवाजाही में दिक्कत होती है, इसके लिए अपने ऑर्डर में वृद्धि करने को लेकर सेना अनिच्छुक है। अब डीआरडीओ को इसकी शून्य से और फिर से इसकी डिजाइन बनाने तथा शुरुआत करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

वायु सेना तेजस के प्रदर्शन मानकों पर लगे बेशुमार प्रतिबंधों के कारण उसका ऑर्डर बढ़ाने की इच्छुक नहीं है, हालांकि इस मामले में रक्षा मंत्रालय की सोच दूसरी है, जैसाकि रक्षा मंत्री ने हाल ही में बताया है। नाग मिसाइल के मामले में, हालांकि सेना को 8000 मिसाइलों की जरूरत है, यह आरंभ में केवल 500 मिसाइल का आर्डर देने की ही इच्छुक है। artillery guns के मामले में भी, जो वर्तमान में परीक्षण के दौर से गुजर रही है, सेना को जब तक इसके प्रदर्शन का भरोसा नहीं हो जाता, इसके ऑर्डर की पुष्टि करने में उसकी दिलचस्पी नहीं है।

डीआरडीओ लगभग एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करता है और अनगिनत अवसरों पर उसने यह दावा करते हुए कि उसके पास स्वदेशी रूप से ही वांछित हथियारों के निर्माण की क्षमता है, सशस्त्र बलों की खरीद को अवरुद्ध कर दिया लेकिन या तो वह इसमें विफल साबित हुआ या फिर उस परियोजना में काफी देरी कर दी या परीक्षण के लिए एक निम्न गुणवत्ता वाला मॉडल उपलब्ध कराया। रक्षा मंत्रालय द्वारा इजरायल के साथ स्पाइक एंटी टैंक मिसाइल सौदे को रद्द करना एक ऐसा ही मामला है।

डीआरडीओ ने दावा किया कि चूंकि वह नाग मिसाइल का विकास लगभग पूरा कर चुका है, वह तीन से चार वर्षों में स्पाइक के समान इसका भी निर्माण कर सकता है। अब वह समय पर इसका निर्माण कर पाता है, इसमें देरी होती है या या इसकी क्षमताएं सीमित होंगी, इसका फैसला तो समय ही करेगा। डीआरडीओ की तरफ से होने वाली देरी पर कभी भी कोई सवाल नहीं उठाया गया है लेकिन सेना अभी तक उस क्षमता से वंचित ही रही है जिसकी उसे सख्त आवश्यकता है।

पैदल सेना के लिए बेसिक असॉल्ट राइफल की खरीद में देरी की एक बड़ी वजह डीआरडीओ द्वारा इसका निर्माण किए जाने की जिद रही है। उसने जिस 5.56 INSAS राइफल का निर्माण किया है, उसका इनफैंट्री द्वारा परित्याग किया जा रहा है क्योंकि थल सेना को बेहतर गुणवत्ता वाली राइफल चाहिए। सैनिक INSAS की तुलना में एके सीरिज को बेहतर मानते हैं। इसलिए, मिसाइल और रॉकेटों के अतिरिक्त, डीआरडीओ की अधिकांश अन्य परियोजनाएं या तो विफल रही हैं या वे वांछित गुणवत्ता से कम हैं। अभी हाल तक डीआरडीओ का ही रक्षा खरीदों के ऊपर पूरा प्रभाव रहा है और यही वजह है कि देश एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय शक्ति नहीं बन पाया है।

सरकार डीआरडीओ के साथ हमेशा ही बहुत अधिक प्यार और सम्मान के साथ पेश आई है और उसे निजी क्षेत्र की तुलना में अधिक तवज्जो दी है। इसलिए उसने मनमाफिक पैसे वसूले हैं, इसकी गुणवत्ता हमेशा ही संदेह के दायरे में रही है और परियोजनाओं में देरी होना तो आम बात रही है। सरकार का इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को लाना एक स्वागत योग्य कदम है और यह रक्षा उद्योग के प्रौद्योगिकीय आधार को बढ़ाएगा तथा डीआरडीओ की गुणवत्ता और लागत को चुनौती देगा।

डीआरडीओ के पास कुल 52 प्रयोगशालाएं हैं जिनमें ज्यादातर निष्क्रिय हैं और उन्हें बंद किया जा सकता है या उनका निजीकरण किया जा सकता है। दूसरी एजेन्सियों या विदेशों से हथियारों की खरीद की सेना की योजनाओं को रद्द करने के डीआरडीओ के अधिकार को समाप्त किया जाना चाहिए।

कोई भी देश केवल आयातों के बल पर एक बड़ी सैन्य शक्ति नहीं बन सकता। बहरहाल, अगर आंतरिक अनुसंधान एवं विकास का आधार निम्न है तो सशस्त्र बलों को ऐसी गुणवत्ता के साथ चिपके रहने को मजबूर करना भी गलत है। रक्षा क्षेत्र को निजी बाजार के लिए खोले जाने से डीआरडीओ को मिलने वाला विशेष व्यवहार रुक जाना चाहिए। उन्हें निजी क्षेत्र के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय वेंडरों के साथ भी प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। विकास में देरी और उत्पादों की गुणवत्ता में कमी को लेकर डीआरडीओ से सवाल पूछे जाने चाहिए और वैज्ञानिकों को इसके लिए हिदायत दी जानी चाहिए। केवल उन्हें जवाबदेह और प्रतिस्पर्धी बना कर ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादों का निर्माण किया जा सकता है जिससे देश तथा सशस्त्र बल गर्व महसूस कर सकेंगे।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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