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नक्सलियों का दुस्साहस

जंगल में नक्सली
फाइल फोटो

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान गुरुवार को भी नक्सली बाज नहीं आए। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में मतदान के बीच ओरछा इलाके में हैलिपैड पर पुलिस टीम पर हमला किया। वहीं महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में मतदान करा लौट रहे सुरक्षाकर्मियों से नक्सलियों की मुठभेड़ हुई। अलावा इसके चुनाव से पहले दंतेवाड़ा समेत कई हिंसक घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि छत्तीसगढ़ समेत की इलाकों में नक्सलियों का दुस्साहस बरकरार है और मौका पाकर, घात लगाकर वे सुरक्षाबलों को निशाना बनाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा ले रहे हैं। दंतेवाड़ा के नक्सली हमले में बीजेपी विधायक भीमा मंडावी की हत्या को भी इसी परिपेक्ष मे देखने की जरूरत है। गत मंगलवार को हुई नक्सली घटना में साल 2013 की उस घटना की याद दिला दी जब उस साल विधानसभा चुनाव के छह माह पहले 25 मई को कांग्रेस के परिवर्तन यात्रा के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया था और 32 लोगों को मार दिया था। बीते वर्षों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान घटी वारदात भी इस बात की ओर इशारा करती हैं कि नक्सली इन घटनाओं के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहने की कोशिश करते हैं। नक्सलियों का बार-बार कानून-व्यवस्था को चुनौती देना तथा चुनाव प्रक्रिया में हिंसक गड़बड़ी करना चिंता का विषय है। इस पर नए सिरे से कारगर नीति बनाने की जरूरत है।





केंद्र सरकार का कहना उचित है कि देश मे नक्सलियों का दायरा सिमट रहा है। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि केंद्र व राज्यों की तमाम कोशिशों के बावजूद नक्सलियों की हचचलें व हरकतें सुरक्षाबलों को निशाना बना रही हैं। क्यों वे बारूदी सुरंग बिछाने, अत्याधुनिक हथियार पाने में सफल हो जा रहे हैं? आखिर क्यों वे अपने अपने इलाकों में सुनियोजित हमले कर पाने में कामयाब हो जा रहे हैं? आखिर शासन-प्रशासन की चूक से ही ऐसा संभव हो पा रहा है। तो फिर क्यों नहीं खुफिया और निगरानी तंत्र को और अधिक चुस्त-दुरुस्त किया जा रहा है। एक लंबा समय बीत गया नक्सल ऑपरेशन का। तो फिर क्यों नहीं सारी योजनाएं सिरे चढ़ पा रही हैं? केंद्र व नक्सल राज्यों को एक उचित रणनीति तथा कार्यनीति बनाने पर जोर देना होगा।

नक्सल बहुल इलाको में अभी कई चरणों में लोकसभा चुनाव होने बाकी हैं। हो सकता है कि नक्सली अपने अपने इलाकों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी चर्चा करवाने के लिए हिंसक घटनाओं को अंजाम दें। लिहाजा जरूरी है कि सख्ती के साथ उनका दमन किया जाए। गुरुवार को बस्तर लोकसभा सीट पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं ने लंबी-लंबी कतारों में खड़े होकर पूरे जोश और उत्साह के साथ वोट डाले हैं। इससे स्पष्ट है कि नक्सली हिंसा के बावजूद वहां का स्थानीय मतदाता डरा नहीं है। सुरक्षाबलों की मौजूदगी में मतदाताओं की अंगुलियों की स्याही यह बता रही है कि लोकतंत्र को जिंदा बनाए रखने में उसकी प्रबल आशा है। जबकि दो दिन पहले इसी इलाके के दंतेवाड़ा के विधायक की नक्सलियों ने हत्या कर आम नागरिकों में दहशत पहलाने की कोशिश की थी।

अब मौजूदा दौर में नक्सलियों से सख्ती और हमदर्दी दोनों ही ‘हथियारों’ से निपटने की जरूरत है। उन्हें यह बात समझाई जानी चाहिए कि उनका विकास देश की मुख्यधारा से ही जुड़ कर ही संभव है। उन्हें देश के कानून और संविधान के दायरे में रहकर बातचीत के लिए बुलाया जाना चाहिए। यूं तो नक्सली इलाकों में किशोरों, युवाओं तथा स्थानीय नागरिकों के कल्याण के लिए तमाम योजनाए चलाई जा रही है लेकिन इन्हें और गति देने की जरूरत है। आम चुनाव के दौरान राजनीति दलों को भी नक्सल प्रभावित इलकों में जा जाकर उनकी समस्याओं, आकांक्षाओं बारीकी से समझना होगा ताकि सरकार बनने के बाद उस पर ईमानदारी से काम कर उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।

 

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