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सैनिक, सेना और सियासत

भारतीय सेना
फाइल फोटो

पिछले सप्ताह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान रक्षा मंत्रालय का एक आंतरिक नोट दिखाया जो राफेल के मुद्दे पर कांग्रेस का सबसे नया प्रहार था। हाल के दिनों में हमारा देश दिल्ली की कुर्सी पर काबिज प्रत्येक केंद्र सरकार द्वारा किए गए रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के आरोपों का गवाह बनता रहा है। हालांकि, ताज्जुब की बात यह रही है कि सबूतों के दावों के बावजूद आज तक किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया या उसे सजा नहीं दी गई। यहां तक कि जांचों का सिलसिला भी अनंत रूप से चलता रहा है। सरकारें आती और जाती रहीं हैं लेकिन घोटाले बदस्तूर जारी रहे हैं।





चाहे जीप घोटाला हो या बोफोर्स, ताबूत घोटाला, अगुस्ता वेस्टलैंड या मौजूदा राफेल घोटाला हो, ऐसी कोई सरकार नहीं है जो सशस्त्र बलों के लिए हथियारों/उपकरणों की खरीद पर सचमुच दूध का धुला होने का दावा कर सके। ऐसे और कई मामले रहे होंगे जिनमें बिचौलिये और रिश्वतखोरी जरूर शामिल हुई रही होगी लेकिन शायद उस स्तर तक नहीं जहां कुछ घोटाले पहुंच गए हैं।

जहां प्रत्येक सियासी दल ने खुद का बचाव किया है और दावा किया है कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है  लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा जवानों को दिया जा रहा संदेश बिल्कुल साफ है कि ‘जब हम आपकी जरूरतों के लिए हथियारों की खरीद करते हैं तो हम आपको धोखा देते हैं।

सरकारी व्यय के कई अन्य स्रोत हैं लेकिन प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा घोटालों की बात करने के लिए रक्षा व्यय को ही सामने लाया जा रहा है। क्या ऐसा इसलिए है कि जवान और राष्ट्रीय सुरक्षा सत्तारुढ़ दलों के लिए कम महत्व के हैं। खासकर, जब वे सत्ता में नहीं रह जाते  या ऐसा इसलिए है कि यह फंडों के दुरुपयोग का सबसे आसान रास्ता है?

इससे भी बदतर बात यह हो रही है कि अब राजनीतिक दलों ने सशस्त्र बलों को भी अपनी राजनीतिक अदावत में घसीटना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने सबसे हालिया प्रेस कांफ्रेस में सशस्त्र बलों को सीधा संबोधित किया और दावा किया कि उनके पैसे का दुरुपयोग किया जा रहा है। उनकी टिप्पणियां थीं। ‘इस 30,000 करोड़ रुपये का उपयोग आपके मरने के बाद इसे आपके परिजनों को देने में किया जा सकता था।‘ उनकी इस बात से सभी सन्न रह गए कि आखिर वह कहना क्या चाहते थे? मुझे ताज्जुब होता है कि क्या उन्हें इस बात का अहसास भी है कि जवान अपने झंडे और देश के सम्मान के लिए अपनी जान देता है न कि महज चंद रुपयों के लिए।

प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया कि कांग्रेस एक मजबूत सेना नहीं चाहती, इसलिए रक्षा सौदों पर सवाल उठा रही है। उन्होंने कांग्रेस शासनकाल में हुए कई घोटालों की सूची गिनवाई। उन्होंने कांग्रेस पर राष्ट्र की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने सशस्त्र बलों से वर्तमान सरकार के निर्देशों का पालन न करने को कहा।

इसके विपरीत, ये वही राजनीतिक पार्टियां हैं जो सेनाप्रमुखों पर राजनीतिक बयान देने का आरोप लगाती हैं जब वे राजनीतिक मुद्वों पर, जो सशस्त्र बलों से संबंधित हैं, अपने दिल की बात बोलते हैं। जब सेना प्रमुख यह बोलते हैं कि असम में अवैध प्रवासियों की बढ़ती उपस्थिति ने क्षेत्र की राजनीतिक संरचना बदल दी है तो उन पर राजनीतिक बयान देने का आरोप लगाया जाता है।

जब थलसेना प्रमुख बिपिन रावत जिक्र करते हैं कि जम्मू में रोहिंग्याओं और बांग्ला देशियों की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से नुकसानदायक बन गई है और उन्हें अवश्य वहां से हटाया जाना चाहिए, उन्हें सत्तारुढ़ पार्टी के पक्ष में बोलने वाला करार दिया जाता है। जब वह कहते हैं कि जमीनी कार्यकर्ता और पत्थरबाजी करने वाले भविष्य के आतंकी हैं और उनके साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए तो उन पर कश्मीरियों के प्रति असंवदेनशील होने का इल्जाम मढ़ दिया जाता है।

जब वायुसेनाध्यक्ष राफेल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हैं और वायुयान की तारीफ करते हैं तो उन्हें झूठा कहा जाता है और यहां तक कि राजनीतिक बहसों से दूर रहने कहने को भी कहा जाता है। मुझे तो ताज्जुब होता है कि ये राजनीतिज्ञ और सियासी दल पाखंडी तो नहीं हैं?

इसलिए आप देखें कि गलत कौन कर रहा है और सशस्त्र बलों का राजनीतिकरण कौन कर रहा है। ऐसा सेना प्रमुख नहीं कर रहे बल्कि राजनेता कर रहे हैं। प्रत्येक राजनीतिक पार्टी दूसरों पर राजनीति करने का आरोप लगाती है लेकिन सभी राजनीतिक दल लगातार ऐसा ही कर रहे हैं।

वे हताशा में सैनिकों को इसमें घसीटने की कोशिश कर रही हैं और भारतीय नागरिकों की सहानुभूति बटोरने की जुगाड़ में हैं जो राजनेताओं की तुलना में जवानों का अधिक सम्मान करते हैं। भारतवासी जानते हैं कि जवान शहादत देता है जबकि राजनेता उनके हथियारों के लिए उपलब्ध कराये जाने वाले फंड को सीमित कर देने के बावजूद केवल श्रेय लेते हैं।

इन सभी मुद्दों को लेकर  एक आम सैनिक को आश्चर्य होता है कि क्या देश चलाने के लिए कोई ईमानदार राजनीतिक पार्टी है जिसके जीवन की रक्षा करने का उस पर दायित्व है? वह यही सोचेगा कि राजनीतिक पार्टियां केवल जवानों के हिस्से को लूटने और उनसे कुछ प्राप्त करने के लिए बजाए इसके कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संवेदनशील तरीके से खर्च करे। यहां तक कि एक आम भारतीय नागरिक को भी ताज्जुब होगा कि क्या घोटालों के जिक्र के अलावा भी कोई अन्य चुनावी मुद्वा है जिसे देश के समक्ष रखा जा सकता है।

अगर किसी सैनिक के पास अपनी चिंताओं को अभिव्यक्त करने का अधिकार रहा होता तो उनके फंड को सीमित करने वाले सियासी दलों तथा राजनेताओं के इल्जामों को सुन कर वह सियाचिन की बर्फीली ऊंचाइयों से चिल्ला चिल्ला कर उन्हें संबोधित करता और कहता कि, ‘ इसके लिए शहीद होने लायक कम से कम एक भारतीय तो बन जाओ।‘ क्या घोटालों के हंगामे के बीच उसकी बात सुनी जा सकेगी या यह राजनेताओं के दृष्टिकोण को बदल देगी, इसके आसार नहीं दिखते।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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