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सुरक्षाबलों की सार्थक पहल

आदिवासी क्षेत्र में सीआरपीएफ के जवान

आईटीबीपी (इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस) तथा सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) की नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों को शिक्षा व रोजगार से जोड़ने की पहल प्रशंसनीय भी है और अनुकरणीय भी। फिलहाल दोनों सुरक्षाबलों को छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों के ऐसे सैकड़ों गांवों में मुहिम चलाने का जिम्मा सौंपा गया है जहां नक्सलवाद ने वर्षों से अपने पैर पसार रखे हैं। यूं तो सुरक्षाबलों का काम है सुरक्षा और शांति बहाली। नक्सलवाद से घिरे इन गांवों-जिलों में वे अपने काम को बड़ी बहादुरी और धैर्य के साथ अंजाम देते रहते हैं तथा मौका पड़ता है तो कर्तव्य पालन के दौरान शहादत भी देते हैं। पर बात सर्च ऑपरेशन या ऑपरेशन के दौरान हिंसक झड़पों से बनती नहीं है। नक्सली इलाकों में काफी हिंसा हो चुकी है, दोनों तरफ से जानें जा चुकी है। पर लाभ कुछ नहीं हुआ। ऐसे में सुरक्षा बलों द्वारा शुरू की गई यह मुहिम कई मायनों में विशेष कारगर साबित हो रही है।





खास बात यह है कि सुरक्षाबलों की मुहिम से जुड़े आंकड़े बेहद सकारात्मक दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। आदिवासी जिलों के गांव-गांव के किशोर और युवा सुरक्षाबलों के साथ मिलकर नई तालीम तथा कौशल परीक्षण प्राप्त कर अपने सुखद भविष्य की कामयाब इबारत लिख रहे हैं तथा आगे बढ़ रहे हैं। इन बच्चों की शिक्षा से उत्साहित होकर दूसरे बच्चे भी इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। कल तक जिन गांवों में नक्सलवाद की काली छाया और उससे जुड़ी दहशत व्याप्त थी वह सुरक्षा बलों की मौजूदगी से छंट रही है। यह सही है कि केंद्रीय बल लंबे अर्से से इन इलाकों में रह रहे हैं और मुस्तैद कार्रवाई कर रहे हैं। लेकिन लाख टके की बात वही कि हमेशा बात गोली से बनती नहीं है। इन जिलों में नक्सलवाद के वर्षों पुराने जमीनी आधार को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी है शिक्षा और रोजगार। शिक्षा गलतफहमियों और अज्ञानता को दूर करती है और रोजगार हाथों को काम देता है, जीवनयापन की चीजों को मुहैया कराता है। और दोनों मिलकर व्यक्ति को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ कर एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।

अच्छी बात यह है कि यह काम सुरक्षा बलों की निगरानी और उनकी मौजूदगी में हो रहा है। और वे पूरी शिद्दत के साथ इस सकारात्मक काम को अंजाम दे रहे है। सुरक्षा बलों के होने से सीखने और काम करने के मौके तो मिल ही रहे हैं। आदिवासी बच्चों तथा उनके अभिभावकों के मन में बैठा वर्षों पुराना भय भी धीरे धीरे खत्म हो रहा है। इस कारगर मुहिम के बीच भारत सरकार के ‘स्किल इंडिया कार्यक्रम’ की एक रिपोर्ट भी इस बात की ओर इंगित करती है कि झारखंड के 24 जिलों में से 20 जिले जो कभी नक्सल प्रभावित थे, वहां इनका प्रभाव धीरे-धीरे खत्म हो है तथा यहां के आदिवासी युवक- युवतियां प्रशिक्षित होकर अच्छे वेतन मान की नौकरियां प्राप्त कर रहे हैं। सुरक्षाबलों को इन इलाकों में लंबे समय तक एक मुहिम चलाने की जरूरत होगी। क्योंकि ये कार्य दीर्घ अवधि की मांग करता है। दोनों सुरक्षाबलों की इस मुहिम को देश के ऐसे ही अन्य जिलों भी शुरू करने की जरूरत है।

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