vishesh

मालदीव– भारत के लिये सिरदर्द

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

एक कहावत है- ‘देखन में छोटा लगे घाव करे गम्भीर’। 133 करोड़ आबादी वाले भारत के सामने पौने चार लाख वाले मालदीव की क्या बिसात हो सकती है लेकिन मालदीव भारत के लिये सिरदर्द बना हुआ है। केरल के समुद्र तट से महज 300 किलोमीटर दूर स्थित द्वीपीय देश मालदीव दुनिया के अय्याशों और धन्नासेठों का अड्डा है तो वहां इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकवादी भी अपना अड्डा बना रहे हैं क्योंकि मालदीव की सरकार पिछले कुछ सालों से जहां एक और कट्टरपंथी सऊदी अरब और पाकिस्तान के प्रभाव में आ चुकी है वहीं वह चीन की सामरिक चपेट में भी आ चुकी है। अरब सागर में भारत के तट के ठीक पास मालदीव के द्वीपों पर इतनी सारी भारत विरोधी ताकतों का अड्डा जमाना भारत के लिये खास चिंता की बात है। भारत के नजदीक होने की वजह से मालदीव और इसका समुद्री इलाका स्वाभाविक तौर पर भारत के प्रभाव क्षेत्र में रहना चाहिये लेकिन वहां के शासक यामीन अब्दुल गयूम अपनी गद्दी बचाने के इरादे से भारत समथर्क जनतांत्रिक ताकतों को दूर रखने के लिये चीन, सऊदी अरब और पाकिस्तान की गोद में जा चुके हैं।





ऐसे ही मालदीव में जुलाई के चौथे सप्ताह में जब राष्ट्रपति यामीन गयूम के निदेर्शों पर मालदीव की फौज ने मालदीव की संसद ( मजलिस) पर इसलिये ताला लगा दिया कि वहां पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद की अगुवाई वाली मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी ने मजलिस के स्पीकर के खिलाफ अविश्वास का प्रस्ताव लाया था और चूंकि इसके पारित हो जाने की उम्मीद थी इसलिये राष्ट्रपति यामीन को अपनी कुर्सी पर खतरा नजर आ रहा था। इसलिये ऐसी नौबत आने के पहले ही राष्ट्रपति यामीन ने मजलिस के फाटक पर फौज को भेज कर ताला लगवा दिया और सांसदों को अंदर जाने से जबर्द्स्ती रोका।

इतना सब कुछ होने के बाद भी भारत राष्ट्रपति यामीन को आड़े हाथ लेने से कतरा रहा है । जब कि अमेरिका, कनाडा, और कई यूरोपीय देशों ने जनतंत्र के मंदिर पर ताला लगाने की घोर भर्त्सना की। मौन रहना भारत की दुविधा दर्शाता है। आखिर चीन और पाक के चंगुल में फंस चुके मालदीव के साथ कैसा बर्ताव किया जाए कि वह वहां जनतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू तौर पर चलने दे। आखिर 1988 में आपरेशन कैक्टस कर मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को विद्रोहियों के हमले से बचाने के लिये अपने वायुसैनिक विमानों और सैनिकों को भेजकर भारत ने फौजी हस्तक्षेप किया था। आज मालदीव में जनतंत्र का गला घोंटा जा रहा है और वहां के शासक चीन, पाक और कट्टरपंथी ताकतों के चंगुल में फंसते नजर आ रहें हैं। भारत की दुविधा यह भी है कि यदि राष्ट्रपति यामीन पर किसी तरह दबाव डालने की कोशिश की तो वहां यामीन की कुर्सी बचाने के लिये चीन और पाक के लोग घमक पड़ेंगें।

भारत के सामरिक कणर्धार वहां कदम फूंक-फूंक कर रखना चाह रहे हैं। आखिरकार मालदीव का समुद्री इलाका हिंद महासागर के उस व्यापारिक मार्ग से सटा है जहां से भारत और बाकी दुनिया के माल आते जाते हैं। भारत की चिंता यह भी है कि मालदीव चीन को जो द्वीप लीज पर दे चुका है कहीं चीन वहां अपना सैन्य अड्डा नहीं बनाने लगे। चीन यदि फिलहाल ऐसा नहीं भी करेगा तो भी वह मालदीव के द्वीपों से भारत की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रख सकेगा।

Comments

Most Popular

To Top