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महबूबा मुफ्ती ने की युद्ध विराम की मांग

सीएम महबूबा मुफ्ती
सीएम महबूबा मुफ्ती (फाइल फोटो)

जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में केंद्र सरकार से कश्मीर घाटी में रमजान से लेकर अमरनाथ यात्रा की समाप्ति यानी अगस्त के आखिर तक एकतरफा युद्ध विराम घोषित करने की अपील की है। इस अपील के पीछे उनके इरादे नेक थे और उनकी मांग का उद्देश्य घाटी में निर्बाध हिंसा के दौर, जिसमें स्थानीय आतंकियों का खात्मा, आतंकवादियों द्वारा मुठभेड़ों में नागरिकों एवं सुरक्षा कर्मियों की हत्याओं और पत्थरबाजों, जो सैन्य कार्रवाईयों में बाधा उत्पन्न करते हैं, पर अंकुश लगाना था।





जिस दिन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का यह बयान आया, उसी दिन सेनाध्यक्ष ने एक राष्ट्रीय दैनिक को एक साक्षात्कार दिया। बातचीत में उन्होंने ‘आजादी‘ के लिए स्थानीय मांगों के खिलाफ खुल कर बोला और कहा कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि सेना उन समूहों के खिलाफ भी कदम उठाएगी जो ऐसे विचारों की वकालत करते हैं। उनका मानना था कि आतंकवाद एक न रुकने वाला चक्र है और मरने वाले आतंकियों की संख्या उन्हें परेशान नहीं करती क्योंकि इधर आतंकियों को मार गिराया जाता है, उधर नए लोग उनकी जगह ले लेते हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सेना आतंकियों के खात्मे की जगह उनके आत्मसमर्पण को ज्यादा तवज्जो देती है। यहां तक कि जम्मू कश्मीर के डीजीपी भी कह चुके हैं कि वे उन आतंकियों की सहायता और समर्थन करेंगे जो आत्म समर्पण करेंगे। सप्ताहांत में, श्रीनगर कोर के जीओसी ने यहां तक कहा कि अंतिम हमला शुरू करने से पहले सेना आतंकियों को एक अवसर जरूर देगी। इससे मारे गए आतंकियों का महिमामंडन रुकेगा, जो दूसरे युवाओं को आतंकी बनने की ओर लुभा रहा है।

सैन्य ऑपरेशनों में कमी लाने एवं शांति को अवसर देने के बारे में पूछे जाने पर सेना प्रमुख ने कहा कि निहत्थे नागरिकों, छुट्टी पर गए सुरक्षा के जवानों एवं प्रशासनिक काफिलों की आवाजाही की सुरक्षा कौन करेगा? अगर इस बात का पक्का भरोसा दिलाया जाए तो सेना युद्ध विराम का पालन करेगी।

जैसा कि वाजपेयी सरकार के शासन काल में, जब सेना ने नवंबर, 2000 में ‘ भिड़ंत ऑपरेशनों की पहले शुरुआत न करने‘ की कार्रवाई की थी, जो आतंकियों के खिलाफ संचालनों में एक प्रकार का युद्ध विराम ही है तो उसे बेहद कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ा था क्योंकि उस वक्त श्रीनगर हवाई अड्डे एवं दूरदर्शन केंद्र समेत कई जगहों पर भयंकर विस्फोट हुए थे और आतंकियों ने 170 से अधिक नागरिकों की हत्या कर दी थी।

घाटी में मौजूदा परिदृश्य में पहले से ही एक बदलाव का संकेत मिल रहा है। लगातार मुठभेड़ों के कारण आतंकियों का तेजी से खात्मा हो रहा है, जिससे संतुलन सुरक्षा के पक्ष में झुकता दिख रहा है। सैन्य ऑपरेशनों को बाधित करने के प्रयासों को शायद ही कामयाबी मिलती है। नागरिक हताहतों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि पत्थरबाज सैन्य ऑपरेशनों में तैनात बलों को चुनौती देते हैं जिसके बाद सेना उन्हें खत्म करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देती है।

युद्धविराम की मांग हिंसा के इस चक्र को रोकने तथा अमन चैन को एक मौका देने की कोशिश हो सकती है, जब आतंकी फिलहाल पूरी तरह नियंत्रण में हैं और युद्धविराम उल्लंघनों एवं घुसपैठ की पाकिस्तान की साजिशों को मुंह तोड़ जवाब दिया जा रहा है। हालांकि इस बीच युवाओं में भटकाव भी ज्यादा देखा जा रहा है। महबूबा ने महसूस किया है कि जब तक युवाओं को मुख्यधारा में नहीं लाया जाता, हिंसा का यह कुचक्र चलता ही रहेगा।

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अपनी विचार प्रक्रिया में दुरुस्त हो सकती हैं, लेकिन जैसा कि सेना प्रमुख ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि जब तक जमीनी स्तर पर बातचीत करने के इरादे से राजनीतिक प्रक्रिया उपयोग में नहीं लाई जाती, कछ भी नहीं बदलेगा। अभी हाल ही में कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता भी मारे गए हैं, इसलिए हमलों के खौफ से राजनीतिक पार्टियों ने आम लोगों से दूरियां बना ली हैं। नेताओं एवं आम जनता के बीच की दूरी लगातार बढ़ती ही जा रही है जिससे इस अलगाव में और बढोतरी होती जा रही है।

वास्तव में, महबूबा को इसके बजाए यह मांग करनी चाहिए थी कि सेना विशिष्ट खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशनों पर अपना ध्यान केंद्रित करे, बाधाओं और रुकावटों को कम करे तथा सुरक्षा घेरों और तलाशी अभियानों को सीमित करे। इन कदमों से उसकी दृष्टिगोचर होने वाली मौजूदगी में कमी आएगी और सुरक्षा के जवान संभवतः बदलाव के अग्रदूत बन जाएंगे।

सेना से यह उम्मीद करना कि महज प्रयोग के लिए, जिसमें किसी ठोस कार्ययोजना का अस्तित्व नहीं है, कड़ी मेहनत से हासिल किए गए अपने लाभ और आतंकियों पर अपनी निर्णायक बढ़त को छोड़ देगी, उससे जरुरत से अधिक अपेक्षा करना है। दो प्रमुख धार्मिक त्यौहारों का उल्लेख करने के पीछे उनकी मंशा अपनी एक धर्मनिरपेक्ष छवि को पेश करने की रही होगी लेकिन किसी एक पक्ष द्वारा अपनी लाभ की स्थिति को राष्ट्रविरोधी तत्वों के हाथों गवां देना स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि विरोधी पक्ष, आतंकियों एवं पत्थरबाजों के लिए ऐसा कोई नियम या नीतियां नहीं हैं। इसकी तुलना में एक बहुत अच्छा विकल्प उन्हें आत्म समर्पण करने के लिए प्रोत्साहित करना एवं जमीनी स्तर पर संवाद में बढोतरी करना हो सकता है। अंतत: सेना ने उनके एकतरफा युद्धविराम के सुझाव को अस्वीकार कर अच्छा ही किया है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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