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लापता विमान से सबक लेने की जरूरत

AN-32 एयरक्राफ्ट

भारतीय वायुसेना के लापता विमान एएन- 32 में शहीद हुए 13 जांबाज सैन्यकर्मियों त्रासद घटना बेहद चिंताजनक इसलिए है कि तमाम प्रयासों के बावजूद सेना हवाई हादसों को रोक पाने में सफल नहीं हो पा रही है। इन हादसों में हम कठिन ट्रेनिंग से गुजरे और देश सेवा के जज्बे से लबरेज सैनिकों को तो खो ही रहे हैं, आर्थिक तथा सुरक्षा तैयारियों को भारी नुकसान हो रहा है। भारतीय वायुसेना को इस पहलू पर तेजी से सोचने और बेहद कारगर ढंग से काम करने की जरूरत है। देश के नए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संज्ञान में यह बात तो है ही लेकिन जितनी जल्दी हो सके वायुसेना के उच्च तथा तकनीकी अफसरों को इस ओर काम करने के लिए निर्देश देने की तत्काल आवश्यकता है।





3 जून को लापता हुए विमान को ढूंढने के लिए भारतीय वायुसेना, थलसेना, नौसेना, इसरो आदि ने अपनी सर्वश्रेष्ठ ताकत झोंक दी। बचाव अभियान में एयरफोर्स के एमआई- 17 और थलसेना के ध्रुव हेलिकॉप्टर की मदद से 15 लोगों को अलग-अलग टीमों के जरिए हादसे की जगह पर उतारा गया। इनमें वायुसेना के 09, सेना के 04 और 02 स्थानीय पर्वतारोही शामिल थे। इसी बात का नतीजा है कि सियांग के जंगलों में गायब विमान का मलबा 11 जून को तलाश लिया गया। अब तमाम कोशिशों के बाद भारतीय वायुसेना के एएन- 32 परिवहन विमान का कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर तथा फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर बरामद कर लिया गया है। जाहिर है ये दोनों उपकरण दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने में मदद करेंगे। लेकिन जांच-परख, जांच पड़ताल के बाद दुर्घटना की असली वजह को जल्द से जल्द पकड़ना उचित रहेगा ताकि ऐसे हादसों की पुनरावृति पर लगाम लगाई जा सके।

दरअसल 03 जून को असम के जोरहाट एयरबेस से अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले स्थित मेचुका को उड़ान भरने के दौरान गायब हुए इस विमान को ढूंढने में इतने दिन का समय इसलिए लगा कि यह विमान उस जगह दुर्घटनाग्रस्त हुआ जहां सीधी ढाल वाली गहरी खाई है और जहां तक पहुंच पाना मुश्किल काम था। खराब मौसम, घने जंगलों वाला दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र होने की वजह भी चुनौती बनी। यहां यह बात रक्षा मंत्रालय और खास तौर पर वायुसेना को ध्यान में रखनी होगी कि इस इलाके में अक्सर ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। इस साल फरवरी में ईस्ट अरुणाचल प्रदेश के रोइंग जिले में 75 साल से लापता एक अमेरिकी वायुसेना के विमान का मलबा मिला था। इस विमान में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान असम के दिनजान एयरफिल्ड से उड़ान भरी थी।

इस इलाके से जुड़े शोध पर भी पैनी नजर रखने की आवश्यकता है। शोध बताते है कि इस इलाके के आसमान में बहुत ज्यादा टर्बुलेंस (विक्षोभ) है यानी हवा बहने की अनिश्चितता है। हवाएं क्या रुख अख्तियार करेंगी कहना मुश्किल है। जाहिर है 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं के बीच उड़ान भरना चुनौती भरा काम हो जाता है। ऐसे में अगर कोई विमान दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो गहरी घाटियां, उग्र मौसम, घने जंगल विमान के मलबे को ढूंढने में चुनौती बनते ही हैं, जैसा कि एयरफोर्स के इस विमान के साथ हुआ। इस साल भारतीय वायुसेना ने एएन-32 विमान के अलावा, एक मिराज, एक जगुआर, 02 हॉक विमान और 02 मिग विमान खोए हैं। लगातार विमानों और जांबाज सैनिकों को खोना हर तरह से देश की एक बड़ी क्षति है। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय वायुसेना नई चुनौतियों के बीच अपनी भूमिका निभा रही है। जरूरी है कि भारतीय वायुसेना के विमान बेहद उन्नत किस्म के हों, इस पर तत्काल निर्णय लेने की जरूरत है।

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