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केपीएस गिल: ‘हम भी बच सकते थे घर में रह कर….’

ललित-वत्स

ललित वत्स (वरिष्ठ पत्रकार)

केपीएस गिल के बारे में पहली बार तब सुनने-पढ़ने में आता था, जब वह असम पुलिस में थे। असम में उग्रवाद से निपटने में उनकी भूमिका अहम मानी जाती थी। उनके असम छोड़ने के बाद भी उस दौर के बारे में बहुत कुछ कहा जाता था। लेकिन उतनी डिटेल सामने नहीं आती थी, जितनी पंजाब के ‘ऑपरेशंस’ के बारे में आती थी। पंजाब में उग्रवाद को खत्म करने में गिल ने जो भूमिका निभाई, उस ने ही उन्हें दुनिया भर में आतंकवाद पर काम करने वालों की रिसर्च का सब्जेक्ट बना दिया। उसी के बल पर उनकी पहचान न सिर्फ भारत में, बल्कि दुनिया भर में आतंक के खिलाफ लड़ने वाले विशेषज्ञों के बीच बन गई। उसे एक वाक्य में इस तरह से समझा जा सकता है कि श्रीलंका में लिट्टे के उग्रवादियों के खिलाफ और अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ गिल के ‘पंजाब प्रयोग’ के तरीकों को ही अपनाने की वकालत कई स्तर पर हुई थी। अमेरिका में विशेषज्ञों ने भी इस पर पर्चे पढ़े थे।





आईपीएस केपीएस गिल

आईपीएस केपीएस गिल(फाइल फोटो)

एक और अकेले के सामने नतमस्तक

गिल पुलिस फोर्स या कहिये कि सुरक्षा बलों के लोगों के दिलो-दिमाग में कहां किस तरह बसते थे, इसका एक नमूना 28 मई को लोधी रोड श्मशान घाट पर देखने-सुनने को मिला। कितने ही वरिष्ठ अफसर वहां थे। देश के तकरीबन हर बल का कोई न कोई बड़ा अफसर वहां था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और दिल्ली पुलिस के पूर्व सीपी, कश्मीर में राज्यपाल के सलाहकार और उत्तर-पूर्व में खुद भी राज्यपाल रहे वेद मारवा से लेकर आईबी, सीबीआई, सीआरपीएफ, पंजाब पुलिस, एनआईए, दिल्ली पुलिस, आईटीबीपी और अन्य बलों के वर्तमान और रिटायर्ड अफसर वहां थे। अनेक वे अफसर भी थे, जिन्हें मैंने पंजाब और कश्मीर में खटखट, खड़ाक-खड़ाक की चाल चलते देखा है। ‘तेज चाल’। उम्र के तकाज़े शरीर को हिला देते हैं। सो, उन रिटायर्ड अफसरों की आंखें नम थीं। गिल के साथ बहुत ही करीबी रिश्ता रखने वाले एमएस बिट्टा भी थे। बिट्टा ने पंजाब में मं‌त्री रहते हुए आतंकवाद के खिलाफ डट कर जो बोलना शुरू किया था, वह अब तक जारी है। बिट्टा पर चार-पांच बार हमले हुए या हमले की कोशिशें हुईं। उनके पांव में रॉड डालनी पड़ी थी। तो तभी से बिट्टा गिल के करीबी बनते चले गए थे। अरुण पुरी भी थे वहां पर। लगभग सभी के बीच जो चर्चाएं थीं, उनका निचोड़ यही था कि आतंक के खिलाफ सबसे बड़ा योद्धा चला गया। एनआईए के एक अफसर हाल ही में कश्मीर से लौटे हैं। वह कश्मीर में आतंकवाद की चर्चा करते हुए कह गए कि इस लड़ाई के खिलाफ खड़ा रहा सबसे बड़ा शेर देखो अंतिम पड़ाव पर लेटा है। यानी सभी की बातों और आंखों में तारीफ औैर नमन के भाव देखे-समझे जा सकते थे। ‘वन एंड ऑनली गिल’।

एक लाख मारे गए?

गिल ने आखिर ऐसा किया क्या ? जो यह स्थान हासिल हो गया ? 1958 बैच के आईपीएस अफसर गिल को उत्तर-पूर्व भारत में 28 साल की सेवा के बाद पंजाब लाया गया था। गिल असम-मेघालय काडर के थे। इसलिए उत्तर-पूर्व में पोस्टिंग रही। लेकिन पंजाब में उन्हें ‘मजबूरी’ में बुलाया गया। रोजाना 20,30, 50 तक लोग उग्रवाद का निशाना बन रहे थे। पाकिस्तान में जेड ए भुट्टो और जनरल जियाउल हक के दिमाग की उपज के तहत ‘ऑपरेशन’ ने तब आकर पंजाब को उग्रवाद में जकड़ लिया था। बसों में बम फटते थे। दिल्ली, हरियाणा और दूसरे राज्य भी निशाना बनने लगे थे। पंजाब में बसों से उतार कर निर्दोष लोगों पर एके-47 दाग दी जाती थीं। पूरी बस की बस पर हमला। एक ही दिन में कई वारदात। हिंदुओं पर छांट-छांट कर हमले किए गए। पंजाब से पलायन हो गया। दिल्ली और अन्य शहरों में हजारों-हजार लोग ‘शरणार्थी’ की हालत में आकर रहने पर मजबूर हो गए। जिनके पास पंजाब में अच्छे साधन थे, वे भी दिल्ली जैसे शहरों में किसी तरह सेटल होने पर मजबूर हो गए थे। उग्रवादियों और खालिस्तान के नाम पर बने अलगाववदियों की मजबूती इतनी थी कि उन्होंने अखबारों को खुद के बारे में उग्रवादी लिखने की बजाए ‘खाड़कू’ लिखने का ‘हुकुम’ सुना दिया था।

उस दौर में हजारों लोग मारे गए। कुछ लोग तो कहते हैं कि एक लाख से भी ज्यादा लोग मारे गए। उग्रवादियों ने पंजाब के कारोबारियों से पैसा वसूलना शुरू कर दिया। पेट्रोल पंप, बसें, ट्रेन, बैंक, सबके सब निशाना बनाए जाने लगे। दिल्ली में भी बैंक डकैती की गईं। बम धमाके हुए, अनगिनत ही कहा जा सकता है। हरजिंदर सिंह जिंदा, सुक्खा, लाल सिंह, पेंटा और न जाने ऐसे कितने ही कुख्यात उग्रवादी नाम। लुधियाना, जलंधर में बड़ी बैंक डकैतियां मुझे याद आती हैं। एक करोड़ और 90 लाख रुपये की डकैतियां उस जमाने में बहुत बड़ी रकम की डकैतियां थीं, आज भी हैं।

बसें बंद, थाने खाली ?

हालत यह हो गई कि पंजाब में रात को बसें चलनी बंद हो गईं। दूसरे राज्यों की बसों ने दिन छिपने के बाद पंजाब होकर जाना बंद कर दिया था। हिमाचल प्रदेश जाने वाली बसों को रात में चंडीगढ़ के नजदीक नालागढ़-बद्दी के पास के कच्चे रास्तों से होकर ले जाया जाता था। प्राइवेट गाड़ियां भी रात में पंजाब होकर नहीं जाती थीं। हालत यह थी कि 1989 में एक विवाह समारोह में हिमाचल जा रहे हम लोग रात में करीब दो बजे चंडीगढ़ पहुंचे। तो अपनी गाड़ी को बस अड्डे के अंदर पुलिस की गाड़ियों के नजदीक खड़ी करके झपकी लेते रहे। दूर से गुजरते हर शख्स के बारे में सोचना पड़ता था कि कहीं वह उग्रवादी तो नहीं है। दिन निकल आया, तो ही हमने रोपड़ और कीरतपुर होकर हिमाचल जाने के लिए कार वहां से चलाई।

थानों के ‘शटर’ भी रात में डाउन हो जाते थे। दिन छिपते ही सन्नाटा। 1991 में हम रात को दिल्ली से वैष्णो देवी के लिए चले। यह सोच कर चलते गए कि जहां कहीं कोई रोकेगा, वहीं रुक जाएंगे। किसी पुलिस वाले ने रोका नहीं और हम चलते चले गए। सुनसान पंजाब के जीटी रोड पर कार दौड़ाना अलग ही अनुभव था। जलंधर के निकट पहुंच कर एक तरफ मंदी लालटेन जला कर चाय बेच रही दुकान पर नजर पड़ी। ट्रक ड्राइवर आदि चाय पी रहे थे। मैंने भी कार साइड में लगा ली। मैंने चाय वाले से पूछा कि चाय मिलेगी। उसने हां में सिर हिला दिया। मैंने अपने सोते-जागते साथियों को कहा कि उतरो। जैसे ही वे उतरे, दुकान पर चाय पी रहे लोग प्याले छोड़ कर भाग लिए। हम लोग हैरत में रह गए। बाद में मैंने अंदाजा लगाया कि मेरे हर साथी की करीब छह फुट की हाइट देख कर चाय पीने वालों ने हमें उग्रवादी समझ लिया और भाग लिए। यह हालत थी तब।

वैष्णो देवी से लौटते हुए रास्ते में जाम मिल गया। लखनपुर बॉर्डर पार करने में ही शाम हो गई। सोचा कि पठानकोट में रुक जाएंगे। लेकिन वहां होटल वाले ठहराने को तैयार नहीं हुए। खैर, वहां से हम चल दिए। पठानकोट से जलंधर को आने वाली सड़क पर रास्ते में एक जगह थाना देख कर हम यह सोच कर रुके कि थाने के अंदर ही कार रोक कर रात गुजार लेंगे। खूब बड़े फाटक वाला थाना था, बंद था। काफी देर तक तो अंदर से कोई आया नहीं। फिर एक महाशय उंघते हुए आए और कई गालियां रसीद कर कह गए कि हमें अपनी तो यहां गारंटी नहीं है, तुम्हें कौन बचाएगा ? काफी रिक्वेस्ट करने पर उन भाई ने अंदर थाना दिखा दिया कि देख लो खाली पड़ा है। सारे बंदे कहीं-कहीं जाकर सोते हैं, यहां तो अटैक हो जाते हैं। पंजाबी भाषा में वह सब सुन कर हम चल दिए कि चलो, अब जो होगा, देखा जाएगा। लुधियाना पार करने के बाद पुलिस की कई टीमों ने नाकेबंदी कर रखी थी। हमें रोक लिया गया। एक-एक से अलग-अलग पूछताछ की गई। फिर सबसे बड़े अफसर के पास ले गए। यह संयोग था कि मैं साल भर पहले उन अफसर से चंडीगढ़ में मिल चुका था। सो, कुछ बातचीत के बाद उन्होंने जाने दिया, कहा कि बस भाग लो, एक्शन होने वाला है। फिर वापस बुला कर बोले, ओए सुण, डर नहीं लगदा, जान प्यारी नहीं है। मैंने बताया कि कहीं ठहरने की जगह नहीं मिली, इसलिए रात में ही चलना पड़ा है। खैर, जैसे-तैसे उस ‘एडवेंचर’ ड्राइविंग से हरियाणा में प्रवेश हुआ।

केपीएस गिल

अपने कार्यकाल में अपने कार्य के प्रति काफी संजीदा थे केपीएस गिल

1988 में डीजी बने गिल

इन हालात में केपीएस गिल को 1988 में पंजाब पुलिस का महानिदेशक बनाया गया था। स्वर्ण मंदिर के अंदर एक बार फिर उग्रवादियों ने एक तरह से कब्जा कर रखा था। पूरे राज्य में, दिल्ली और मुंबई तक मारामारी थी। इन हालात में गिल को कमान मिली। तब ऑपरेशन ब्लैक थंडर के तहत गिल ने स्वर्ण मंदिर को उग्रवादियों से खाली कराया। 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के तहत जहां मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था, वहां इस बार मंदिर को नुकसान नहीं हुआ। 43 उग्रवादी मारे गए। 67 ने सरेंडर किया। कुछ उग्रवादियों ने साइनाइड खाकर खुद ही जान दे दी थी। इस ऑपरेशन के बाद गिल का नाम हर तरफ हो गया। उनके दुश्मन भी बढ़ते चले गए। कई बार हमले की साजिश हूईं, कोशिशें भी हुईं। 1990 में हालात काबू में आए गए, तो गिल को सीआरपीएफ में ले आया गया। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें फिर से पंजाब की कमान दी गई। उग्रवाद दोबारा जोर पकड़ गया था। कुछ लोग तो कहते हैं कि 1991 में भी उग्रवाद पहले की ही तरह पीक पकड़ गया था। गिल ने पंजाब पुलिस के कमांडो की पूरी की पूरी बटालियन तैयार की थीं। स्पेशल क्रैक टीम बनाई गई थीं। हर गली मुहल्ले तक सूचना तंत्र तैयार किया गया था। सूचनाएं मिलती थीं और एक्शन होते थे। लोग भी उग्रवाद से तंग आने लगे थे, इसलिए सूचनाओं में वृद्धि होती जा रही थी। हालात काबू में होते जा रहे थे। इस तरह उग्रवाद पर जीत हासिल करने के बाद गिल 1995 में पंजाब से ही रिटायर हुए।

विवाद और कई जगह सलाहकार 

विवादों के साथ भी गिल का करीबी रिश्ता रहा। उनकी लाइफ स्टाइल पर सवाल लगाए जाते थे। चंडीगढ़ में एक नाइट पार्टी में एक महिला आईएएस अधिकारी को छेड़ने के मामले में भी वह फंसे। उग्रवादियों के धड़ाधड़ हुए एनकाउंटर्स को लेकर गिल पर मानवाधिकार हनन के आरोप भी देश और विदेश में लगे। इस सबके बावजूद साल 2000 में श्रीलंका सरकार ने उनकी सेवाएं लेते हुए लिट्टे के खिलाफ वही पंजाब वाली रणनीति अपनाई। 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद भी राज्य सरकार ने गिल को सुरक्षा सलाहकार बनाया और हालात जल्द ही काबू में आ गए। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने भी गिल की सलाह के आधार पर काम किया। और भी कई ऐसे उदाहरण हैं। आखिर में यही का जा सकता है कि तमाम खतरों, विवादों और आरोपों के बावजूद गिल हर स्थिति से बेखौफ हो कर लड़े। उन्होंने 1993 में एक शेर कहा था। वह शेर अकसर याद आता रहता है। गत 26 मई को उनके निधन के बाद से लगातार याद आ रहा है। 1993 में दिल्ली क्राइम रिपोर्टर्स के एक कार्यक्रम में गिल ने कहा था,  ‘हम भी बच सकते थे घर में रह कर, हमको भी मां-बाप ने पाला दुख सह-सह कर…..`

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