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कश्मीर: तारीफ की हकदार है सेना

जम्मू-कश्मीर पुलिस
फाइल फोटो

अनुच्छेद 370 के हटाये जाने के बाद कश्मीर में सफलता या विफलता सामान्य जवानों एवं पुलिसवालों पर निर्भर करेगी, चाहे वह सेना का जवान हो, चाहे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल या फिर जम्मू-कश्मीर पुलिस का जवान हो। प्र शहर एवं स्थान पर, पूरे दिन और पूरी रात केवल वही मुस्तैदी से जी लगा कर नजर रखता है कि स्थानीय लोग अपने काम धंधों पर जा रहे हैं या फिर किसी दुस्साहस या दुर्व्यवहार के लिए तैयार हो रहे हैं। जवान सशस्त्र है, उन्हें जानकारी दी जा चुकी है, प्रशिक्षित है, प्रत्याशित या अप्रत्याशित की अपेक्षा कर रहा है। बहरहाल किसी भी दुर्घटना को लेकर उसकी प्रतिक्रिया मानवीय हो सकती है और उसका रणनीतिक प्रभाव हो सकता है।





वह अपने परिवार से दूर है, एक अनजान माहौल में है, हमेशा तनाव में है और पूरी तरह चौकस रहता है और कई मामलों में अकेला या छोटी संख्या में तैनात किया जाता है। घर के साथ उसका संपर्क संचार व्यवस्था के ठप होने के कारण नियंत्रित है और अपनी ड्यूटी के बाद अपने घर की जानकारी प्राप्त करने एवं अपनी खैर खबर देने के लिए कुछ खुले लैंडलाइन कनेक्शन का उपयोग करने के लिए प्रतीक्षारत लंबी कतारों में खड़ा रहता है। घर की समस्याएं एवं तनाव उसे भी उतना ही प्रभावित करते हैं जितनी किसी अन्य स्थानीय नागरिक को, फिर उसे इस बात की फिक्र बनी रहती है कि उसे सतर्क बने रहने और गलती न करने की जरुरत है जिसका राष्ट्रीय छवि पर प्रभाव पड़ सकता है।
किसी भी परेशानी की सूरत में, उसे निर्देश दिया जा सकता है कि उसे किस प्रकार कदम उठाना है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति और प्रशिक्षण उसका एवं उसकी प्रतिक्रियाओं को दिशानिर्देशित करते हैं। तुरंत गोली चला देने जैसा एक कदम जिससे अनुचित रूप से कोई हताहत हो जाए, किसी ऐसी घटना का कारण बन सकता है जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकरी हो सकती है। कदम उठाने में देरी से वह खुद हताहत हो सकता है, जिसे वह कभी नहीं चाहेगा और इससे देश में नाराजगी पैदा हो सकती है।
जहां सीएपीएफ और जम्मू एवं कश्मीर पुलिस के जवान शहरों और गांवों में मुस्तैद रहते हैं, सेना आतंकियों की आवाजाही पर सूचना को लेकर कदम उठाती है। मोबाइल कनेक्टिविटी न होने के कारण सूचना का प्रवाह बिल्कुल थम सा गया है इसलिए कम मुठभेड़ हो रहे हैं। भर्ती किए जा चुके आतंकियों को फिलहाल अपनी गतिविधियां बंद रखने का निर्देश दिया गया होगा क्योंकि पाकिस्तान पर अभी एफएटीएफ का खतरा मंडरा रहा है।
जहां पाक घुसपैठ की कोशिशें बढा़ रहा है, सीमा पर तैनात टुकडि़यां सतर्क और तैयार हैं। वे किसी भी वक्त पाक द्वारा युद्ध विराम के उल्लंघन और संभवतः बैट (बोर्डर एक्शन टीम) की कार्रवाई की भी उम्मीद करते हैं। वे कुछ लाभ की स्थिति में हैं क्योंकि वे जो भी कदम उठाते हैं वे पाक और उसके प्रतिनिधियों के खिलाफ होते हैं इसलिए उनका कोई अंतरराष्ट्रीय दुष्परिणाम नहीं होगा, क्योंकि इसमें कोई स्थानीय शामिल नहीं हैं। इसी के साथ साथ वे अपनी जिम्मेदारियों से भी बखूबी वाकिफ हैं कि उनसे हुई किसी भी लापरवाही का नतीजा घुसपैठ के रूप में सामने आ सकता है जिससे देश के भीतर समस्या बढ़ सकती है।
भले ही सेना के जवान कश्मीर में सीएपीएफ के जवानों की तुलना में अधिक समय के लिए तैनात हों पर अपने परिवार से संपर्क करने के मामले में उनकी समस्याएं एक समान हैं। अपने घर से मोबाइल के मार्फत संपर्क करने का लाभ, जो आज के समय में अनिवार्य है, अब उपलब्ध नहीं है और उसे भी सीमित लैंडलाइन कनेक्टिीविटी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
हुर्रियत से और  पाकिस्तान अफवाहों से प्रभावित स्थानीय कश्मीरियों के लिए वहां तैनात प्रत्येक सैनिक शत्रु है और वे अपने हाथ में जो भी सामान है, उससे उन्हें निशाना बनाएंगे। जो कश्मीरी शांति और विकास के पक्षधर हैं, वही सैनिक एक वरदान है क्योंकि हिंसा के स्तरों में गिरावट आई है और घाटी वर्तमान में भारत के अधिकांश शहरों की तुलना में सुरक्षित है। ड्यूटी पर तैनात किसी जवान के लिए दोनों प्रकार के लोगों में अंतर करना मुश्किल है। मुस्तैदी के उसके स्तर में कभी कोई कमी नहीं आ सकती।
सेना, सीएपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के उच्च अधिकारियों के लिए यह तनावपूर्ण समय है। उन्हें पता है कि उनके जवानों द्वारा की गई कोई भी गलती घाटी के शांत माहौल को हिंसापूर्ण बना देगी जिसका पाकिस्तान अपने खुद के एजेंडा के लिए लाभ उठाएगा। उन्हें हमेशा सक्रिय रहना पड़ेगा, जवानों के संपर्क में रहना पड़ेगा और साथ साथ यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि जवान माहौल को समझें और कोई गलती न कर बैठें। इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना भी है कि जवानों का अपने घरों से संपर्क बना रहे और वे अपने घर की समस्याओं से परेशान न हों।
सरकार ने कदम उठाया है और अपना फैसला लिया है। प्रशासनिक अधिकारी सरकारी एजेंडा को आगे बढ़ाएंगे। बहरहाल, सबसे बड़ा दायित्व सभी क्षेत्रों में तैनात जवानों का ही है। उसके कंधों पर ही यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि कोई भी हादसा न हो और अगर ऐसा हो जाता है तो वह कानून के दायरे में रह कर और न्यूनतम बल का प्रयोग कर कदम उठाएगा। उसकी कोई भी चूक देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।

अभी तक जवानों ने अपना काम बखूबी अंजाम दिया है। उन्हें हमारे समर्थन, हमारी समझ और हमारे भरोसे की आवश्यकता है क्योंकि काम सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण माहौल में सबसे कठिन है। हमारे जवान तारीफ के हकदार हैं। हो सकता है वे ऐसा ही करते रहें जैसे उन्होंने अभी तक अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम दिया है और हो सकता है वे शीघ्रताशीघ्र घाटी में शांति बहाली सुनिश्चित कर दें।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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