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शाबाशी की हकदार है जम्मू-कश्मीर पुलिस 

जम्मू-कश्मीर पुलिस
जम्मू-कश्मीर पुलिस (सौजन्य- गूगल)

पिछले सप्ताह सुरक्षा बलों ने रिसर्च स्कॉलर से आतंकी बने हिजबुल आतंकवादी मन्नान वानी को कुपवाड़ा में मार गिराया। वानी एक रिसर्च स्कॉलर था जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जियोलॉजी में पीएचडी कर रहा था और इस वर्ष जनवरी में वहीं से गायब हो गया था। इसके बाद उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया की साइट्स पर नमूदार हुईं जिसमें उसने एक एके 47 असॉल्ट राइफल थाम रखी थी। वह घाटी में हिजबुल के शीर्ष स्थानीय कमांडरों में एक था।





आतंकी बनने के बाद वानी दक्षिण कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त था और हाल ही में वह उत्तर कश्मीर चला गया था जहां से उसकी मंशा सीमा पार कर पाकिस्तान चले जाने की थी। उसका लगातार पीछा किया जा रहा था क्योंकि एक रिसर्च स्कॉलर के आतंकी बन जाने से वह दूसरों के लिए भी प्रेरणा का सबब बन सकता था। जाड़े का मौसम करीब आ जाने से बाद में उसके लिए सीमा पार करना मुश्किल हो सकता था। दूसरी तरफ अगर उसने सीमा पार कर ली होती तो सोशल मीडिया पर उसके लेख आतंकी बनने का मंसूबा पाले युवकों की तादाद में और भी इजाफा कर सकते थे।

उसके खात्मे के बाद हिजबुल, अलगाववादी और स्थानीय नेता उसकी तारीफ करने में एकजुट हो गए। महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट किया, ‘ आज एक रिसर्च स्कॉलर ने जिंदगी की जगह मौत का रास्ता अख्तियार किया और एक मुठभेड़ में मारा गया। हम रोजाना ही पढ़े लिखे युवाओं को खो रहे हैं। वक्त का तकाजा है कि सियासी पार्टियां हालात की गंभीरता को समझें और पाकिस्तान सहित सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के जरिये इसका समाधान ढूंढने की कोशिश करें।‘

छात्रों के आतंकी बनने पर गौतम गंभीर द्वारा की गई एक टिप्पणी पर उमर ने तीखी प्रतिक्रिया जताई थी। मन्नान वानी की मौत के बाद अलगाववादियों ने हमेशा की तरह घाटी को बंद करने की अपील की। कई अलगाववादियों ने मन्नान वानी की तारीफ की। मन्नान बंदूक उठाने के अपने फैसले को सही ठहराने के लिए नियमित रूप से सोशल मीडिया पर लिखा करता था। उसके खात्मे को हिजबुल मुजाहिदीन के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि सुरक्षा बलों को आशंका थी कि अगर मन्नान वानी पाकिस्तान चला गया होता तो उसके लेखों के आधार पर पाकिस्तान अधिक से अधिक युवाओं को आतंकी बनने का रास्ता अख्तियार करने को बरगला सकता था।

मन्नान वानी ऐसी जगह का रहने वाला था जहां युवाओं के आतंकी बनने की घटनाएं अब भी कम हैं। हिजबुल और अलगाववादियों को उम्मीद थी कि उसकी मौत से वैसी ही हिंसा भड़क उठेगी जैसी बुरहान वानी  की मौत के बाद भड़की थी। जम्मू कश्मीर पुलिस ने इससे निपटने की पूर्व तैयारी की और तत्परता तथा समन्वित तरीके से अपनी योजना को अंजाम देकर इस तरह की घटना की पुनरावृति होने से बचा लिया।

सेना ने जो पहला कदम उठाया, वह यह था कि उसने सुनिश्चित किया कि कोई भी लाश की तस्वीर न खींच पाए। इससे यह तय हो गया कि सोशल मीडिया को मौका ही नहीं मिल पाया कि लोगों को भड़काया जा सके। वर्ष 2016 में बुरहान वानी की लाश की तस्वीर से ही शुरू में हिंसा भड़की थी। इससे पहले कि स्थानीय निवासियों को भनक भी लगे कि वास्तव में हुआ क्या है, मन्नान की लाश को आनन-फानन में हटा दिया गया।

इसी प्रकार, भारी भीड़ के जमा होने तथा हिंसा के भड़कने से बचाने के लिए तत्काल सभी स्कूलों एवं कॉलेजों को बंद कर दिया गया। हालात को सामान्य बनाये रखने के लिए इंटरनेट को बंद नहीं किया गया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि कोई विरोध प्रदर्शन या पत्थरबाजी की घटना नहीं हुई। शुरू में, पुलिस ने उसकी मौत की खबर का खंडन भी किया और उसे अफवाह करार दिया। हालांकि, उसकी मौत सुबह ही हो चुकी थी, लेकिन उसके परिवार को दोपहर में इसकी सूचना दी गई जब सारा कुछ बंदोबस्त हो गया।

अंत्येष्टि के काम की पूरी निगरानी की गई। केवल नागरिकों को ही उस दिशा में जाने की इजाजत दी गई। पत्रकारों को रोक दिया गया। फोटो खींचने पर पाबंदी लगा दी गई। दफनाए जाने के बाद  जब हालात सामान्य हुए, तब जाकर सड़कों को खोला गया और पत्रकारों को वहां जाने की इजाजत दी गई। बुरहान वानी की अंत्येष्टि की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर डाले जाने से ही तब इतने बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी।

जम्मू कश्मीर की पुलिस वर्षों से आतंकवाद का सामना करती रही है और अपनी गलतियों से सीखती रही है। इसने बुरहान वानी के खात्मे के बाद भड़की हिंसा से बहुत कुछ सीखा और उसने ऐसा पक्का इंतजाम किया कि फिर से उसकी पुनरावृत्ति न हो। यह बिना किसी गलती के समन्वित रूप से अंजाम दी गई योजना के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक था जिसने पाकिस्तान और अलगाववादियों के दूसरा बुरहान वानी बनाये जाने के मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया। इसने युवाओं को फिजूल की हिंसा में झोंके जाने से बचा लिया जिससे कई बेशकीमती जानों को नुकसान पहुंच सकता था।

जहां सेना आतंकियों के सफाये के अभियान का नेतृत्व करती है वहीं आतंकियों के मारे जाने के बाद भड़की हिंसा को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने की जिम्मेदारी जम्मू-कश्मीर पुलिस के जिम्मेदार कंधों पर ही आती है। इस बार उन्होंने अपनी योजना को बखूबी अंजाम दिया। राष्ट्रपति शासन एवं सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली को नीचा दिखाने के उनके इरादे धरे के धरे रह गए। पाकिस्तान की शह पर काम कर रहे स्थानीय राजनेताओं को अलग-थलग कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर पुलिस की उसकी तत्परता तथा शानदार योजनाबद्ध कार्रवाई के लिए जितनी भी सराहना की जाए कम है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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