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ऐसे सार्थक हो सकता है सशस्त्र बल ध्वज दिवस मनाना !

सशस्त्र बल ध्वज दिवस

विकीपीडिया के मुताबिक आजादी के बाद सरकार ने महसूस किया कि रक्षा कर्मचारियों, कार्यरत एवं पूर्व सैनिकों के लिए कल्याणकारी कदम उठाए जाने की जरूरत है। 28 अगस्त, 1949 को रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक कमेटी की बैठक हुई जिसमें हर साल 07 दिसंबर को ध्वज दिवस मनाने का फैसला किया गया। मूल पद्धति देश के लोगों से दान एकत्र करने और फिर उन्हें रिटर्न गिफ्ट के रूप में उन्हें छोटे ध्वज देने की थी।





आरंभिक वर्षों में सशस्त्र बल इस दिन आम जनता के समक्ष अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने के लिए समारोहों का आयोजन करते। सड़कों की क्रॉसिंग पर एनसीसी के कैडेट यूनीफॉर्म में छोटे बॉक्स लेकर खड़े रहते एवं वहां से गुजरने वाले मोटर सवार उनके बक्सों में दान डालते और बदले में उनके कपड़ों पर छोटे ध्वज टांक दिए जाते।

दिल्ली में राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की पोशाकों पर और सभी राज्यों में राज्यपालों एवं मुख्यमंत्रियों की पोशाकों पर ध्वज टांके जाते। हालांकि सशस्त्र बलों द्वारा समारोहों का आयोजन एवं एनसीसी कैडेटों की भागीदारी समाप्त हो गई है लेकिन केंद्रीय एवं राज्यों के गणमान्य व्यक्तियों पर ध्वज टांके जाने की परंपरा अभी भी कायम है।

सशस्त्र बल ध्वज दिवस के लिए 07 दिसंबर की तारीख का चयन का कोई विशिष्ट महत्व नहीं है सिवाए इसके कि इस तारीख का चयन 1949 में किया गया था। लेकिन तब से बहुत समय गुजर चुका है। सशस्त्र बलों ने कई युद्ध लड़े, विजय हासिल की तथा एक देश को आजाद भी करा दिया। अभी तक लड़ी गई सभी लड़ाइयों में दो लड़ाइर्यां सबसे अधिक याद की जाती हैं। करगिल की लड़ाई और 1971 में बांग्ला देश की मुक्ति की लड़ाई।

करगिल में जीत का जश्न 26 जुलाई को कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है और 1971 की जीत का जश्न 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन दोनों ही अवसरों पर पुष्पांजलि अर्पित करने, शहीदों को याद और सम्मानित करने तथा युद्ध स्मारकों पर मोमबत्तियां जलाने सहित पूरे देश में बहुत सारे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बहरहाल समाज के साथ जुड़ाव, जो सशस्त्र बल ध्वज दिवस का आधार रहा है, अब धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है।

इसलिए सशस्त्र बल ध्वज दिवस मनाने के लिए सही अवसर तथा यह समारोह किस प्रकार मनाया जाए, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। 1971 के युद्ध में तीनों सेनाओं के एकसूत्र में बंध कर और सक्रिय भागीदारी के साथ लड़ाई करने पर कामयाबी हासिल हुई थी। तीनों सेनाओं के जवान शहीद हुए थे इसलिए प्रत्येक सेना इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती है। अलावा इसके देश के लिए यह सबसे उल्लेखनीय विजय थी।

इसलिए विजय दिवस ही सशस्त्र बल ध्वज दिवस मनाने के लिए सबसे आदर्श दिन है। यह दिवस देश के नागरिकों को एक विशिष्ट घटना, भारतीय सशस्त्र बल की सबसे महान जीत के साथ जुड़ने में समर्थ बनाएगा। चूंकि यह आयोजन पूरे देश में किया जाता है, इसलिए लोग इस कार्यक्रम और इस अवसर से खुद को जोड़ेंगे और इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर भागीदारी हो पाएगी।

वर्तमान में जिस प्रकार से इसका आयोजन किया जाता है, वह भी ऐसे अवसर के लिए बहुत अनुकूल नहीं है। वर्तमान में नागरिकों से सोशल मीडिया, प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापनों के जरिये भी योगदान देने का आग्रह किया जाता है। लोगों को जानकारी दी जाती है कि उनके दान का उपयोग वर्तमान में कार्यरत एवं पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए किया जाएगा। आम लोगों एवं सशस्त्र बल के कार्यरत तथा पूर्व सैनिकों के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं है।

अगर इसका आयोजन विजय दिवस पर किया जाए तो देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों कोे कार्यरत एवं पूर्व सैनिकों को आमंत्रित करने का निर्देश दिया जा सकता है जो छात्रों के समक्ष शांति काल एवं यु़द्ध के समय सशस्त्र बलों की भूमिका पर बोल सकते हैं। जो पूर्व सैनिक बड़े अभियानों में शरीक रहे हैं, उनसे उनका अनुभव साझा करने को कहा जा सकता है। युवाओं को सशस्त्र बल में शामिल करने के लिए प्रेरित करने के अतिरिक्त, यह कार्यक्रम ध्वजा दिवस के लिए दान देने के एक मंच के रूप में भी करगर हो सकता है।

इसी प्रकार यही वह दिन हो सकता है जब सेना सभी छावनियों (कैंटोनमेंटों) में ‘अपनी सेना को जानो‘ मेले के आयोजन के द्वारा आम लोगों को आमंत्रित करती है। सेना लोगों की दिलचस्पी को बढ़ाने के लिए नगर के विभिन्न स्थानों पर बैंड डिस्प्ले का भी आयोजन कर सकती है।

इन सबके पीछे तर्क यह है कि जिस तरह पूरी दुनिया में होता है, उसी तरह देश भर में साल में एक दिन शहीदों एवं सशस्त्र बल के सदस्यों के नाम समर्पित कर दिया जाए। इस दिन सेना के प्रतिनिधियों को व्यापक रूप से देश भर में शैक्षणिक संस्थानों एवं नगरों में सम्मानित किया जाए। यही वह दिन होना चाहिए जब राष्ट्र को उसके बलिदानों के लिए सेना को धन्यवाद देना चाहिए। वर्तमान में भारत में ऐसा कोई दिन निर्धारित नहीं है।

खुद सशस्त्र बल द्वारा युद्ध में विजय का जश्न मनाने का कोई अर्थ नहीं है। इसका औचित्य तब होगा जब पूरा देश अपने शहीदों को याद करने और उनकी विजय का उत्सव मनाने में भाग ले। बिना किसी विशेष महत्व वाले दिन, सशस्त्र बल ध्वजा दिवस पर दान मांगना भी निरर्थक है। ऐसे दिन पर इसका आयोजन करना, जब भारत ने पाक को धूल चटाई और बांग्ला देश को मुक्त कराया, इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ा देगा और व्यापक रूप से पूरे देश को भी इससे जोड़ देगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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