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सुरक्षा बलों के विचारों को तवज्जो देना बेहद जरूरी

उपद्रवियों का जवानों की गाड़ी पर हमला

हाल की एक घटना में जब श्रीनगर में शुक्रवार की नमाज अता करने के बाद उमड़ी भीड़ ने सीआरपीएफ के एक जिप्सी वाहन पर पत्थरों से हमला किया तो जिप्सी के ड्राइवर को अपनी जान बचाने के लिए आनन-फानन में वहां से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा और इस चक्कर में उसका रास्ता रोक रहा एक उपद्रवी उसकी गाड़ी के पहिये के नीचे आकर कुचला गया। मीडिया के एक वर्ग में इस घटना को सुरक्षा बलों की ज्यादतीपूर्ण कार्रवाई के एक हिस्से के रूप में प्रचारित किया गया। हालांकि इस रिपोर्ट में उन लोगों के नजरिये से सच्चाई नहीं रखी गई, जो उस वाहन के भीतर फंसे हुए थे और जिन पर बाहर की भीड़ का शिकार बन जाने का खतरा पूरी तरह मंडरा रहा था।





उमर अब्दुल्ला ने इस घटना पर ट्वीट कर कहा, ‘इससे पहले वे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए लोगों को जीप से बांध देते थे और अब वे जीप प्रदर्शनकारियों के ऊपर ही चढ़ा दे रहे हैं। युद्ध विराम का मतलब है बंदूक का उपयोग नहीं तो अब जीप का ही इस्तेमाल करो।’ जीप तो पहले से ही शहर में थी और वहां होने के लिए अधिकृत थी। ऐसा तो नहीं है कि शहर को भीड़ के हवाले कर दिया गया है कि वे इसके साथ जो बर्ताव करना चाहें, करें। कानून व्यवस्था तो हर हाल में बना कर रखी जानी चाहिए। चाहे युद्ध विराम चल रहा हो या नहीं चल रहा हो। ऐसी ही घटना तब हुई थी जब मेजर गोगोई ने एक व्यक्ति को जीप से बांध दिया था। मीडिया ने तब सेना की बहुत आलोचना की थी  लेकिन उसने कभी भी उन मतदान अधिकारियों का विचार जानने की कोशिश नहीं की जिन्हें बचाने के लिए गोगोई ने यह कदम उठाया था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने गोगोई की काफी आलोचना की और यह दावा किया कि यह मानवाधिकार उल्लंघन का मामला था। पर उन्होंने भी उन लोगों के अधिकारों के प्रति कभी कोई चिंता नहीं जताई, जो वहां फंसे हुए थे और जिनकी जान के लाले पड़े हुए थे। मतदान अधिकारी भी स्थानीय नागरिक ही थे और सरकार की तरफ से अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए वहां भेजे गए थे, लेकिन न तो उनका कोई साक्षात्कार किया गया और न ही उनके खौफ को उजागर या प्रदर्शित किया गया।

इसी प्रकार की घटना तब हुई थी जब गढ़वाल सैनिकों की एक टुकड़ी उग्र और हिंसक भीड़ के बीच फंस गई थी, जिसने एक जेसीओ को लगभग मार ही डाला था। मजबूरन टुकड़ी को आत्म रक्षा के लिए गोलियां चलानी पड़ीं। लेकिन इस मामले में सैनिकों के खिलाफ एफआईआर की गई,  न कि पत्थरबाजों या उन्हें मार डालने का प्रयत्न करने वालों के खिलाफ। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और उसने एफआईआर को रद्द कर दिया।

जब सेना प्रमुख अपने सैनिकों की कार्रवाई पर उनका समर्थन करते हैं  तो पूर्वाग्रह से ग्रसित एवं राजनीति से प्रेरित होने के कारण नेता और मीडिया उनका विरोध करते हैं। इस प्रकार की टिपण्णियां भी की जाती हैं कि  वह सरकार के मुखपत्र या प्रवक्ता हैं और सेना द्वारा बल के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे हैं। इस तथ्य की अनदेखी की जाती है कि कितनी भी आलोचना के बावजूद वह हर अवसर पर गलत को गलत कहने में पीछे नहीं रहे हैं।

मुठभेड़ में हुई बुरहान वानी की मौत और उसके बाद भड़की हिंसा के बाद सैन्य बलों पर ताकत के अत्यधिक उपयोग का इल्जाम लगाया गया। विरोध प्रदर्शन में जो लोग घायल हुए थे  उनके साक्षात्कारों को इस प्रकार प्रचारित किया गया मानो वे केवल दर्शक मात्र थे या किसी कार्यवश घरों से बाहर निकले थे और वे न तो पत्थरबाज थे और न ही किसी प्रकार की हिंसात्मक कार्रवाई में संलिप्त थे।

अब पत्थरबाजी कोई फुटबॉल या क्रिकेट का मैच तो है नहीं जिसे दूर से बैठ कर देखा जा रहा हो। सुरक्षा बल उन्हीं को निशाना बनाते हैं जो सबसे नजदीक से पत्थर फेंक रहे हों न कि दर्शक मात्र हों। आश्चर्यजनक बात यह है कि सुरक्षा बल विरोधी विचारों को आसानी से प्रचारित कर दिया गया  जबकि हकीकत को दरकिनार कर दिया गया।

छावनी (कैंटोनमेंट) की सड़कों को आवाजाही के लिए खोले जाने की हाल की घटनाओं में भी सेना की इस कार्रवाई से स्थानीय लोगों को हुई असुविधा के बारे में खबरों को ज्यादा प्रमुखता दी गई, जबकि सड़क बंद करने के पीछे की वजहों को खास तवज्जो नहीं दी गई। यहां तक कि समाचार पत्रों के संपादकीय भी सेना के खिलाफ लिखे गए थे और उनमें दावा किया गया था कि सेना ब्रिटिशकालीन सेना की तरह बर्ताव कर रही है। एक संपादकीय में तो यहां तक धमकी दी गई कि जब ऐसे मामले खुलने ही लगे हैं तो सेना के इस प्रकार के और बहुत से राज भी फाश होने लगेंगे। रक्षा मंत्री को इस मामले में एकतरफा कार्रवाई करने के लिए जिस बात ने मजबूर किया, उनमें से एक कारण सेना के खिलाफ मीडिया का आक्रोश भी था।

बहुत दुर्लभ मामलों में ही, और मुख्य रूप से उनके द्वारा, जो स्वयं सेना का एक हिस्सा रहे हैं, अपने डरों या विचारों को व्यक्त किया गया है। यहां तक कि कैंटोनमेंट क्षेत्र में रहने वाले सैनिकों के परिवारों द्वारा व्यक्त चिंताओं की भी अनदेखी की गई। पाकिस्तान के जासूसों को अब खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए कैंटोनमेंट क्षेत्र तक पहुंच प्राप्त करने में अब बिल्कुल चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि अब छावनी के रास्ते सबके लिए समान रूप से खुल चुके हैं। सैन्य कार्रवाइयां अब प्रतिबंधित नहीं रह जाएंगी बल्कि अब सभी लोगों की नजरों के सामने प्रदर्शित की जाएंगी।

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लिए गए एकतरफा फैसले से छावनी क्षेत्रों को आवाजाही के लिए खोले जाने के लिए मजबूर करने को लेकर पुणे और बिहार में दानापुर में भाजपा के एक धड़े द्वारा आश्चर्यजनक रूप से जश्न मनाया गया। इस जश्न में, मिठाईयों का बांटा जाना एवं छावनी के अंदर से पार्टी के झंडों से सजे-धजे वाहनों का काफिला गुजारना शामिल था। विडंबना यह है कि भाजपा का स्थानीय कैडर अपनी ही सेना के खिलाफ जीत का जश्न मना रहा था, उस सेना के खिलाफ जो पिछले सात दशकों से देश के साथ दृढ़ता से खड़ी रही है।

रक्षा मंत्री अपनी ही सेना की बात को सुनने से इंकार करती हैं और छावनी में रहने वाले परिवारों की सुरक्षा की बनिस्बत वोट को अधिक महत्व देती हैं। सैन्य बलों की कार्रवाईयों पर राजनेताओं और मीडिया द्वारा इल्जाम लगाया जाता है। क्या देश का यही भविष्य है?

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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