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गृह मंत्रालय की जांच के दायरे में IPS अफसर

गृह मंत्रालय

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में अपनी तैनाती के दौरान संतोषजनक कार्य करने का प्रदर्शन न करने वाले तकरीबन 1,200 आईपीएस अफसरों का केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सीधे जांच के दायरे में लेना इस बात की ओर इंगित करता है कि केंद्र सरकार उनसे कर्तव्य पालन के दौरान निभाई गई जिम्मेदारी तथा जवाबदेही का हिसाब मांग रहा है। यह केंद्र सरकार का एक सकारात्मक कदम है। साथ ही जिन आईपीएस अफसरों ने ड्यूटी में कोताही, काहिली तथा असंतोषजनक प्रदर्शन किया है उन्हें लोकहित में समय से पहले सेवानिवृत्ति की सिफारिश भी की गई है। यह एक सार्थक व कारगर पहल है जिसका सीधा लाभ केंद्र सरकार समेत सभी राज्य सरकारों की पुलिस तथा समाज को मिलेगा। लोकसेवा के दौरान अगर जिम्मेदार बद पर बैठे अफसर केवल समय काटने के अंदाज में कुर्सी पर विराजमान रहते हैं तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में ही भलाई है। लेकिन जांच के मानक बेहद खरे व साफ-सुथरे हों इस बात का ध्यान केंद्र सरकार को रखना होगा।





दरअसल आईपीएस का पद देश के आंतरिक कानून व सुरक्षा-व्यवस्था में एक अहम तथा सम्मानित पद है। भारतीय पुलिस सेवा भारतीय लोकतंत्र का सबसे बुनियादी आधार है। आईपीएस अधिकारी समाज में जमीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था स्थापित करने, उसे बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खाकी का रौब और सृजनशील बुद्धिमत्ता किसी भी आईपीएस अफसर को सहज ही सम्मान देने में सक्षम है। जब आईपीएस अफसर समर्पण तथा प्रबल सेवाभाव के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं तो बदले में मिला सम्मान उनकी छाती को और चौड़ा कर देता है। यह अकेला पद है जो राज्य पुलिस केंद्रीय सशस्त्र बलों, जांच एजेंसियों आदि के कर्मचारियों को बल प्रदान करता है। पुलिस के किसी महकमे या सशस्त्र बल के मुखिया के रूप में जब वह लीक से हटकर कोई साहसिक काम करता है तो दूसरे के लिए नजीर बन जाता है। देश के हर जिले का पुलिस प्रमुख आईपीएस ही होता है। अमूमन सभी आईपीएस बेहद ईमानदारी, साहस और उत्साह के साथ काम करते हैं किन्तु कई अफसर विभिन्न कारणों से अपना संतोषजनक प्रदर्शन नहीं कर पाते। लिहाजा इसका खामियाजा पुलिस तंत्र व समाज के सभी वर्ग को उठाना पड़ता है। ऐसे में उनकी सेवानिवृत्ति का रास्ता एक बेहतर विकल्प है।

यूं तो भारत में पुलिस सिस्टम का इतिहास काफी पुराना है लेकिन नक्सलवाद, आतंकवाद जैसी नई चुनौतियों के बीच आईपीएस अफसर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। चाहे उनका कोई एक फरमान हो अथवा एक छोटी सी कोताही, हवा का रूख मोड़ने में सक्षम है। अपराध, उसकी एफआईआर, उसकी जांच जैसी बातों में थोड़ी सी लापरवाही समूचे राष्ट्र व सारे समाज के लिए घातक साबित हो सकती है। ऐसा होता भी है। इस बात को समझने की जरूरत भी है।

लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय को करीब 1,200 आईपीएस अफसरों को जांच के दायरे में लाने के दौरान इस बात को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा कि आखिर वे कौन सी बातें, परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से कोई आईपीएस अफसर अपना काम संतोषजनक ढंग से नहीं कर पाता। अकसर देखा गया है कि काम का दबाव, राजनेताओं की दखलअंदाजी से योग्य या ईमानदार अफसर समुचित संतुलन न बिठा पाने की वजह से अपने काम के मानकों में खरे नहीं उतर पाते। अलावा इसके बिना छुट्टी काम करने, नींद की कमी, असफल होने की भावना,पुलिसकर्मियों की निंदा, राजनीतिक आकाओं की उदासीनता, सीनियर अफसरों का साथ न देना भी तनाव, दबाव, खिंचाव का कारण बनता है और अफसर सही ढंग से काम करने में पीछे रह जाते हैं। कई बार तनाव इतना बढ़ जाता है कि आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। देश के आला पुलिस अफसर भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि बदले परिवेश में पुलिस में काम का दबाव अधिक है। गृह मंत्रालय का आंकड़ा बताता है कि देश में आईपीएस अफसरों के कुल स्वीकृत पद 4,940 हैं जबकि मौजूदा समय में 3,972 आईपीएस अफसर ही काम कर रहे हैं। यानी कि देश में 1,000 आईपीएस अफसरों की कमी है। इसके मद्देनजर केंद्र सरकार को विधिवत ढंग से दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत है ताकि आदर्श जांच के माध्यम से किसी आईपीएस अफसर को संतोषजनक काम न कर पाने के लिए कटघरे में खड़ा किया जा सके।

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