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पुराने सैन्य उपकरणों को मित्र देशों को भेंट स्वरूप देने की पहल

रक्षा मंत्रालय ने सेना मुख्यालयों को सूचित किया है कि वे पुराने हो चुके सैन्य उपकरणों एवं हथियारों की एक फेहरिस्त तैयार करें ताकि उन्हें नया जैसा बनाकर मित्र देशों को उपहार में दिया जा सके। ऐसा लगता है कि सरकार का इरादा मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना है। इसका दोहरा उद्देश्य भारत में मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स एवं गोला बारूद की सुविधाओं का सृजन करना और इस प्रकार स्थानीय रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना भी है।





अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्वास, समर्थन एवं सहायता पर बहुत ज्यादा निर्भर करते हैं। जिन देशों को भेंट स्वरूप शस्त्र और उपकरण दिए जाते हैं, उन देशों के साथ अच्छा संबंध होना लाजिमी है क्योंकि उन्हें रखरखाव, समर्थन एवं हथियारों के लिए बंदूकों एवं टैंकों के लिए भी उन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके अलावा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सैन्य सहयोग एवं कूटनीति ने भी सकारात्मक भूमिका निभानी शुरु कर दी है।

अराजकता एवं आतंकवाद से जूझ रहे अफगानिस्तान तथा अफ्रीका के कुछ देशों को सैन्य उपकरणों की आवश्यकता है ताकि वे अपनी सशस्त्र सेनाओं की सहायता कर सकें। इनमें से कई देशों के सैनिकों का प्रशिक्षण भारत के सैन्य संस्थानों में हुआ है। लिहाजा वे भारतीय सैन्य युद्ध सामग्रियों  से बखूबी वाकिफ हैं। आतंकी समूहों के पास ऐसे शस्त्र नहीं हैं इसलिए शक्ति संतुलन सुरक्षा बलों के पक्ष में चला जाएगा और उनकी क्षमताओं को बढ़ाएगा। इन देशों के पास विश्व बाजार से आधुनिक शस्त्र खरीदने के लिए धन नहीं हैं, इसलिए उन्हें ऐसे हथियार, जिन्हें हम चरणबद्ध तरीके से हटा रहे हैं, भेंट स्वरूप देने से दोनों देशों के राजनयिक संबंधों में मजबूती आएगी।

वर्तमान में भारतीय सशस्त्र बलों के पास उपलब्ध हथियारों में से 68 प्रतिशत से अधिक पुराने किस्म के और अप्रचलित हैं लेकिन फिर भी उनका इस्तेमाल किया जा रहा है क्योंकि सेना के पास आधुनिकीकरण के लिए पर्याप्त फंड नहीं हैं। भारत ने अपने INSAS राईफलों का नेपाल व यमन तथा एचएएल ध्रुव हेलिकॉप्टरों को मॉरीशस, नेपाल एवं इक्वाडोर को निर्यात किया है तथा अफगानिस्तान को MI24 एवं 35 हेलिकॉप्टर उपहारस्वरूप दिए हैं। ऐसे और कई दूसरे देश हैं जिनकी इच्छा ब्रह्मोस मिसाइल समेत भारत में निर्मित सैन्य उपकरणों को पाने की है।

टैंक, Artillery guns तथा वायुयान जैसे भारी सैन्य उपकरण जो सेना के उपयोग से बाहर हो जाते हैं, लंबे समय तक डिपो में पड़े रहते हैं और कई मामलों में संस्थानों एवं सैन्य शिविरों में सजावटी या प्रेरक वस्तुओं के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं। कुछ को कबाड़ के बतौर बेच दिया जाता है और उनकी धातु का फिर से उपयोग कर लिया जाता है। बहरहाल, भले ही ये उपकरण अप्रचलित हो गए हों और भारत के वर्तमान संचालनगत (Operational) परिदृश्य में अपनी सर्वश्रेष्ठ उपयोगिता की अवधि पार कर चुके हों, लेकिन इनका उपयोग अभी भी किया जा सकता है और विश्व के कई हिस्सों में फिर से उपयोग किए जाने के लिए उपयुक्त हैं, जहां दुश्मन या तो मजबूत आतंकी समूह है या वहां आधुनिक आग्नेयास्त्रों का अभाव है।

उदाहरण के लिए, 105mm की Artillery guns, टैंक एवं Armoured personnel carriers अफगानिस्तान एवं अफ्रीका के कुछ देशों में मजबूत आतंकी समूहों के खिलाफ इस्तेमाल में लाए जाने के लिए आदर्श हैं। उन्हें इन हथियारों को उपहार में देने से भारत को कई लाभ हासिल होंगे। इससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ेगा, आपसी भरोसे का निर्माण होगा, भारत के लिए उन देशों में प्रशिक्षण एवं रखरखाव सुविधाओं की स्थापना के दरवाजे खुलेंगे तथा यह भारत को हथियारों एवं स्पेयर पार्ट्स के निर्माण एवं उनके रखरखाव के लिए उद्योग की स्थापना करने में भी सक्षम बनाएगा। जहां वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, ज्यादातर उपकरणों का रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स का निर्माण ऑर्डिनेंस फैक्टरियों द्वारा किया जाता है, सरकार संभवतः उत्पादन का दायित्व निजी क्षेत्र को सौंप देगी और इस प्रकार, ‘मेक इन इंडिया‘ की अवधारणा का समर्थन करेगी।

इन देशों की सेनाओं में भारत के शस्त्रों के शामिल होने से यह भी सुनिश्चित हो जाएगा कि भविष्य में वे लगातार उपकरणों की सहायता एवं आपूर्तियों के लिए भारत पर ही निर्भर रहेंगे। इस प्रकार, जैसाकि पिछले कई दशकों से चला आ रहा भारत-रूस सहयोग दर्शाता है कि ऐसा देश भारत के साथ अपने रिश्तों को कभी भी खराब नहीं होने देगा या भारत के हितों के खिलाफ कार्य नहीं करेगा क्योंकि इससे स्पेयर पार्ट्स और हथियारों की आपूर्ति प्रभावित हो जाएगी।

जहां सशस्त्र बल सरकार की घोषणा से हैरत में पड़ सकते हैं, निश्चित रूप से यह ऐसा संकेत देने का एक तरीका प्रतीत हो रहा है कि सरकार अन्य देशों के साथ सैन्य सहयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहरहाल, पुराने हो चुके सैन्य उपकरण रखरखाव में भी सस्ते हैं और भरोसेमंद भी हैं, लेकिन वायु शक्ति एवं नौसेना के उपकरण जैसे-जैसे पुराने होते जाएंगे, उनका रखरखाव और महंगा होता चला जाएगा। जिस देश को उपहार दिया जा रहा है, वह इसके रखरखाव एवं स्पेयर पार्ट्स के लिए भुगतान करने में भी सक्षम है या नहीं, इस पर भी निश्चित रूप से पहले ही विचार कर लिया जाना चाहिए।

अगर सरकार उपहार प्राप्त करने वाले देशों से यह वादा करती है कि वह रखरखाव के लिए भी जिम्मेदार बनी रहेगी तो फिर यह एक महंगा सौदा साबित होगा जो दीर्घकालिक रूप से व्यावहारिक नहीं रह पायेगा। ऐसी सूरत में इस पूरी कवायद का नतीजा सकारात्मक न होकर नकारात्मक निकलेगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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