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साइबर और अंतरिक्ष युद्ध क्षमताओं के विकास की पहल

साइबर वार

सशस्त्र बलों द्वारा संचालित किए जाने वाले साइबर और अंतरिक्ष कमानों के निर्माण को सरकार की मंजूरी सही दिशा में उठाया गया एक छोटा कदम है। इस काम को एक दशक पहले किया जाना चाहिए था। बहरहाल राष्ट्रीय सुरक्षा में बढ़ाने में दिलचस्पी की कमी की वजह से इसमें देरी होती गई। इसके सृजन के तुरंत बाद सेना ने भारतीय रक्षा विश्वविद्यालय के साथ मिल कर एक साइबर युद्ध कार्यशाला का आयोजन किया।





इस कार्यशाला का शीर्षक था, ‘ प्रभावशाली संगठनों द्वारा प्रौद्योगिकी का दोहन एवं उनका मुकाबला करने के लिए अपने बलों की क्षमताओं का निर्माण‘। इस कार्यशाला में पुलिस, खुफिया एजेन्सियों एवं अन्य सेवाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह नवसृजित साइबर युद्ध कमान का आरंभिक बिन्दु था और इसने ‘ आतंकी संगठनों द्वारा विश्व भर में प्रौद्योगिकी का दोहन, डार्क वेब का दोहन, हाइब्रिड युद्ध को सरकार का समर्थन, आतंकरोधी अभियानों में प्रौद्योगिकी के दोहन की वर्तमान क्षमता एवं भविष्य के रुझानों‘ को कवर किया।

इसी के साथ वह घोषणा थी कि सरकार ने रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी की व्यापक रूपरेखा को अंतिम रूप दे दिया है। इसे अंतरिक्ष युद्ध अस्त्र प्रणालियों एवं प्रौद्योगिकियों के सृजन का दायित्व सौंपा गया है। इसकी संरचना में नवसृजित त्रि-सेना रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (डीएसए), जिसका निर्माण अंतरिक्ष में युद्ध लड़ने के लिए किया गया है, के घनिष्ठ सहयोग के साथ काम कर रहे वैज्ञानिकों की एक टीम शामिल है। ऐसी उम्मीद है कि यह ए-सैट क्षमता (अंतरिक्ष में उपग्रहों को मार गिराने वाले हथियार), जिसका भारत ने हाल ही में प्रदर्शन किया, सहित सभी अंतरिक्ष ऐसेट को कमान करेगी।

जहां भारत विद्वेषी ताकतों के खिलाफ देश की रक्षा करने के लिए तथा अपने हितों के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए संरचनाओं का निर्माण कर रहा है, इसने युद्ध के आधुनिक आयामों की अनदेखी की है। पाकिस्तान और चीन दोनों ही विषम और हाइब्रिड युद्धकला, जोकि भविष्य की युद्धकला हो सकती है, में अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं। साइबर हमले राष्ट्रीय नेटवर्कों एवं संस्थानों को पंगु बना रहे हैं और यह सैन्य हमले, जो सफल नहीं भी हो सकता है, की तुलना में अधिक विध्वंसक हो सकता है। इसका अर्थ यह होगा कि वे अपने लाभ के लिए भारत की ताकतों के बजाये उसकी कमजोरियों का लाभ उठाएंगे। इसलिए, भौतिक सुरक्षा के साथ साथ साइबर और अंतरिक्ष भविष्य के युद्ध के उपकरण बनते जा रहे हैं जिसके लिए भारत को पूरी तरह तैयार रहने की जरूरत है।

जिन एजेंसियों का निर्माण किया गया है, वे अभी भी उस स्तर के नहीं हैं जिस स्तर का उन्हें होना चाहिए क्योंकि सरकार ने रक्षा के शीर्ष प्रबंधन के आधुनिकीकरण को कार्यान्वित करने में देरी कर दी है। आदर्श रूप से, उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल और समकक्षों की अगुवाई में होना चाहिए तथा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के तहत रखा जाना चाहिए था। यह उनके प्रमुखों को कड़े फैसले लेने, मंजूरी के लिए और आगे कदम बढ़ाने के लिए किसी और का मुंह ताकने के बजाये खुद निर्णय लेने में सक्षम बनाता। बहरहाल, सरकार द्वारा सेनाओं को एकीकृत करने और एक सीडीएस को नियुक्त करने में हिचकिचाहट प्रदर्शित करने के कारण इन कमानों की जिम्मेदारी सीमित हो गई है।

भारत को इन क्षेत्रों में जो लाभ हासिल है, वह है अंतरिक्ष के मामलों में इसरो के पास उपलब्ध मजबूत आधार और निजी क्षेत्र में हासिल विशेषज्ञता जिसका उपयोग साइबर युद्ध के लिए किया जा सकता है। आरंभ में, सशस्त्र बल इस वर्ष जुलाई में डीएसए के तत्वाधान में इंडस्पेसएक्स के नाम से अब तक का पहला कृत्रिम अंतरिक्ष युद्ध अभ्यास का संचालन करेंगे।

इस अभ्यास का उद्देश्य अंतरिक्ष सुरक्षा डोमेन में वर्तमान एवं उभरती चुनौतियों की एक बेहतर समझ हासिल करना है। यह उन क्षमताओं के निर्धारण में भी सक्षम बनाएगा जिसे विकसित करना भारत को अपने ऐसेट्स की रक्षा करने एवं अपने राष्ट्रीय हितों की हिफाजत करने के लिए जरुरी है।

इसकी शुरुआत धीमी हो सकती है, नामित नियुक्तियां अपेक्षित रैंक की नहीं हो सकती हैं, फिर भी कम से कम एक कदम तो उठाया गया है। इन कमानों को विकसित किए जाने और उनकी प्रगति की निगरानी किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि अंतरिक्ष और साइबर भविष्य की युद्ध प्रणाली है और उनका प्रभाव वास्तविक हमले की तुलना में राष्ट्र के लिए अधिक विनाशकारी हो सकता है। वर्तमान में, भारत अपने शत्रुओं को युद्ध भूमि में डरा सकता है लेकिन उसे अंतरिक्ष और साइबर के क्षेत्रों में भी यही सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। जबकि सरकार रक्षा के शीर्ष प्रबंधन का पुनर्गठन नहीं करती और एक सीडीएस को नामित नहीं करती, ऐसे संयुक्त कमान कभी भी उस तरह से प्रभावी नहीं हो सकते जैसेकि उन्हें होना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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