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युद्ध भूमि पर्यटन में हैं असीम संभावनाएं

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971

हाल ही में जयपुर में सेना के एक वरिष्ठ जनरल ने एक संगोष्ठी में कहा कि राजस्थान को युद्ध भूमि पर्यटन से बहुत लाभ हासिल हो सकता है। वह युद्ध भूमि पर्यटन पर राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित एक दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। दुनिया भर की युद्ध भूमियां, जहां बड़ी लड़ाईयां हुई हैं, अब लोकप्रिय पर्यटन गंतव्य बन गए हैं क्योंकि वे दर्शकों के जेहन में इतिहास के उन कठिन लम्हों की याद ताजा कर देते हैं।





जो अधिकारी ब्रिटेन में कोई कोर्स करते हैं, उन्हें हॉलैंड में द्वितीय विश्व युद्ध के आर्नेहम की लड़ाई के स्थान पर ले जाया जाता है। कनाडा के उस कोर्स के एक हिस्से के रूप में, जिसमें मैं शामिल हुआ, हम लोगों को यूरोप की हमारी यात्रा के दौरान वॉटरलू की लड़ाई की जगह पर ले जाया गया। वहां एक विख्यात इतिहासकार लड़े गए युद्ध की जगह तक हम लोगों के साथ गए और लड़ाई के बारे में जानकारी दी कि किस प्रकार लड़ाई परवान चढ़ी। उस दिन वहां पर हम कोई अकेले आगंतुक नहीं थे। इससे संकेत मिलता है कि पुरानी लड़ाईयों के स्थलों का कितना महत्व है, इतिहास के लिहाज से भी और अब पर्यटन के हिसाब से भी।

भारत के पास इस मामले में बेशुमार अवसर हैं। चाहें प्राचीन काल की लड़ाईयां हों या फिर मुगल काल की लड़ाइयों के मैदान या फिर 1965 और 1971 की लड़ाइयों के मैदान। सैन्य इतिहास के छात्र या सेना को लेकर बहुत दिलचस्पी रखने वाले, जिनकी संख्या दिनों दिन बढ़ ही रही है, को इन जगहों के भ्रमण से काफी लाभ पहुंचेगा। इसके अलावा भारत में कोर्स में भग लेने वाले सैन्य अधिकारी भी इससे लाभान्वित होंगे। विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह एक और दर्शनीय स्थल साबित होगा।

अगर पर्यटन के इस पहलू पर काम किया जाता है और इसे आगे बढ़ाया जाता है तो इससे संबंधित कुछ और भी आवश्यक कार्य हैं जिनका विकास करना इन्हें पर्यटक गंतव्य के रूप में ढालने के लिए जरुरी है। इसे विकसित करने के लिए राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों ही स्तरों से संयुक्त सहायता की जरुरत है और साथ ही अनुसंधान केंद्रों के ऐतिहासिक खंडों की भी आवश्यकता पड़ेगी। हाल के युद्धों के कुछ गंतव्यों का खाका पूर्व सैनिकों की मदद से फिर से खींचा जा सकता है, जिन्होंने उन युद्धों में भाग लिया था।

ज्ञात युद्ध भूमियों के लिए बुनियादी ढांचे एवं सड़कों के विकास की आवश्यकता है। इसके आसपास के क्षेत्रों में युद्ध की स्मृति चिन्हों एवं मानचित्रों, पेंटिग्स तथा चित्रों (जहां संभव हो) के साथ संग्रहालयों की स्थापना की जा सकती है। नजदीक में ही स्मारिका वाली दुकानों को बसाया जा सकता है। इरादा और कोशिश यह होनी चाहिए कि भ्रमण को दिलचस्प और यात्रा के लायक बनाया जा सके।

इस कार्य में प्रगति हो, इसके लिए राज्य सरकारों और इतिहासकारों को लड़ाई की प्रगति का अध्ययन करने की आवश्यकता है। गाइडों को शिक्षित बनाये जाने की आवश्यकता है जिससे कि वे दर्शकों को यथार्थपूर्ण तरीके से चीजों को समझा सकें। अगर युद्ध से संबंधित मामला स्वतंत्रता के बाद का है तो देश की पश्चिमी सीमा से सटे क्षेत्र आदर्श पर्यटन गंतव्य हो सकते हैं, विशेष रूप से, जहां 1965 एवं 1971 के युद्धों के पाकिस्तानी हथियारों के अवशेष अभी मौजूद हैं। इसका एक उदाहरण पैटन नगर है।

देश में पहले से ही किलों और महलों की एक समृद्ध विरासत है जिनमें से कई ऐतिहासिक लड़ाइयों के स्थल हैं। इन जगहों पर रहने वाले गाइड आम तौर पर उस युग की युद्ध प्रणाली से अनजान हैं। अधिकांश पर्यटक महलों की भव्यता एवं वास्तु कला को देखने आते हैं, बहुत कम पर्यटक ही ऐतिहासिक युद्धों के स्थान को देखने आते हैं क्योंकि न तो उन्हें ब्रोशर में हाइलाइट किया जाता है और न ही वे यात्रा कार्यक्रम के ही हिस्से होते हैं।

भारत में प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक युद्ध के मैदान रहे हैं। भारत का इतिहास प्रतिद्वंदी राजाओं के बीच लड़ाईयों और युद्धों से अटा पड़ा है। आजादी मिलने के बाद से भारत ने कई लड़ाईयां लड़ी हैं। जहां 1962 के युद्ध के स्थान और कश्मीर जाने की पर्यटकों को इजाजत नहीं दी जा सकती, पश्चिमी सीमा पर तथा आंतरिक स्थानों पर अधिकांश अन्य युद्ध के मैदानों को पर्यटक स्थलों में तब्दील किया जा सकता है।

इन स्थानों को विकसित करने एवं पर्यटन के इस पहलू का लाभ उठाने के लिए राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों को ही इच्छा शक्ति एवं संकल्प प्रदर्शित करनी होगी। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और क्षेत्र का विकास भी होगा। राजस्थान में ऐसे कई स्थान हैं जो विकसित होने के बाद शेष देश के लिए भी इस प्रकार का चलन स्थापित करने वाले साबित हो सकते हैं।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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