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हजार के बदले हजार सैल्यूट!

फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा (28/01/1899 – 15/05/1993)

देश के पहले फील्ड मार्शल और भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (के. एम. करिअप्पा) जितने कड़क योद्धा थे, उतने ही दयालु भी। अनुशासन ऐसा कि वह जूनियर और सीनियर में भेद नहीं करते थे और निष्पक्षता ऐसी कि अगर बेटे ने भी गलत किया है तो वही सजा उसे भी मिलेगी जो किसी अन्य के लिए मुकर्रर होगी। उनके बारे में बहुत से ऐसे दिलचस्प किस्से सुने-सुनाए जाते हैं जो मानवीयता और अनुशासन की नई इबारत लिखते हैं और वर्तमान हालात में जब ‘सहायक’ सिस्टम पर डिबेट हो रही हो तो यह प्रासंगिक हो जाता है।





ऐसा ही एक किस्सा आज हम आपको बता रहे हैं जो प्रेरक भी है और सबक भी। एक बार एक युवा अधिकारी राउंड पर था… एक गोरखा रायफलमैन ने ध्यान नहीं दिया और सैल्यूट करने से चूक गया। सेना में इसे अनुशासनहीनता माना जाता है। उस रायफलमैन से अनुशासनहीनता तो हो चुकी थी। अब क्या!

मिलिए, भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल और कमांडर-इन-चीफ के एम करिअप्पा से

उस अधिकारी का अहं आड़े आ गया। अनुशासन के नजरिए ये सही भी था। बस फिर क्या था उस गोरखा को अफसर ने तलब कर लिया। सैल्यूट न करने का कारण पूछा। गोरखा ने भोलेपन से कारण बता दिया कि वह ‘लेफ्टिनेंट हुजूर’ को देख नहीं पाया।

अफसर इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। गोरखा को हजार सैल्यूट करने की सजा दे दी। अब जवान क्या करता… तत्काल सैल्यूट करना शुरू कर दिया… फील्ड मार्शल करिअप्पा वहां से गुजर रहे थे। देखा… जवान सैल्यूट किए जा रहा है? वह चौंके। अफसर से पूछा ये क्या कर रहा है? अफसर ने कहा, ‘सर, इस जवान ने मुझे सैल्यूट न करने की गुस्ताखी की है। इसलिए मैंने इसे एक हजार सैल्यूट करने का दण्ड दिया है।’

करिअप्पा ने जवाब दिया, ‘बहुत अच्छी सजा दी है, लेकिन आप भी इसके हर सैल्यूट का जवाब दीजिए।’ अगले दो घंटे तक पूरी यूनिट ने यह ‘अद्भुत’ नजारा देखा कि कैसे गोरखा जवान और वह अफसर एक-दूसरे को सैल्यूट कर रहे हैं।

किस्से का सार यह कि सम्मान इकतरफा नहीं… दोनों तरफ से होता है।

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