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भारत के खिलाफ इमरान खान की बेढंगी नीति

इमरान खान
फाइल फोटो

पाकिस्तान में कुछ तो गड़बड़ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की टिप्पणियां अलग-अलग होती हैं और अक्सर अतार्किक होती है। इमरान लगभग रोजाना विविध मंचों से कश्मीर पर अपना बेसुरा राग अलापते और रोते रहते हैं। उनके बयानों की सुई लगती है कि नाभिकीय युद्ध पर अटक गई है जिससे दुनिया प्रभावित होगी और इसलिए उनकी इच्छा है कि वैश्विक शक्तियां भारत को अपना फैसला बदलने के लिए मजबूत करें। पर इसी के साथ साथ वह अपने विदेश और मानवाधिकार मंत्रियों को यह भी निर्देश देते हैं कि वे संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक विभाग को यह बताते हुए पत्र लिखें कि कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। अपनी बात को साबित करने के लिए वह भारत के विपक्षी नेताओं को उद्धृत भी करते हैं।





एक बयान में वह जिक्र करते हैं कि दुनिया भारत के साथ बेहतर आर्थिक रिश्तों की वजह से कश्मीर को नजरअंदाज कर रही है। अगले ही क्षण वह कहते हैं कि दुनिया कश्मीर पर ध्यान दे रही है। इमरान ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में संपादकीय पेज पर लिखे एक लेख में दुनिया को भारतीय कार्रवाईयों के दुष्परिणामों को लेकर आगाह किया। इसी के साथ साथ उन्होंने यह भी जिक्र किया कि जब तक भारत अपना फैसला नहीं बदलता है, वह भारत के साथ बातचीत नहीं करेंगे। हालांकि भारत ने बातचीत करने का कोई उल्लेख भी नहीं किया है और इससे अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत मिलता है कि वह बातचीत करने के लिए बेचैन हैं। वह खुद को कश्मीर का प्रवक्ता भी नियुक्त कर लेते हैं।

उनके विदेश मंत्री ने बीबीसी को एक साक्षात्कार में भारत के साथ बातचीत करने के लिए चार शर्तों का उल्लेख किया। युद्ध की तमाम धमकियों के बावजूद उनकी सरकार करतारपुर गलियारे पर लगातार बातचीत कर रही है जबकि राजनयिक संबंधों में कमी आ गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पाक को उम्मीद है कि वह पाक गलियारे का इस्तेमाल खालिस्तान के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करेगा।

उनकी हताशा उन्हें एक राष्ट्रीय संबोधन में यह घोषणा करने को मजबूर करती है कि सभी पाकिस्तानियों को प्रत्येक शुक्रवार को आधे घंटे के लिए अपना काम छोड़ देना चाहिए और कश्मीर के लिए एकजुटता में खड़े रहना चाहिए। इस घोषणा का सकारात्मक प्रभाव केवल सरकारी कार्यालयों और स्कूलों में देखने को मिला जहां सरकार बलपूर्वक इसे लागू करा सकती थी। जब उसने देखा कि भारत उसकी नौटंकियों पर ध्यान नहीं दे रहा है तो इमरान ने अब असम में जारी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर ट्वीट करना शुरु कर दिया है। इस मामले में वह अल्पसंख्यकों को समर्थन देने का संकेत दे रहे हैं।

जो लोग उनकी बेतुकी बयानबाजी पर गौर कर रहे हैं, उन्हें ऐसा लग सकता है कि इमरान के विचार अतार्किक हैं। लेकिन यह सच नहीं भी हो सकता है। वह अच्छा परिणाम देने के लिए बुरी तरह सैन्य और राष्ट्रीय दबाव में हैं। उनकी किसी भी कार्रवाई का कोई परिणाम नहीं निकल रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के साथ खड़ा है और उनके तथा उनके मंत्रियों के प्रलापों की अनदेखी कर रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान के करीबी सहयोगी भी भारत के साथ खड़े हैं।

आर्थिक रूप से पाक पतन की ओर बढ़ रहा है। एफएटीएफ की समीक्षा का समय करीब आ रहा है, जिससे पाक के पास एकमात्र विकल्प अपनी कमियों को दूर करने के लिए और ज्यादा समय मांगना रह गया है। घाटी में इंटरनेट के ब्लॉक होने के कारण विरोध का स्तर और प्रकृति अपेक्षाकृत शांत है। विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय निकायों ने अनकी अपीलों की अनदेखी कर दी है और किसी भी देश ने कश्मीर को लेकर भारत से कोई बातचीत भी नहीं की है।

जिस सेना के दम पर उनकी गद्दी बची हुई है, वह आतंकियों को वांछित स्तर तक भेज पाने में सफल नहीं हुई है क्योंकि उसे डर है कि एफएटीएफ की आगामी बैठक में उसकी रैकिंग और कम हो जाएगी। शामिल किए गए आतंकियों को अक्तूबर के आखिर तक शांत रहने को कहा जाएगा जबव तक कि एफएटीएफ की बैठक समाप्त नहीं हो जाती। यही वजह है कि उनके रेल मंत्री शेख राशिद ने अक्तूबर/नवंबर में युद्ध की बात की है। संयुक्त राष्ट्र की आम परिषद की बैठक सितंबर के अंत में होगी और अगर तब तक कश्मीर शांत रहता है तो इमरान के हाथ पांव फूल जाएंगे। वह इतिहास में अपना नाम दूसरे विफल नियाजी के रूप में नहीं देखना चाहेंगे। पहले ने पूर्वी पाकिस्तान को खो दिया तो इमरान खान नियाजी ने कश्मीर को खो दिया।

वह वाकिफ हैं कि कश्मीर का कोई सैन्य समाधान नहीं हो सकता। उनका एकमात्र विकल्प कश्मीर मामले को लगातार उठाते रहना है जिससे भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ सके। उन्हें पता है कि एक गलत सैन्य कार्रवाई पाक के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है, इसलिए पाक को बचाने के लिए वह दावा करते हैं कि भारत पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। इमरान ने हाल ही में बाजवा को तीन सालों का सेवा विस्तार दिया है और उस एकमात्र अधिकार को खत्म कर दिया जो सेना पर उनका बना हुआ था।

अब बंदूक स्पष्ट रूप से बाजवा के हाथों में है। वह देश पर कब्जा करना न भी चाहें लेकिन अगर इमरान की नौटंकी सफल न हुई तो वह उन्हें कार्यमुक्त करने पर विचार कर सकते हैं। प्रतीक्षा की कतार में कई लोग खड़े हैं जिनमें कुरैशी सबसे आगे हैं। इसलिए इमरान को किसी न किसी तरह कोई परिणाम देना ही होगा। प्रत्येक गुजरते दिन के साथ खतरा बढ़ता ही जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की बैठक तक उनके पास समय है। अगर वह तब तक समर्थन हासिल नहीं कर सके तो उनकी रवानगी तय है।

पाकिस्तान के इतिहास में कोई भी प्रधानमंत्री कभी भी सेवानिवृत्त नहीं हुआ है और शांतिपूर्ण जीवन नहीं गुजारा है। वे या तो जेल की सींखचों के पीछे चले जाते हैं या उन्हें मार दिया जाता है या फांसी पर लटका दिया जाता है। इमरान की हताशा और उनके अनर्गल प्रलापों से अस्तित्व के लिए उनके संघर्ष का संकेत मिलता है। भारत को केवल उसकी उपेक्षा करनी चाहिए।

 

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