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इमरान खान का अमरीका दौरा और भारत

ट्रंप और इमरान खान

इमरान खान इस सप्ताह अमरीका का दौरा करेंगे। वहां 22 जुलाई को वह ट्रम्प से मिलेंगे। पाकिस्तान का विदेश कार्यालय इसे पाक-अमरीका संबंधों में एक महान परिवर्तनकारी बिन्दु की तरह पेश कर रहा है। यह मुलाकात ऐसे वक्त पर हो रही है जब पाक जबर्दस्त आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारत के साथ उसका तनाव बदस्तूर बना हुआ है और अमरीका तथा तालिबान नेतृत्व के बीच शांति वार्ता की प्रगति सुस्त है। पाक एफएटीए काली सूची से भी खुद को अलग रखने के लिए संघर्ष कर रहा है जबकि वह ग्रे सूची में बना ही हुआ है। पाक के पास केवल दो ही बड़े सहयोगी देश  चीन और सऊदी अरब बच गए हैं।





करतारपुर साहिब गलियारे पर हाल की बैठकों और ट्रैक-2 डिप्लोमैसी आरंभ होने के बावजूद भारत-पाक संबंधों में तनाव बना हुआ है। हालांकि उसने अपने एयरस्पेस को खोल दिया है लेकिन उसे दूसरे भारतीय स्ट्राइक का खौफ बना हुआ है। उसने दो स्ट्राइक का तो खंडन कर दिया है पर उसे पता है कि तीसरे का खंडन नहीं कर पाएगा।

ट्रम्प जबसे सत्तासीन हुए हैं  हमेशा पाक पर तालिबान को लेकर डबल गेम खेलने और अमरीकी धन का उपयोग तालिबान को फंड करने में लगाने का आरोप लगाते रहे है। इसलिए उन्होंने अमेरिका में पाक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए फंड सहित पाक को सभी प्रकार की सहायता रोक दी है। ट्रम्प ने तालिबान नेतृत्व के साथ पाक के संपर्क के अभाव को उसका दिखावा बताया है। यह झांसा कारगर हुआ और पाक ने तालिबान को बातचीत करने के लिए आगे बढ़ाया। बहरहाल उसने न तो अफगानिस्तान में तालिबान की कारगुजारियों को समर्थन देना बंद किया है और न ही आंतकी समूहों और उसके सरगनाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई की है जो कश्मीर में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं।

इमरान ट्रम्प से मिलने के लिए बेताब हैं। वह उनके साथ कुछ एजेंडा बिन्दुओं को आगे बढ़ाएंगे जिसमें भारत पमुख एजेंडा है। आधिकारिक रूप से इमरान ट्रम्प को आईएमएफ का ऋ़ण जारी करने के लिए धन्यवाद देने जा रहे हैं जिसे ब्लॉक करने की ट्रम्प ने धमकी दी थी और दावा किया था कि पाक इस ऋण का उपयोग चीन के कर्ज को चुकता करने में करेगा। इसके अतिरिक्त, वह अमरीका को विशेष रूप से पाक सेना से संबंधित उसकी सहायता और अनुदान फिर से आरंभ करने का अनुरोध करेगा क्योंकि पाक की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक है और उसके पास सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सीमित फंड हैं। पाक अमेरिका से एफएटीएफ पर दबाव डालने की भी गुजारिश करेगा जिससे कि वह पाक को ग्रे सूची से हटा दे।

वह बलुच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को एक आतंकवादी संगठन करार दिए जाने के लिए अमरीका को धन्यवाद देने के लिए बेताब हैं, जोकि संभवतः तालिबान को बातचीत के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पाक को अमरीका का धन्यवाद है। इससे पाक को फायदा होगा क्योंकि यह उनके खिलाफ अपने सैन्य अभियानों को बढ़ा सकता है, उसके जबरन गायब होने की संख्या बढ़ा सकता है और उसके सदस्यों को आसानी से विदेशों में शरण लेने से रोक सकता है। वह निश्चित रूप से यह शिकायत करेगा कि भारत ही अब आतंकी समूह घोषित हो चुके बीएल को फंड उपलब्ध करा रहा है। वह कुलभूषण की गिरफ्तारी को इसके सबूत के रूप में पेश करेगा और चाहेगा कि अमरीका इसके लिए भारत को चेतावनी दे।

अफगानिस्तान के मामले में इमरान का एक सूत्री एजेंडा होगा। पाकिस्तान अमरीका की प्रत्येक कार्रवाई का समर्थन करेगा और तालिबान पर अमरीका के अनुकूल समझौता करने के लिए दबाव डालेगा बशर्ते कि अमरीका यह वादा करता है कि वह भारत को अफगानिस्तान से दूर रखेगा। चार देशों-अमरीका, रूस, चीन और पाकिस्तान के समूह का गठन इसे कुछ गुंजाइश और नियंत्रण देगा। पाक ने महसूस किया है कि अफगानिस्तान के भीतर भी भारत की बेहतर प्रतिष्ठा और स्थिति है जितनी पाक की अभी तक कभी नहीं रही है।

भारतीय निवेश, विकास परियोजनाओं, शिक्षा छात्रवृत्तियों, चिकित्सा सहायता और सॉफ्टपावर ने आम अफगानियों का दिल जीत रखा है जबकि पाक को वे दुश्मन मानते हैं जो उनका विनाश चाहता है। इसलिए ऐसी कोई भी सरकार जो तालिबान के गठबंधन में आएगी, उसके भारत की तरफ अधिक झुकने की उम्मीद है। अफगानिस्तान को अपनी सामरिक गहराई समझने की पाक की धारणा अब समाप्त हो चुकी है। पाक को यह मंजूर नहीं है लेकिन उसके नियंत्रण में कुछ रह नहीं गया है।

भारत के साथ तनाव पाक को उससे अधिक आहत कर रहा है जितना बताया जा रहा है। ओवरफ्लाइट से इसकी आय को जबर्दस्त आर्थिक नुकसान हुआ है, इसके बलों की आगे की तैनाती ने इसकी सेन्य तैयारियों को प्रभावित किया है। इसके अतिरिक्त, पाक की वित्तीय स्थिति की वजह से उसके पास लड़ाकू उड़ान के लिए केवल पांच दिनों के लिए ईंधन है, इसलिए भारत के साथ संघर्ष की स्थिति में उसके लिए मुकाबले में बने रहना मुश्किल होगा।

इमरान बात करने में अनिच्छा जताने के लिए भी भारत की शिकायत करेेगा। पाक के लिए भारत से बात का अर्थ है  कश्मीर पर बातचीत जबकि कश्मीर में वर्तमान में जारी आतंकवाद को समर्थन भी उसके लिए ज्यादा अनुकूल साबित होगा। वह भारत-अमरीका के बढ़ते संबंधों से वाकिफ है और उसकी इच्छा होगी कि अमरीका अपने अच्छे संबंधों का उपयोग भारत को बातचीत के लिए मजबूर करने में करे। वह यह जतलाने की कोशिश करेगा कि कश्मीर समस्या का समाधान अफगानिस्तान सहित पूरे उपमहाद्वीप में शांति और विकास ला सकता है।

इमरान के पास हो सकता है, शिकायतों की एक सूची हो जिनमें अधिकांश को सुना जाएगा लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं की जाएगी। अमरीका के लिए अफगानिस्तान से वापसी की उसकी बेचैनी के बावजूद, भारत एक करीबी सहयोगी बना हुआ है। पाक पर उसका सीमित भरेासा है। वह अफगानिस्तान में शांति बहाल करने में पाक की अधिक भागीदारी चाहेगा जिसका वादा इमरान करेगा, लेकिन कभी पूरा नहीं कर पाएगा क्योंकि वह ‘चयनित‘ प्रधानमंत्री ही रहेगा। यह केवल उनका ‘चयनकर्ता‘ अर्थात सेना प्रमुख ही कर सकता है जो इमरान से स्वतंत्र होकर काम करता है। अफगानिस्तान में सहयोग और तालिबान पर अंकुश पाक को एक प्रत्यक्ष खतरा माना जाएगा जिसे आधिकारिक रूप से वह कभी भी स्वीकार नहीं करेगा।

कुल मिला कर पाक को कोई लाभ हासिल नहीं होगा। बहरहाल पाक के विदेश मंत्री कुरैशी  जो पाक मीडिया को फर्जी बयान देने के लिए जाने जाते हैं, इसे एक सफल यात्रा साबित करेंगे और कहेंगे कि ट्रम्प ने उनकी हर बात सुनी और पाक के साथ खड़े रहने का वादा किया जबकि हकीकत कुछ और ही होगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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