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इमरान खान गा रहे एक अलग ही राग

इमरान खान
फाइल फोटो

हाल ही में विदेशी पत्रकारों के एक समूह के साथ एक औपचारिक चर्चा में  इमरान खान ने कई तरह के बयान दिए। उन्होंने कहा, ‘ हमने अपने देश के भविष्य के लिए फैसला किया है कि हम बाहरी दबाव को भूल जाएंगे। अब हम सशस्त्र आतंकियों को यहां से अपनी कारगुजारियां करने की इजाजत नहीं देंगे। ‘ उन्होंने कहा कि पाक सेना ने अस्सी के दशक में इन्हें तैयार किया था। अपने रुख में आए बदलाव को और स्पष्ट करते हुए  उन्होंने कहा- ‘अब इन आतंकी समूहों का कोई उपयोग नहीं रह गया है।’





इसी संवाद के दौरान उन्होंने कहा- ‘नरेंद्र मोदी की सरकार कश्मीर विवाद के समाधान के लिए सर्वाधिक संभावित विकल्प हो सकते हैं क्योंकि दक्षिणपंथी हिन्दू इस समाधान को हासिल करने के लिए मोदी का समर्थन करेंगे। उनकी टिप्पणियां उनके इस बात से वाकिफ होने का संकेत है कि चुनावों के बाद मोदी के सत्ता में आने की संभावनाएं ज्यादा प्रबल हैं। उनकी सरकार के भीतर के कई लोग भारत में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद कर रहे थे लेकिन बालाकोट ने ऐसे सभी सपनों को धूल धुसरित कर दिया।

इमरान के बाद उनके मंत्री भी उन्हीं के सुर में बात करते प्रतीत हो रहे हैं। विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी हाल के सभी मंचों पर यही कहते नजर आए कि भारत और पाकिस्तान को आपस में बातचीत शुरू करनी चाहिए। पिछले सप्ताह ‘दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता‘ पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए, उन्होंने कहा कि विवादों का समाधान ही इस क्षेत्र में सभी प्रकार की स्थिरता की कुंजी है। उन्होंने इसका औचित्य भी बताने की कोशिश की कि करतारपुर गलियारे को खोलने की पेशकश का उनका उद्देश्य शांति में बढ़ोतरी करना था।

इससे कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने जिक्र किया था कि भारत एक बार फिर से पाकिस्तान पर हमला करने की तैयारी कर रहा है और उन्होंने विश्व समुदाय से भारत को सुझाव देने की गुजारिश की थी। उसी सम्मेलन में पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री डॉ. शीरेन मजारी ने कहा, ‘ यह संकट को प्रबंधित करने का मसला नहीं है। मूल रूप से हमें बातचीत शुरू करने और उस विवाद को समाप्त करने की जरूरत है, जो वर्तमान में विद्यमान है। इन दोनों के अल्फाज सीधे पाकिस्तान सेना के मुंह से निकले प्रतीत होते हैं, जिसने हाल के दिनों में भारत के जवाबी हमलों का कहर झेला है।

पाकिस्तान अचानक ही शांति और विवादों के समाधान की बात करने लगा है। बहरहाल यह इसके साथ साथ कश्मीर पर अपना पुराना राग भी अलाप रहा है और दावा कर रहा है कि वह कश्मीर को राजनयिक और नैतिक समर्थन मुहैया करा रहा है। इमरान ने भारत में मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाइयों का भी जिक्र किया जबकि चीन में इसी प्रकार मुसलमानों के लिए चल रहे शिक्षा शिविरों के वजूद की जानकारी होने तक से इंकार किया। बीजेपी का घोषणापत्र जारी होने के बाद धारा 370 और 35ए को हटाये जाने की सूरत में इमरान ने संयुक्त राष्ट्र संघ जाने तक की धमकी दे दी।

ताज्जुब की बात है कि जब न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री मस्जिद पर हुए हमलों के बाद पीडि़तों से मिलने गईं तो उनके इस कदम की पाकिस्तान ने सराहना की लेकिन हजारों शियाओं पर हुए हमलों के पीड़ितों को देखने उसका कोई नेता नहीं गया और इस प्रकार उन्हें अपने देश के भीतर ही अछूत घोषित कर दिया। यह वही नेतृत्व है जो भारत पर असहिष्णु होने का आरोप लगाता है।

पाकिस्तान को इस बात का अहसास हो चुका है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ चुका है, आर्थिक रूप से उसकी हालत खस्ता हो चुकी है, अंदरूनी असंतोष लगातार बढ़ रहा है और उसकी सेना जानती है कि भारत की ताकत का मुकाबला नहीं किया जा सकता। उसे पता है कि परमाणु हथियारों के उपयोग की धमकी अब फुस्स हो चुकी है। आईएमएफ से अब कोई भी ऋण सख्त आर्थिक प्रतिबंधों के साथ जारी किया जाएगा जिनमें पहली शर्त रक्षा बजट में कटौती करने की होगी।

चीन से मिलने वाले ऋणों एवं निवेशों की आईएमएफ द्वारा पूरी जानकारी मांगे जाने से पाकिस्तान चिंतित है। वह इनका विवरण देना नहीं चाहता। इन निवेशों का बड़ा हिस्सा राजनेता या पाक सेना पहले ही चट कर चुकी है जिसका खुलासा उसकी अपनी जनता के सामने भी नहीं किया गया है  फिर दुनिया के सामने वे कैसे कर सकते हैं। इसलिए  पाकिस्तान इनसे बचने का रास्ता ढूंढेगा।

वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) द्वारा उसे ‘काली सूची‘ में डाला जाना लगभग तय है। सोने की बिक्री प्रतिबंधित करने की पाकिस्तान की नवीनतम कार्रवाई से उसकी दुश्वारियां और भी बढ़ेंगी। हताशा में वह एक बार फिर से भारत पर इल्जाम लगा रहा है और दावा कर रहा है कि भारत के पक्षपाती रवैये के कारण उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही है।

अलावा इसके  वह अपनी जनता से भारत द्वारा किए गए दोनों सर्जिकल स्ट्राइक की हकीकत छुपाने में कामयाब रहा है लेकिन ऐसा अगर एक बार फिर हुआ तो शायद न छुपा सके। दूसरे किसी आतंकी हमले की सूरत में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल में की गई धमकी स्पष्ट थी। पाक इससे वाकिफ है कि  भारत अपने पहले के स्ट्राइकों से पर्याप्त सबक ले चुका है और उसका लक्ष्य अब वैसे क्षेत्र में अगली स्ट्राइक करने का है जिसमें पाकिस्तान नुकसान कबूल करने को मजबूर हो जाए। भारत के साथ तनाव बढ़ाना नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि पाकिस्तान के पास भारतीय खतरे का सामना करने के लिए न तो आर्थिक ताकत है और न ही विदेशी मुद्रा भंडार। नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना द्वारा दिए गए जवाब ने इंगित कर दिया है कि भारत दबाव बनाये रखेगा और पाक की गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब देगा।

इसलिए डीप स्टेट (पाक की सरकारी एजेन्सियों या सेना के प्रभावी सदस्यों का समूह ) द्वारा तैयार पटकथा को लेकर पाक के सभी नेता दुनिया के सामने यही जताने का प्रयास कर रहे हैं कि वे तो बातचीत की कोशिश कर रहे हैं  लेकिन भारत ही इसकी अनदेखी कर रहा है। वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आतंकी समूहों पर अंकुश लगाने की कार्रवाई केवल भारत को संतुष्ट करने के लिए की जा रही है।

बहरहाल पाकिस्तान को अभी भी मुंबई और पठानकोट के मास्टरमाइंडों के खिलाफ मामले में प्रगति लाने के जरिये भारत के विश्वास को बढ़ाना बाकी है। भारत में बनने वाली नई सरकार को जिस सवाल पर विचार करने की जरूरत है, वह यह कि क्या उसे पाकिस्तान के प्रस्ताव पर विश्वास करने का दांव लगाना चाहिए और उसके प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए या उसकी अनदेखी कर पाक पर दबाव बनाये रखना चाहिए तथा और अधिक दबाव डाल देना चाहिए। इन दोनों विकल्पों के अपने नफा-नुकसान हैं। अभी ऐसा समय है जब पाकिस्तान चारों तरफ से घिर चुका है और इस हालात का भरपूर लाभ उठाने की जरुरत है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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