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प्रधानमंत्री मोदी के चक्रव्यूह में फंस गए इमरान

प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान

साल 2019 के भारतीय चुनाव से पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर भारत के प्रधानमंत्री मोदी सत्ता में लौटते हैं तो बातचीत और शांति की गुंजाइश है। यह इस तथ्य के बावजूद कि मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान न केवल पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश को ठुकराया बल्कि सार्क को भी बेमानी बना दिया और पाक के दुस्साहस के प्रत्युत्तर में दो बार पाकिस्तान पर हमला किया। बालाकोट के बाद  पाक ने इसकी सच्चाई को छुपाने की कोशिश की और उसकी मनाही इस बात का सबूत थी कि वह सैन्य विकल्प पर विचार नहीं कर सका। फिर भी उसने नरेंद्र मोदी से उम्मीदें लगाए रखीं।





इमरान ने उसी साक्षात्कार में यह भी कहा था- ‘ कश्मीर एक राजनीतिक संघर्ष था।‘ जब भारत ने राजनीतिक रूप से कश्मीर को लेकर कदम उठाया तो पाक दहशत में आ गया। इमरान ने यह टिप्पणी की उस वक्त की जब वह अनुच्छेद 370 को हटाने के भाजपा के चुनावी वायदे से वाकिफ थे  लेकिन उन्होंने कभी भी यह उम्मीद नहीं की थी कि सरकार अपने नए कार्यकाल के दौरान इतनी जल्द अपना यह वादा पूरा कर देगी।

उन्हें कश्मीर घाटी के राजनीतिज्ञों के शब्दों तथा खुद अपने द्वारा वित्तपोषित हुर्रियत नेताओं पर पूरा यकीन था कि भारत में कोई भी सरकार कभी भी यह कदम नहीं उठा सकती। वास्तव में अधिकांश नेताओं ने सरकार को यह कदम उठाने को लेकर चुनौती भी दे दी थी। उन्होंने कभी भी हुर्रियत तथा घाटी की राजनीतिक पार्टियों को धीरे-धीरे दरकिनार किए जाने की घटना का संज्ञान नहीं लिया।

अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद  इमरान ने अचानक दहशत में आकर ट्वीट किया, ‘जैसे नाजियों ने जर्मनी पर कब्जा कर लिया था, उसी प्रकार भारत पर फासीवादी, नस्लवादी हिन्दू विचारधारा और नेतृत्व द्वारा कब्जा कर दिया गया है।‘ उन्होंने यह भी कहा- ‘दुनिया को गंभीरतापूर्वक भारत के नाभिकीय शस्त्रों की सुरक्षा पर विचार करना चाहिए जो फासीवादी, नस्लवादी हिन्दू मोदी सरकार के नियंत्रण में है। ‘इमरान ने इसे नजरअंदाज कर दिया कि पाक में केवल उन्होंने ही कहा था कि मोदी सरकार के फिर से आने से क्षेत्र में शांति आ सकती है।

दुनिया भर में एक ओर जहां मोदी एक सम्मानित नेता बने हुए हैं जिनके साथ दुनिया भर के देश जुड़ना और करार करना चाहते हैं वहीं  पाक की छवि एक ऐसे देश की बनी हुई है जिसकी सरकारी नीति आतंकवादी समूहों को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की है। उसके कुछ करीबी मित्र देशों ने भी भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों की खातिर उससे दूरी बना ली है। इमरान का अपना विपक्षी दल भी उन्हें ‘चुनिंदा प्रधानमंत्री‘ करार देता है जबकि इस शब्द को उन्हें आधिकारिक रूप से अस्वीकार्य घोषित करने को मजबूर होना पड़ा। सभी मोर्चों पर उनकी विफलता का परिणाम यही होगा कि उन्हें अपने पूर्ववर्तियों के नक्शेकदम पर और जेल की सींखचों के पीछे जाना होगा, सिवाए इस तथ्य के कि अगर पाकिस्तान आगे भी विफल रहता है तो ‘चयनकर्ता‘ कोई और बलि का बकरा ढूंढ लें।

इमरान को उम्मीद थी कि ट्रम्प द्वारा मध्यस्थता की पेशकश किए जाने और अमेरिका-अफगान बातचीत के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर आने के कारण वह बिना आतंकवादी का ठप्पा हटाए बातचीत की अपनी मांग को आगे बढ़ा सकते हैं। इसलिए, कुरैशी ने कई प्रेस कांफ्रेसों में कहा कि पाकिस्तान इस पर विचार कर रहा है कि किस प्रकार मध्यस्थता करने की ट्रम्प की पेशकश पर आगे बढ़ा जाए। अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के साथ ही सारा कुछ खत्म हो गया।

भारत के भीतर मोदी की रेटिंग लगातार बढ़ती रही है जबकि पाक में सरकार लोगों का ध्यान जीवन स्तर की ब़ढती लागत और महंगाई दर जैसी आंतरिक समस्याओं से भटकाने की कोशिश कर रही है। अगर मीडिया पर अंकुश नहीं होता और जो लोग ‘चयनित प्रधानमंत्री‘ की आलोचना करते हैं, उनको दबाव में नहीं रखा जाता तो पाक में दंगे भड़क गए होते और देश टूटने की कगार पर आ गया होता। यह ठीक है कि भारत भी सुस्त अर्थव्यवस्था के साथ आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है  लेकिन अर्थव्यवस्था गतिशील बनी हुई है और उसमें फिर उछाल आएगी।

मोदी ने जम्मू कश्मीर पर जो कदम उठाया उससे इमरान को झटका लगा। उन्होंने महसूस किया कि भारत सरकार ने अच्छी तरह से योजना बनाई और उसी के अनुरूप अपने फैसले को अमली जामा पहनाया। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा नाभिकीय हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं (एनएफयू) पर पुनर्विचार करने की जानबूझ कर दी गई चेतावनी ने पाक की दुर्दशा और बढ़ा दी है। इमरान लगातार राजनयिक रूप से भारत का विरोध करने का माध्यम ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं और इस बात से वाकिफ हैं कि उसके समर्थन में कोई भी नहीं है। अब समय बीतता जा रहा है।

उनकी सरकार लगभग रोजाना एक नई घोषणा करती है जिसका एकमात्र मकसद सरकार की विफलता की ओर से लोगों का ध्यान भटकाना है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जाने की उनकी नवीनतम घोषणा भी अपनी स्वाभाविक मौत मर जाएगी क्योंकि यह कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है।

पाकिस्तान के लिए अब कुछ उम्मीदें ही बच गई हैं। पहली यह कि जी-7 समिट के दौरान नेताओं के बीच की निजी बातचीत में क्या चर्चा होती हैं। पाक-अफगान वार्ता में अपनी सहायता के एवज में ट्रम्प से कुछ उम्मीदें लगाए बैठा है। उन्हें पता है कि ज्यादा कुछ नहीं होने वाला। दुनिया को पता है कि किस प्रकार इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र के कई प्रस्तावों की अनदेखी कर दी है और अपने रास्ते पर टिका रहा है। भारत के पास अंतिम विकल्प के रूप में यह हमेशा उपलब्ध है जिस पर उसने कई भी विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि उसने जो निर्णय लिया है, उससे न तो उसने सीमा में और न ही द्विपक्षीय बातचीत की शर्तों की यथास्थिति में कोई बदलाव किया है।

इमरान ने मोदी के सत्ता में आ जाने के बाद अपनी थोपी शर्तों पर भारत के साथ बातचीत करने का सपना देखा था, पर अब वह हिल गए हैं। उन्होंने विदेशी पत्रकारों के एक समूह को कहा था, ‘ अगर बीजेपी, जो एक दक्षिणमार्गी पार्टी है, जीतती है तो कश्मीर में किसी प्रकार का समझौता हो सकता है।‘ मोदी की आशातीत सफलता और अप्रत्याशित जनसमर्थन ने पाकिस्तान को हिला दिया है। इमरान को अब अपने शब्दों को लेकर पछतावा हो रहा होगा।

इमरान ने पिछले सप्ताह न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए गए एक साक्षात्कार में गहरी निराशा में भर कर कहा, ‘ उनसे बात करने का कोई फायदा नहीं है। मेरा मतलब है, मेरा मतलब है कि पूरी कोशिश करके देख लिया। दुर्भाग्य से  अब जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं, तो पाता हूं कि शांति और बातचीत के लिए मैं जितनी कोशिश कर रहा था, मुझे अब लगता है कि उन्होंने इसे तुष्टिकरण समझ लिया।‘ एक देश का नेता दूसरे देश के लिए अभिशाप बन गया है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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