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कैसे रोक लगे युवाओं के आंतकी बनने में ?

युवाओं का आतंकी बनना
कश्मीर में युवाओं का आतंकी बनना (प्रतीकात्मक)

अभी हाल की एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि घाटी में वर्ष 2017 में आतंकवादी बनने वाले युवकों की संख्या 126 थी जो 2016 के 88 की संख्या की तुलना में तेज बढोतरी है। पिछले सात वर्षों की अवधि में यह सबसे अधिक संख्या है। इस संख्या में इजाफा 2016 की हिंसापूर्ण गर्मियों के बाद होना शुरू हुआ जब बुरहान वानी मारा गया। 2010 से 2015 तक आतंकवादियों में स्थानीय आतंकियों की तादाद बेहद कम थी जिन पर पाकिस्तान के आतंकियों का दबदबा और नियंत्रण था।





आतंकियों के गिरोह में आश्चर्यजनक नया चेहरा जुनैद अशरफ खान का रहा है जो एक मैनेजमेंट ग्रेजुएट है और बड़े अलगाववादी नेता मोहम्मद अशरफ सेहरई, जिसने अभी हाल में तहरीक-ए-हुर्रियत पार्टी के चेयरमैन के रूप में सैयद अली शाह गिलानी की जगह ली है, का बेटा है। उसके पिता का दावा है कि वह इसलिए आतंकवादी बना क्योंकि वह अब नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। ऐसा पहली बार हुआ है जब हुर्रियत के परिवार का कोई व्यक्ति आतंकी बना हो। इससे दूसरे कई युवकों को उकसावा मिल सकता है जो हुर्रियत नेतृत्व को स्वयंसेवी, अपने सगे संबंधियों को काफी तालीम दिलाने वाला और स्व रोजगार से जुड़ा मानता रहा है।

शिक्षित युवकों समेत स्थानीय युवकों के आतंकी बनने की ओर बढ़ते रुझान ने सुरक्षा बलों को इसका प्रतिवाद करने के लिए कारगर रणनीतियां बनाने को मजबूर कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में वैचारिक विश्वास पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है। हर जगह इस्लामीकरण को लेकर चिंता बढ़ रही है क्योंकि जो युवक बंदूक थाम रहे हैं, वे इससे भली-भांति वाकिफ हैं कि उन पर जल्द मारे जाने का खतरा अधिक है। ज्यादातर युवक जो आतंकी बनते हैं, कुछ ही महीने जीवित रह पाते हैं, जबकि जो अधिक समय तक जिंदा रहते हैं, वे ऐसे पोस्टर ब्वॉयज होते हैं जो मुकाबलों से दूर नेपथ्य में रहना पसंद करते हैं।

युवकों के आतंकी बनने की घटनाओं में तेज बढोतरी के पीछे कई कारण हैं जिनमें आर्थिक कारण सबसे कम महत्वपूर्ण है। सबसे पहली वजह स्थानीय आतंकियों को बढ़ता जनसमर्थन है जिसके नतीजतन ऐसे युवक भी इस ओर आकर्षित हो रहे हैं जो शिक्षित हैं और संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। यह समर्थन अब स्पष्ट हो रहा है जब बड़ी संख्या में लोग स्थानीय आतंकियों के जनाजों में शिरकत करने लगे हैं। यहां तक कि हुर्रियत ने भी आतंकवाद को महिमा मंडित करना शुरू कर दिया था। उनकी मौतों को अपनी सियासी पूंजी के रूप में इस्तेमाल करना शुरु कर दिया । सैयद गिलानी ने आतंकी बुरहान वानी की मौत के कुछ ही दिनों के बाद उसे तमगा-ए-अजीमत (महानता का पदक) देने का ऐलान किया था।

दूसरा कारण युवकों को धार्मिक रूप से भड़काने की कोशिश है। घाटी के युवकों के दिमाग को अफवाहों एवं स्थानीय मजहबी गुरुओं द्वारा जिहाद के नारों से भड़काने की कोशिश की जा रही है जिससे वे आतंकियों के गिरोह में शामिल होने लगे हैं। इसकी वजह से कईयों ने आईएसआईएस को भी समर्थन देना शुरू कर दिया है जिसने राज्य में अपनी धमक बढ़ानी शुरू कर दी है। अनंतनाग में हाल में हुई एक मुठभेड़ में, तेलंगाना के मोहम्मद तौफीक को आईएसआईएस समर्थक एक स्थानीय पोस्टर ब्यॉय आइसा फाजिली (Eisa Fazili) के साथ मार गिराया गया। दूसरे कुख्यात आतंकी संगठनों के साथ आईएसआईएस के सिर उठाने से क्षेत्र में एक नई चुनौती पैदा हो गई है क्योंकि यह न केवल देश के दूसरे हिस्सों से युवकों को बल्कि सीरिया और इराक से भागने वाले आतंकियों को भी इस ओर आकर्षित कर सकती है।

राज्य सरकार द्वारा रोजगार के अवसर और स्वच्छ प्रशासन प्रदान करने में विफलता से स्थानीय हताशा बढ़ रही है जिससे युवक आतंकी बनने लगे हैं। घाटी में युवकों की संख्या में बढोतरी हुई है, 30 वर्ष से कम आयु के वहां 60 प्रतिशत से अधिक युवक हैं। इस वजह से भी समस्या बढ़ गई है। इसके अलावा, ये ही युवक सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय रहते हैं और आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। घाटी में मनोरंजन के अवसरों के अभाव के कारण ये युवक सोशल मीडिया पर पाकिस्तान द्वारा फैलाए जा रही अफवाहों के प्रभाव में आ जाते हैं और मुख्यधारा से दूर हो जाते हैं।

सुरक्षा बलों को इस बढ़ती चिंता से निपटने के लिए अब दोहरी रणनीति अपनानी पड़ रही है। एक रणनीति युवकों को आतंकियों के गिरोह में शामिल होने से रोकने की है। इसके लिए उन्हें स्थानीय नागरिक एवं पुलिस अधिकारियों  समेत स्थानीय स्तर पर अधिक घनिष्ठता, मानवीय तरीके और सुस्पष्टता से घुलना मिलना होगा। राज्य सरकार को स्वच्छ एवं सकारात्मक प्रशासन देने की ओर योगदान देना चाहिए।

दूसरी रणनीति पूरे जोर शोर से आतंकवादियों के सफाये के दूसरे चरण की शुरुआत करने की है। पिछले वर्ष पहले चरण में, सुरक्षा बलों ने 23 विदेशी आतंकियों समेत 39 शीर्ष आतंकवादियों को मार गिराया था और कुल मिला कर 202 आतंकियों का सफाया किया था। वर्तमान में, वे घाटी में सक्रिय रूप से रह रहे 250 आतंकियों की तलाश कर रहे हैं। इस मुहिम का आगाज पहले ही कामयाब रहा है क्योंकि इस रविवार तक 13 आतंकवादियों (ज्यादातर स्थानीय) को लगभग एक साथ चली तीन मुठभेड़ों में मार गिराया गया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुने हुए आतंकी समूह के नेताओं की एक हिटलिस्ट बनाई गई है जो मुख्य रूप से निशाने पर हैं। इसकी वजह यह है कि अगर इन आतंकी सरगनाओं को खत्म कर दिया गया तो इससे आतंकी बनने वाले दूसरे युवक भी निरुत्साहित होंगे, क्योंकि इससे पाकिस्तान में रह रहे उनके आकाओं के दिमाग में भी भ्रम पैदा होगा। सुरक्षा बलों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण अपने अभियानों की कार्यपद्धति में बदलाव लाना है जिससे कि बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान में कमी लाई जा सके। इसके लिए कम घेरेबंदी और तलाशी अभियानों के साथ ठोस खुफिया जानकारी पर आधारित मुहिम की जरूरत होगी।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार को इस पर विचार करना होगा कि क्या मारे गए आतंकवादियों की अंत्येष्टि उनके संबंधित गांवों में करना मुनासिब है क्योंकि एक बार बंदूक थाम लेने पर और आतंकी बन जाने पर वह देश का नागरिक नहीं बल्कि देश का शत्रु बन जाता है और सरकार का रवैया भी उसके खिलाफ वैसा ही रहना चाहिए। इससे बड़े पैमाने पर उनका अनुयायी बनने और आतंकी बनने के लिए दूसरों को उकसाने की घटनाओं में कमी आएगी। बदलते माहौल के लिए एक बदलती रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है, जिसे राज्य सरकार और सुरक्षा एजेन्सियों दोनों को एक साथ मिल कर करना होगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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