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सेना के लिए छोटे हथियारों की खरीद जल्द हो

भारतीय सेना
ड्यूटी पर तैनात भारतीय सेना के जवान (प्रतीकात्मक)

किसी सैनिक के लिए राइफल मानो उसके जिस्म का ही एक हिस्सा होता है। यह वह हथियार है जिस पर उसे सबसे ज्यादा भरोसा होता है। प्रत्येक जवान, चाहे उसकी ड्यूटी की प्रकृति कोई भी क्यों न हो, को एक सर्विस हथियार आवंटित किया जाता है जिसे उसका व्यक्तिगत हथियार कहा जाता है। यह वह हथियार है जिसका इस्तेमाल वह अमन के दिनों में भरोसा कायम करने और युद्ध के दौरान इसे चलाने में करता है। अगर कोई जवान अपने व्यक्तिगत हथियार को लेकर निश्चिंत नहीं है तो वह लड़ाई में कभी भी प्रभावी नहीं हो सकता। दशकों तक सेना के लिए यह एक बड़ा अभिशाप रहा था।





मौजूदा समय में भारतीय सेना अपने सैनिकों को छोटे हथियारों के INSAS वर्ग से सुसज्जित करती है जिनका निर्माण ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों द्वारा किया जाता है। इन्हें 7.62 एमएम एसएलआर से अपग्रेड किया गया जिनका निर्माण भी उन्हीं के द्वारा किया गया। इस हथियार की गुणवत्ता और क्षमता भी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों द्वारा निर्मित्त अधिकांश अन्य हथियारों की ही तरह संदेह के घेरे में बनी रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री एवं पूर्व सैन्य अधिकारी कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कहा कि उनकी बटालियन के जवान, जो वर्तमान में घाटी में तैनात हैं, INSAS राइफलों की तुलना में आतंकवादियों से जब्त किए गए एके सिरीज के हथियारों को चलाना ज्यादा पसंद करते हैं। उनकी निर्भरता बस इतनी ही है।

पिछले कुछ समय से भारतीय सेना एक उपयुक्त राइफल की तलाश में है। सबसे पहले भारतीय सेना ने वर्ष 2005 में ही नई असॉल्ट राइफलों एवं कार्बाइनों तथा वर्ष 2009 में हल्के मशीनगनों की मांग की थी। सेना की आरंभिक मांग अपने सभी 382 पैदल सेना बटालियनों के लिए इन हथियारों को पाने की थी। इसकी खरीद प्रक्रिया कई बार भ्रष्टाचार के आरोपों, अवास्तविक तकनीकी मानकों एवं स्वदेशी विकल्पों की कमी के कारण बाधित होती रही। जैसाकि सेना प्रमुख ने हाल ही में कहा है कि, अभी जिन हथियारों की खरीद की गई है, उन्हें सीमा पर तैनात टुकडि़यों के लिए निर्धारित किया जा रहा है, जबकि शेष पर मेक इन इंडिया द्वारा अपनी पकड़ मजबूत बना लिये जाने के विकल्प के बाद विचार किया जाएगा।

निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, प्रस्ताव के लिए आग्रह (RFP) रक्षा खरीद परिषद (DAC) द्वारा इस मामले को मंजूरी दे दिए जाने के 10 दिनों के भीतर जारी किया जाना चाहिए। इस मामले को फरवरी में DAC द्वारा मंजूरी दे दी गई थी, जबकि RFP अभी तुरंत जारी हुआ है। निश्चित रूप से यह भी बिना किसी औचित्य के विलंब का एक और मामला है। आरंभिक मांग कम करके लगभग 72,000 राइफलों, 94,000 कारबाइनों एवं 16,500 मशीनगनों तक ले आई गई है जिस पर लगभग 5,400 करोड़ रुपये की लागत आएगी।

सुझाए गए हथियार 7.62 mm calibre के होने चाहिए, जो वर्तमान के 5.56 mm से कहीं अधिक घातक हैं। इसके गोला बारूद की मार करने की लंबी दूरी है, सेना की मांग 500 मीटर और बेहतर सटीकता की है। कुछ प्रमुख आंतरिक बाधाएं भी हैं जिससे सेना की आवश्यकता को अंतिम रूप देने में देरी हुई। सर्वप्रथम, सेना के भीतर ही इस पर विभिन्न प्रकार के विचार थे कि हथियारों का व्यास कितना होना चाहिए और उसकी क्षमता कितनी होनी चाहिए। यह जरूरी था क्योंकि एक बार शामिल हो जाने के बाद ये हथियार लंबे समय तक सेवा में बने रहेंगे।

दूसरा, DRDO द्वारा परीक्षण के लिए अपने विकास संबंधी प्रोटोटाइप, Excalibur एवं Ghatak को प्रस्तुत किए जाने पर जोर दिया जाना था। कई अवसरों पर उनका परीक्षण किया गया लेकिन तैनाती के लिए उन्हें अनुपयोगी पाया गया। DRDO की पेशकशों एवं आंतरिक विकास की मांगों के खिलाफ रक्षा मंत्रालय को भरोसा दिलाना भी काफी समय लेने वाला था। यहां तक कि मौजूदा हालात में भी, अंतिम मंजूरी दिए जाने से पहले इसे इन कदमों से गुजरना पड़ेगा। इन कदमों में प्रस्तावों को स्वीकार करना, कठोर मौसम की स्थितियों में भूभाग की प्रत्येक प्रकृति में सभी प्रोटोटाइपों का परीक्षण करना, तकनीकी मूल्यांकन एवं रखरखाव योग्य परीक्षण करना शामिल है।

इन सभी चरणों के संपन्न होने के बाद ही सेना अपनी अंतिम पसंद पर निर्णय लेगी, जिसके बाद मंजूरी के लिए बातचीत आगे बढाई जाएगी और वेंडर के साथ बातचीत आरंभ की जाएगी। अगर प्रक्रिया के दौरान रिश्वत या अवैध पेशकश की शिकायतें आती हैं तो पूरी प्रणाली समाप्त हो सकती है और फिर शुरू से पूरी प्रक्रिया आरंभ करनी पड़ेगी। ऐसे उदाहरण रक्षा खरीद में आम हैं।

सबसे पहले, सौदों का वित्तीय प्रभाव है। दूसरा, ये हथियार अपनी रक्षा क्षमता में बढोतरी करेंगे। इस प्रकार, ईर्ष्या से भरे पड़ोसी देश यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे कि यह प्रक्रिया अवरूद्ध हो जाए या फिर विफल हो जाए। अंत में, लड़ाई दावेदारों के बीच में है। प्रत्येक कंपनी रिश्वत के लिए एक दूसरे को दोषी ठहराएगी और खुद को एकमात्र दावेदार होने की उम्मीद करेगी। रक्षा मंत्रालय को बिल्कुल स्पष्ट और केंद्रित होना चाहिए तथा पैनी नजर से परीक्षणों की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए। केवल मामूली कारणों एवं अफवाहों, जिनका पैदा होना तय है, से इस समझौते को टाल देने से सेना को वह जरूरी क्षमता प्राप्त नहीं हो सकेगी, बढ़ रहे खतरों को देखते हुए जिसकी उसे नितांत आवश्यकता है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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