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सेना के लिए सरकार ने उठाया सकारात्मक कदम

सीमा पर भारतीय सेना
भारतीय जवान (फाइल फोटो )

एक अभूतपूर्व कदम के रूप में, सरकार ने अपने अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों मदन बी लोकुर एवं यू. यू. ललित को कहा है कि वे मणिपुर की ‘तथाकथित‘ असंवैधानिक हत्याओं के केस से खुद को दूर करें और इसे किसी अन्य पीठ को हस्तांतरित कर दें। वेणुगोपाल पूर्व- अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की मांग का समर्थन कर रहे थे जो 700 से अधिक कार्यरत एवं सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों की तरफ से हाजिर हुए थे जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के उसके खुद के निर्देशों के उल्लंघन के खिलाफ मुकदमा दायर कर रखा था। दोनों ही मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों मदन बी लोकुर एवं यू. यू. ललित की पीठ द्वारा की जा रही थी। न्यायालय को अभी अपना फैसला सुनाना बाकी है।





मुकुल रोहतगी ने तो यहां तक कहा, ‘जवान अधिकारियों से पूछ रहे हैं कि अगर हम पर हमला किया गया तो हम गोली चलाएं या नहीं? यह विवाद तब पैदा हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय ने CBI से पूछा कि उसने क्यों किसी को गिरफ्तार नहीं किया या क्या उसने हत्या के सिलसिले में किसी को चार्जशीट किया है? वेणुगोपाल ने कहा, ‘ सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि वे हत्यारे हैं। सभी को ब्रांड कर दिया गया है। किस ट्रायल कोर्ट के पास सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ जाने का साहस है?

अदालत द्वारा की गई इस प्रकार की टिप्पणियों एवं इसके द्वारा CBI पर डाला गया दबाव है, जिसने अभियुक्तों को मजबूर किया कि वह सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करे कि उन्हें अपराधियों के रूप में ब्रांड करने से पहले वह उनकी बात सुन ले। चाहे ये जवान जिस संगठन के हों और भले ही उन्होंने मणिपुर में नौकरी की हो या नहीं, तथ्य यही है कि उन्होंने अपने उन साथियों की मदद के लिए हाथ मिलाया है जिन्होंने उस वक्त उग्रवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और आज भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। उनके इस काम की सराहना की जानी चाहिए न कि इसे बगावत जैसा कोई कृत्य माना जाना जाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह मामला कार्यात्मक स्तर पर सेना के मनोबल को प्रभावित कर रहा है। उन उपद्रवियों को दबाने के लिए सेना की टुकडि़यां भेजी गईं जो देश की अखंडता के लिए खतरा बन रहे थे और और कई दशकों के बाद इन जवानों पर ही अपराध करने का आरोप मढ़ा जा रहा है जबकि उन्होंने इसके लिए अपनी जान की परवाह तक नहीं की थी। उनकी कार्रवाई सशस्त्र बल विशिष्ट अधिकार (AFSPA) अधिनियम के तहत थी लेकिन अब उस पर भी सवाल किए जा रहे हैं। उन पर तथाकथित मुठभेड़ (एनकाउंटर) हत्याओं के आरोप लगाए जा रहे हैं जबकि अधिनियम के द्वारा संरक्षित हैं। इस मामले में कोई भी प्रतिकूल निर्णय संसद द्वारा पारित कानून को बदल देगा।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि मणिपुर देश का कोई इकलौता क्षेत्र नहीं है जो सेना से संबंधित उपद्रव का सामना कर रहा है। सेना जम्मू-कश्मीर में भी कार्यरत है और वहां सेना के जवान रोजाना अपनी जान की बाजी लगाते हैं। फिर तो उनका कार्यकाल पूरा होने या वहां शांति बहाल होने के बाद वहां भी उनके बलिदानों की प्रमाणिकता को लेकर वे उनसे सवाल करने लगेंगे?

प्रत्येक उपद्रवग्रस्त स्थान पर सेना को बाहरी और कब्जा करने वाला समझा जाता है क्योंकि वे स्थानीय नहीं होते हैं और सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे उपद्रवी और आतंकी उखाड़ फेंकना चाहते हैं। इसलिए वे हमेशा ही उपद्रवियों के समर्थकों तथा राष्ट्रविरोधियों के निशाने पर होते हैं जिनमें से कई देश के भीतर ही रहते हैं और खुद को शांति कार्यकर्ता बताते हैं। इसके अलावा सेना किसी भी स्थिति में अंतिम उपाय होती है। इसके काम करने के तरीके को सीमित करने और इसके अधिकारों को पुलिस के बराबर घटा देने से उसकी क्षमता को प्रभावित करेगा।

सरकार ने अभी तक सुविचारित खामोशी अख्तियार कर रखी थी पर अब खुल कर जवानों के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय में आ गई है। उन्हें पहले ही ऐसा करना चाहिए था और रक्षा मंत्री को शोपियां में पत्थरबाजी के खिलाफ आत्मरक्षा में की गई गोलीबारी में हुई मौतों में मेजर आदित्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मामले में अपने अधिकारों का मजबूती से उपयोग करना चाहिए था।

सरकार के लिए सही दिशा में कदम बढ़ाने के मामले में अभी बहुत देरी नहीं हुई है। यह तथ्य कि जवानों का प्रतिनिधित्व पूर्व अटॉर्नी जनरल कर रहे हैं, अपने आप में इसका संकेत है कि कुछ वरिष्ठ अधिवक्ता मामले की जटिलता समझते हैं और एक न्यायोचित ध्येय के लिए अपना समय समर्पित कर रहे हैं। सरकार के इस कदम के लिए देश को अब अपना समर्थन देना चाहिए और इसके द्वारा वे सेना के उन हाथों को मजबूत कर सकते हैं जो देश के दुश्मनों के खिलाफ बहादुरी से लड़ते हैं।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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