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इन्सानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के जरिए मुख्यधारा में पूर्व आतंकी

जम्मू-कश्मीर विधानसभा
फोटो सौजन्य- गूगल

यह केंद्र सरकार की प्रबल कोशिशों व लगातार प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ने का प्रतिफल है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद घाटी में धीमी-धीमी सुकून भरी बयार बहने लगी है। वहां से जुड़ी यह रिपोर्ट कि कई पूर्व आतंकवादी अपनी राजनीतिक संगठन खड़ा कर मुख्यधारा में आने को तैयार हैं, बदलाव की कहानी खुद लिख रही है। ‘धरती का स्वर्ग’ में ऐसी हवा का बहना निश्चय ही विकास व समृद्धि के लिए मील का पत्थर साबित होगा। हकीकत यह है कि जब किसी समाज या सूबे के सभी नागरिक पूरी तत्परता के साथ संविधान के तहत राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए रात-दिन एक करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तो खुशहाली स्वत: ही आती है। यह अच्छी बात है कि घाटी के पूर्व आतंकी इन्सानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत को थामकर नई इबारत लिखने जा रहे हैं। इन कई पूर्व आतंकियों का सूबे के सियासी नेताओं पर लगाए गए आरोप कि ब्लैकमेल और मजहब की सियासत की वजह से उन जैसे युवाओं ने भटक कर बंदूके थामीं, 70 साल के घाटी के हालात को समझने के लिए काफी हैं।





सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार के जम्मू-कश्मीर पर नए फैसले से अब चंद दिनों में ही नया कश्मीर बनने का सिलसिला शुरू हो चुका है। हालांकि तमाम राजनीतिक दल इस बात को पचा नहीं पा रहे और स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। कश्मीर में बदलाव के इस व्याहारिक सच को कांग्रेस समेत राज्य के सभी राजनीतिक दलों को स्वीकार कर आगे बढ़ने की जरूरत है ताकि कश्मीर के बाशिंदों का भला हो सके। स्वायत्तता, आजादी के नारों के जरिए लोगों को बड़गलाने के दिन अब लद चुके हैं। सियासी दलों में ही अनुच्छेद 370 के नाम पर अलग-अलग राय यह बताने के लिए काफी है कि अगर उन्होंने घाटी के विकास के पक्ष में नजरिया नहीं बदला तो इन दलों में विभाजन स्वाभाविक है। अपनी नापाक हरकतों से बाज न आने वाले पाकिस्तान की भी भलाई इसी बात में है कि वह कश्मीर मसले की हकीकत को जितनी जल्दी हो स्वीकार करे और अपना वजूद बचाए। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी कश्मीर मसले पर तमाम हो-हल्ला मचाने के बाद भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ और आगे भी उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं।

यह अच्छी बात है कि हालात सामान्य होने के बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराए जाएंगे और पूर्व आतंकियों के संगठन इसमें शामिल होंगें। खास बात यह है कि यह संगठन नई सोच के साथ कश्मीर की तरक्की व खुशहाली के लिए वोट मांगेंगे। कई पूर्व आतंकी कमांडर राजनीति में अपना भाग्य आजमा चुके हैं या आजमा रहे हैं। बाबर बदर (सईद फिरदौस) विधानपरिषद सदस्य रह चुके हैं। बिलाल लोदी पीडीपी के संस्थापक सदस्यों में थे वह भी विधानपरिषद सदस्य रहे। वह अल बरक के कमांडर थे। ऐसे में इन कमांडरों की जिम्मेदारी बनती है कि घाटी के भटके, बरगलाए गए तमाम कश्मीरी युवाओं को समझाएं कि सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने और बंदूक थामकर हिंसा का रास्ता अपनाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। राज्यपाल शासन के दौरान पूरे सरकारी तंत्र को और गहना के साथ काम करने की जरूरत है ताकि स्थानीय बाशिंदों को इस बात का यकीन तेजी से हो कि शासन-प्रशासन उनके लिए दिन रात काम कर रहा है।

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