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जांबाज जवानों के कर्तव्य को भूलना तो अपराध ही है !

टाइगर हिल्स पर विजय पताका

पूरे देश ने करगिल विजय की वर्षगांठ मनाकर अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी और उन वीर सपूतों को याद किया जिन्होंने वर्ष 1999 में सरहद की हिफाजत करते हुए अदम्य साहस, अनुकरणीय वीरता का परिचय दिया था। पर जीत की यह सालगिरह मनाते हुए देश के तमाम हिस्सों से ऐसी खबरें भी आईं कि करगिल की शौर्यगाथा लिखने में शामिल उन सैनिकों को वाजिब हक नहीं मिला जिनके वे हकदार थे। इन बीते 18 वर्षों में शहीदों के आश्रित परिवार सरकार से मदद की गुहार करते रहे पर उन्हें बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसी खबरें भी आईं कि इस युद्ध में दिव्यांग हो चुके योद्धाओं की पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, भूमि मिलने से जुड़ी फाइलें मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों में इधर से उधर भटकती रहीं लेकिन उचित न्याय नहीं मिला। क्या जिम्मेदार सरकारों की यह कार्यप्रणाली, वह भी देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों के प्रति, पूरे देश को शर्मसार करती नहीं दिखती? क्या करगिल विजय, 1971 युद्ध में हुई जीत का विजय दिवस अथवा किसी अर्धसैनिक बल के शौर्य व स्थापना दिवस पर वतन पर मर मिटने वाले जवानों को याद कर लेना रस्म अदायगी भर नहीं कहा जायेगा? यह गंभीर बात है। सेना, अर्धसैनिक बल आज बदली हुई चुनौतियों में दुश्मन की आंख में आंख डालकर प्रतिकूल मौसम में जिस तरह अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं उसमें उन्हें सम्मान व सहायता की जरूरत है। और इसके वे हकदार भी हैं।





दरअसल केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर तरह-तरह की सहायता देने की घोषणाएं कर दी जाती हैं पर उचित निगरानी व दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी से उन पर पानी फिर जाता है। आश्रित परिवार और पीड़ित सैनिक खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। और दर-दर की परेशानियां तथा मंत्रालयों, विभागों का बेरुखा बर्ताव उनके सम्मान को चोट पहुंचाता है, सो अलग।

केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए यह सोचने वाली बात है। सैनिकों के ऐसे मामलों पर तत्काल कदम उठाकर तथा उनकी समस्याओं का सिरे तक समाधान कर ही हम अपने पवित्र कर्तव्य की पूर्ति कर सकते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार की उस पहल को इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है जिसमें दिल्ली के निवासी शहीद के परिजनों को एक करोड़ रुपये मुआवजा देने वाली घोषणा को दोबारा मंजूरी दी गई है। इसके तहत आर्मी, नेवी, एयरफोर्स, पैरा मिलिट्री फोर्स, दिल्ली पुलिस, होमगार्ड, सिविल डिफेंस, आपदा प्रबंधन में तैनात स्टाफ को लाभ मिलेगा। यह योजना पहले भी कल्याणकारी और सैनिकों का सम्मान करने वाली थी, आज भी है। पर जरूरत है उचित क्रियान्वयन तथा गहन निगरानी की। करगिल युद्ध के दिल्ली (मुखमेलपुर) के एकमात्र योद्धा लांस नायक सतबीर सिंह आज सरकारी सिस्टम की वजह से जूस की दुकान पर बर्तन धो रहे हैं। करिगल के इस हीरो से वादा किया गया था कि पेट्रोल पंप व भूमि दी जाएगी। आज 18 वर्ष बाद उनके पास कुछ भी नहीं है। सतबीर का यह आरोप कि पेट्रोल पंप आवंटन के दौरान एक बड़ी पार्टी के नेता ने यह ऑफर दिया था कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने मना कर दिया तो सब कुछ छीन लिया गया, शर्मसार करने वाला है।

आज पूरे देश में जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज दोनों ही सैनिकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनें, विजय दिवसों के समारोह लोगों में जागृति, चेतना, उत्साह कृतज्ञता का भाव तो पैदा करते हैं और इनसे भावी पीढ़ियां सैनिकों के शौर्य से दो-चार होती हैं पर इससे कहीं ज्यादा जरूरी, सार्थक और व्यावहारिक है कि अपने कर्तव्यपालन के दौरान शहीद, दिव्यांग हो चुके सैन्य परिवारों को सरकारी घोषणाओं का लाभ मिले ताकि वे अपनी जिंदगी को पटरी पर लाकर देश व समाज के लिए काम कर सकें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक सैनिक वीरोचित कार्य और बलिदान कोई सामान्य कर्तव्य नहीं है। समाज के हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सैन्य कार्य में तैनात सैनिक या आश्रित परिवार की उसी तरह मदद करे जैसी कि वह अपने परिवार की करता है। हर व्यक्ति का यही सम्मान उन सैनिकों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है जो देश के लिए मर-मिटे या मर-मिटने का जज्बा रखते हैं। और अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो क्या यह आपको नहीं लगता कि हमारा यह आचरण अपराध की श्रेणी में आता है ?

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