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अनुकरणीय है उत्तर प्रदेश के डीजीपी की कार्यशैली

डीजीपी ओपी सिंह

देश के सबसे बड़े सूबे के पुलिस महानिदशक की यह कार्यशैली वाकई, मोहित, चमत्कृत, अनुकरणीय कही जाएगी जिसमें उन्होंने तड़के तीन बजे उत्तर प्रदेश के मीरजापुर के जिगना क्षेत्र के दहमर गांव के एक पीड़ित व्यक्ति की शिकायत सुनी और तत्क्षण कार्रवाई कर अवैध निर्माण कार्य रुकवाया। ऐसी मिसालें सूबे की पुलिस के पास बहुत कम है। देश के अन्य प्रांतों में भी कम हैं पर उत्तर प्रदेश और बिहार पुलिस की तुलना में अक्सर मिल जाती हैं लेकिन इस घटना से कई सवाल पैदा होते हैं। पहला सवाल यह है कि आखिर क्यों उस पीड़ित व्यक्ति को डीजीपी को रात तीन बजे फोन करने की हिम्मत करनी पड़ी। इसका सीधा उत्तर यही है कि उसे चौकी, थाना, सर्किल, जिले स्तर के पुलिस अधिकारी से मदद नहीं मिली और उसने हारकर कांपते हाथों से पुलिस के सबसे बड़े मुखिया को रात में फोन कर दिया। इस बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है। और भी कई सवाल इस तथ्य के इर्द-गिर्द घूमते हैं।





दरअसल सूबे की पुलिस का एक चेहरा यह भी है कि तमाम पुलिस कर्मी अपने कर्तव्य का निर्वहन निष्ठा, ईमानदारी से नहीं करते लिहाजा आम आदमी को अपनी फरियाद करने के लिए आला पुलिस अधिकारियों की शरण में लेनी पड़ती है। क्या यह उचित है ? कायदे से तो निचले स्तर पर यानी चौकी या थाना स्तर पर अगर फरियादी की बात सुन ली जाए और उन पर जरूरी कार्रवाई हो जाए तो गांव के गरीब या आम आदमी को जिले के एसपी तथा लखनऊ में बैठे उच्च पुलिस अधिकारियों की शरण न लेनी पड़े। मीरजापुर के एक गांव की घटना भी यही कह रही है। इस पर गहन चिंतन करने और गंभीरता के साथ सही कदमों से काम करने की जरूरत है। छोटी-छोटी कार्रवाइयों के लिए आम नागरिक को खेत-खलियान छोड़कर जिला पुलिस मुख्यालय तक गुहार लगाने के लिए आना पड़ता है कि साहब में मेरी एक एफआईआर तक नहीं लिखी जा रही है। यह बात किसी से भी छिपी नहीं है। इसलिए आधी रात के बाद उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने जिस तरह आम नागरिक की बात सुनकर और दबंगों द्वारा रात के अंधेरे में किए जा रहे अवैध निर्माण कार्य पर रोक लगाई है, वह बहुत कुछ सबक भी सिखाती है। केवल दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई करने से बात नहीं बनने वाली। वास्तव में राज्य की पुलिस को एक जिम्मेदार कार्यशैली विकसित करने की जरूरत है।

उत्तर प्रदेश की ही तरह पूरे देश की पुलिस के लिए सवाल जवाबदेह, जिम्मेदार, समर्पण के साथ काम करने वाली शैली विकसित करनी ही होगी। केवल यह कहने से अब काम चलने वाला नहीं कि मौजूदा पुलिस के नियम कायदे अंग्रेजों के समय के हैं। यह बात सही है, पर जरूरत के मुताबिक बदलना भी नीति-नियंताओं तथा उनका पालन करवाना खाकी का काम है। कोई भी महकमा अनुशासन से चलता है। खासतौर पर सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस। जब सेना तथा आम-नागरिकों के साथ साबका रखने वाले अर्धसैनिक बल जनता की पूरी ईमानदारी से सेवा कर सकते हैं तो पुलिस भी कर सकती है। चयन प्रक्रिया, भर्ती नियम बदलकर  पुलिस महकमे में पूरी निष्ठा के साथ काम करने वाले अधिकारी, उनके मातहत भर्ती कर खाकी की छवि सुधारी जा सकती है और आम नागरिकों की सेवा पूरे समर्पण के साथ की जा सकती है। उत्तर प्रदेश के डीजीपी की कर्तव्य परायणता से भरी यह घटना यही रेखांकित करती है कि पूरे देश में शीर्ष पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ उनके मातहतों को भी अपनी कार्यशैली बदलनी होगी।

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