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तेजस की अत्याधिक कीमत कोई पहला मामला नहीं !

Tejas-1-A

केन्द्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते एक संवाददाता सम्मेलन में तेजस- 1ए लड़ाकू विमान के निर्माण के लिए एचएएल द्वारा उद्धृत की गई अधिक कीमत की जांच के लिए एक वाणिज्यिक वार्ता समिति के गठन की घोषणा की। एचएएल प्रत्येक लड़ाकू विमान के लिए 463 करोड़ रुपये की मांग कर रही है जो वर्तमान तेजस 1 वायुयान की कीमत से लगभग 100 करोड़ रुपये अधिक है। यह कीमत नासिक में असेंबल किए जाने वाले सुखोई वायुयान से भी अधिक है जिसके लिए यह 415 करोड़़ रुपये की मांग करती है जिसका अगर रूस से आयात किया जाता तो इसकी कीमत 330 करोड़ रुपये ही होती।





जब भारत में इसका निर्माण किया जाता है तो अंतराष्ट्रीय रूप से विख्यात स्वीडन की एसएएबी ग्रिपेन वायुयान की कीमत 465 करोड़ रुपये और एफ-16 की कीमत 380 करोड़ रुपये आती है। अधिक कीमत के अतिरिक्त  विमान की आपूर्ति की निम्न दर भी इसकी एक समस्या है। पिछले तीन वर्षों के दौरान, एचएएल 20 तेजस 1 वायुयान के ऑर्डर के मुकाबले केवल 9 तेजस 1 वायुयान की आपूर्ति ही कर पाई है। एचएएल के लिए मूल योजना सालाना 18 वायुयान के निर्माण की थी।

सरकार द्वारा संचालित ज्यादातर आयुध (ऑर्डनेंस) फैक्टरियां भी इसी मॉडल का अनुकरण करती रही हैं। वे बगैर उत्पादन की गुणवत्ता की चिंता किए अपने उत्पादों की अधिक कीमत लगाती हैं। इसका एक उदाहरण जबलपुर स्थित वाहन फैक्टरी है जो पहले शक्तिमान और जोंगा का निर्माण करती थी। जैसे ही इन दोनों ब्रांडों को हटा दिया गया, फैक्टरी की कोई जरुरत ही नहीं रह गई। आदर्श स्थिति तो यह होती कि सरकार या तो इसे बंद करने या फिर निजी क्षेत्र के हाथों बेचने पर विचार करती। बहरहाल यूनियनों के प्रभाव ने सरकार को आगे कदम बढ़ाने नहीं दिया।

इस प्रकार वाहन फैक्टरी, अशोक लीलैंड वाहनों, जिसे सशस्त्र बलों में सम्मिलित कर लिया गया, के लिए एक असेंबली लाइन बन कर रह गई। वाहनों का निर्माण Hossur,  बेंगलूरू में किया जाएगा तथा कंटैंनर में इसकी पैकिंग की जाएगी, इसे जबलपुर भेजा जाएगा तथा वाहन फैक्टरी की असेंबली लाइन में इसका निर्माण पूरा किया जाएगा। फिर इन वाहनों पर एक चिह्न (Insignia) लगाया जाएगा जो यह चिह्नित करेगा कि इसकी असेंबलिंग जबलपुर कारखाने में हुई है। इसकी लागत निश्चित रूप से बेहद अधिक आती क्योंकि इस वाहन का निर्माण बेंगलुरु में हुआ था तथा इन्हें असेंबल जबलपुर में किया गया।

सेना द्वारा अपने जवानों को खुले बाजार से वर्दी खरीदने की इजाजत देने और ऑर्डनेंस फैक्टरियों से खरीद के अपने ऑर्डर को रद्द का फैसला दो कारणों से लिया गया, गैरवाजिब कीमत और निम्न गुणवत्ता। रक्षा निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSU) के लिए एक निर्धारित ग्राहक होता है, जिसके पास खरीद करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होता। पीएसयू भी लाभ इंगित करने के इच्छुक होते हैं। सबसे आसान तरीका उनकी अपनी गणना के अनुसार चार्ज करना है, क्योंकि सभी भुगतान लेखा अंतरण (बुक ट्रांसफर) होते हैं। इसका प्रभाव सशस्त्र बलों के बजट पर पड़ता है।

एचएएल में हेलिकॉप्टरों की नियमित सर्विसिंग के संचालन में काफी देर होने की खबरें आई हैं। सिविल (गैर फौजी) में सर्विसिंग के लिए सामान्य समय कुछ दिनों का होता है जबकि एचएएल हेलिकॉप्टरों को महीनों तक लटकाए रखती है। हेवी वेहिकल फैक्टरी, अवाड़ी में स्थिति और खराब है। बख्तरबंद लड़ने वाले वाहन और टैंक जिनकी अपग्रेडिंग और सर्विसिंग करनी होती है, उन्हें इसके लिए महीनों लग जाते हैं। यह हमेशा अपने नियत समय से वर्षों पीछे रहता है। इसकी वजह आयातित कल-पूर्जों की उपलब्धता की कमी है। ऐसी देरी से लागत में इजाफा होता है और युद्धरत बलों की दक्षता कम होती है।

विस्तृत वर्कशीट (कार्य पत्र) के साथ अधिक लागत डॉकयार्ड में तो स्वीकार्य होते हैं क्योंकि जहाज का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है और मजदूरों से जुड़ी (श्रमोन्मुखी) है। दूसरे सभी मामलों में अधिक लागत स्वीकार्य नहीं है। सशस्त्र बलों का रखरखाव करदाताओं के योगदान से होता है। इसलिए हर मामले में एक लक्ष्य होना चाहिए कि दिए गए पैसे की पूरी कीमत वसूल हो। रक्षा मंत्रालय को कोई भी अनुबंध देने से पहले ही पीएसयू से सभी लागतों की जांच कर लेनी चाहिए। इसके अलावा करदाता को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से सूचना मांगनी चाहिए और रक्षा मंत्रालय को रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियों (पीएसयू) की कीमत निर्धारण पद्धति पर चाकचौबंद निगरानी और नजर रखनी चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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