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एक रैंक-एक पेंशन पर पूर्व सैनिकों का आंदोलन और आगे बढ़ा

सेवानिवृत सैनिक
पूर्व सैनिकों का प्रदर्शन (प्रतीकात्मक)

सशस्त्र बलों से जुड़े पूर्व सैनिकों की एक रैली 20 मई को नई दिल्ली के जंतर मंतर पर आयोजित की गई। केरल से जम्मू कश्मीर तक 14 राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीनों सेनाओं के पांच हजार से अधिक पूर्व सैनिकों ने इस रैली में भाग लिया। इस रैली ने एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) की मांग करने वाले आंदोलन के 1071 दिन भी पूरे की लिए जो 16 जून, 2015 को आरंभ हुआ था। दिल्ली के बेहद गर्म मौसम में पूर्व सैनिकों ने इस रैली में भाग लिया। 40 से अधिक सदस्यों ने इस अवसर पर रैली को संबोधित किया जिनसे उनके विचारों में आपसी समानता और एकरूपता की झलक मिली।





कई सारे कारणों से इस रैली को मीडिया में बहुत कम तवज्जो मिला। इस दौरान कर्नाटक सरकार के गठन समेत देश में कई बड़ी घटनाएं घट रही थीं जो खबरों की सुर्खियां बनी हुई थीं। मीडिया का भी मानना था कि रैली में कोई नई मांग सामने नहीं आएगी, इसलिए उन्होंने इस रैली को नजरअंदाज किया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मीडिया घराने इससे वाकिफ थे कि रैली शांतिपूर्ण होगी, उसमें राष्ट्रविरोधी कोई नारे (जेएनयू के विपरीत) नहीं लगाए जाएंगे, कोई सियासी नेता इसमें अपनी पार्टी के रुख की बात नहीं करेगा और किसी विशेष पार्टी की आलोचना नहीं होगी, इसलिए वे किसी चटपटी खबर की तलाश में थे। उनके लिए खबरों के लिहाज से उन पूर्व सैनिकों की रैली की कोई अहमियत नहीं थी जिन्होंने देश की सुरक्षा में अपने जीवन का अधिक हिस्सा गुजारा, लेकिन जिन्हें अब सरकार की बेरुखी और उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने महसूस किया कि देश को उन पूर्व सैनिकों की दुर्दशा बताए जाने की कोई जरूरत नहीं है जो लगभग तीन वर्षों से चुपचाप धरने पर बैठे हैं, अपनी न्यायपूर्ण मांगों को सामने रख रहे हैं और इस अवधि के दौरान उन्हें काफी दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा, काफी मेहनत से कमाई गई उनकी बहादुरी के तमगे तोड़ दिए, जंतर मंतर से बलपूर्वक उन्हें खदेड़ दिया गया, उन्हें गिरफ्तार किया गया, फिर भी उन्होंने अनुशासन और मर्यादा बनाए रखी। वे उस हद तक सही थे कि रैली शांतिपूर्ण थी, सारे पूर्व सैनिक अपने अधिकारों की मांग को लेकर बिल्कुल एकजुट थे, कंघे से कंघा मिला कर एक दूसरे के साथ सहयोग कर रहे थे और केवल उसी की मांग कर रहे थे जिनका वादा उनसे दशकों से किया जाता रहा है और जो आज तक पूरा नहीं किया गया।

रैली में सर्वसहमति से कुछ अहम फैसले लिए गए। पहला यह कि यह विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक ओआरओपी को पूरी तरह लागू नहीं किया जाता। इसकी वजह यह है कि इसके अधूरे कार्यान्वयन, जैसाकि वर्तमान में है, की वजह से सातवें वेतन आयोग के तहत अधिकृत पेंशनों पर अधिक प्रभाव पड़ा है। दूसरी बात यह कि बिना किसी विशेष राजनीतिक दल का नाम लिए, पूर्व सैनिकों से उन राजनीतिक दलों का समर्थन करने का आग्रह किया गया जिन्होंने वादे के अनुसार ओआरओपी को क्रियान्वित करने का वायदा किया था।

तीसरी बात यह कि यह देखते हुए कि अब कई राज्यों में चुनाव होने होने हैं, प्रत्येक राज्य में पूर्व सैनिक इस बारे में सूचना फैलाएंगे कि किस राजनीतिक पार्टी ने पूर्व सैनिकों की मांगे पूरी करने में सहायता करने का वादा किया था। ऐसी उम्मीद जताई जाती है कि पूर्व सैनिकों का वोट बैंक इतना प्रभावी जरूर बन जाएगा कि वह सरकारों को बाध्य कर सके कि वह उनकी न्यायपूर्ण मांगों को नजरअंदाज न कर सकें। चौथी बात यह कि पूर्व सैनिकों ने रेड्डी रिपोर्ट को जारी करने की मांग की जिस पर रक्षा मंत्रालय लगभग 18 महीने से कुंडली मार कर बैठा हुआ है और दावा कर रहा है कि वह इसका अध्ययन कर रहा है।

अंत में, रैली में युद्ध में शहीद होने वालों की विधवाओं तथा विकलांगों के बच्चों पर शिक्षा की अधिकतम सीमा निर्धारित करने, अधिकृत राशनों को बंद कर देने तथा वास्तविक विकलांगता वाले मामलों को सुप्रीम कोर्ट ले जाने, पूर्व सैनिकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने तथा पूर्व सैनिकों के लिए जीवन यापन कठिन कर देने वाले सरकार के कुछ कदमों पर भी सवाल उठाया गया।

इस विरोध प्रदर्शन को उस वक्त जरूर राष्ट्रीय कवरेज मिली थी, जब इसे आरंभ किया गया था, लेकिन उसके बाद से इसकी उपेक्षा ही की जाती रही है। सरकार उनकी मांगों को इसलिए नजरअंदाज कर सकी थी क्योंकि पूर्व सैनिकों का समुदाय एवं उनकी अगुवाई करने वाला संगठन, इंडियन एक्स-सर्विसमेन लीग आपस में बुरी तरह बंटे हुए थे। उन्हें प्रेस कवरेज तो नहीं ही मिला, वे सोशल मीडिया की ताकत का भी उपयोग करने में विफल रहे, जो प्रेस की तुलना में अब अधिक ताकतवर माध्यम बन गया है।

पाकिस्तान में सेना की ताकत को चुनौती देने वाला पीटीएम आंदोलन का हाल का उदाहरण इसका बहुत बड़ा सबूत है क्योंकि यह केवल सोशल मीडिया की बदौलत आगे बढ़ा। मीडिया तो सरकारी आदेश के कारण इस आंदोलन से दूर रही लेकिन इसके बावजूद हजारों की संख्या में भीड़ जमा हो गई। पूर्व सैनिकों के पास सोशल मीडिया के ऐसे बहुत से फोरम हैं, जिन पर उनकी मांगों, सरकार की उपेक्षा एवं भविष्य की उनकी कार्रवाई से संबंधित संदेश भेजे जा सकते हैं और ये केवल पूर्व सैनिकों के समुदाय को नहीं बल्कि उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखने वाले आम लोगों को भी भेजे जा सकते हैं। उन्होंने अभी तक इस महत्वपूर्ण स्रोत का उपयोग नहीं किया है।

सरकार के लिए एक आखिरी सवाल यह है कि उनकी न्यायोचित मांगों को मानने के लिए क्या वह पूर्व सैनिकों द्वारा अपनाए जा रहे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर कदम उठाएगी या इसके लिए लिए उन्हें जाट आंदोलन जैसे हिंसक आंदोलन का तरीका अपनाना पड़ेगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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