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कारगर है राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे का पुनर्गठन

एनएसए अजीत डोभाल

अभी हाल में कुछ फैसले लिए गए हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती से निपटने के भारत के तरीके में आए बदलाव को इंगित करते हैं। लंबे समय तक, भारत में उभरती चुनौतियों का आकलन करने और इसके लिए ‘संपूर्ण सरकार‘ के दृष्टिकोण का इजाद करने की कोई ठोस संरचना नहीं थी। भारत केवल हालात पर प्रतिक्रिया व्यक्त किया करता था और उसने कभी भी उभरते परिदृश्यों के लिए कोई विकल्प तैयार नहीं किया।





राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोवाल के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) को तीन उप एनएसए उपलब्ध कराने के जरिये सुदृढ़ बनाया गया है। उनके कार्यों का विभाजन कर दिया गया है और अब वे एक दूसरे के घनिष्ठ संपर्क में काम करेंगे। ये तीनों उप प्रमुख कूटनीतिक रणनीति, आंतरिक खुफिया और रणनीतिक प्रौद्योगिकीय मुद्वों पर नेतृत्व करेंगे। फैसला लेने की जिम्मेदारी अब एनएसए की होगी जो प्रधानमंत्री के आंख-कान माने जाते हैं और उनके सबसे करीबी सलाहकारों में से एक हैं।

इसके अतिरिक्त एनएसए के एक सैन्य सलाहकार का पद भी फिर से सृजित किया गया है। हाल ही में सेवा निवृत्त हुए एक जनरल को सैन्य सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। उनकी भूमिका सैन्य बुनियादी ढांचे, उपकरण, रणनीति तथा देश के शत्रुओं के खिलाफ बलों की तैनाती और हमारे अपने प्रभाव एवं हितों के क्षेत्र में बदलावों की निगरानी करने की होगी। इससे पहले वह रक्षा खुफिया एजेंसी के प्रमुख थे।

इसके अलावा एनएसए के तहत पहले रक्षा योजना समिति का गठन किया गया था। इसमें तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव, विदेश सचिव एवं वित मंत्रालय के व्यय सचिव शामिल हैं। इसका दायित्व मेक इन इंडिया रक्षा खरीद को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति तथा अंतरराष्ट्रीय रक्षा संबंधों पर प्रारूप् सिद्धांत तैयार करना है। यह सशस्त्र बलों के लिए क्षमता विकास के आधार का निर्माण करेगा। इसकी खामी यह है कि ऐसे संगठन ने रक्षा स्टाफ के एक प्रमुख की नियुक्ति करने एवं एकीकृत कमान तैयार करने सहित रक्षा के उच्चतर प्रबंधन में कोई भी सुधार करने से इंकार कर दिया है।

अगला मुद्दा रणनीतिक नीति समूह (एसपीजी) के पुनर्गठन का रहा है। पहले इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करते थे लेकिन इसकी शायद ही कभी कोई बैठक हो। यह भी एक बड़ा संगठन होगा और अब एनएसए के तहत कार्य करेगा। इस निकाय में कैबिनेट सचिव, नीति आयोग के अध्यक्ष, सेनाओं के प्रमुख, रिजर्व बैंक, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और खुफिया के प्रमुखों सहित महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सचिव होंगे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सभी मंत्रालय एवं संगठन अब भविष्य की नीतियों एवं उनके प्रति समान प्रतिक्रिया जताने के लिए समान मंच से और समेकित रूप से काम कर सकेंगे।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) का भी पुनर्गठन होता रहा है। पहले इसकी बड़ी संख्या थी, जिसे संभालना मुश्किल था और शायद ही कभी उसकी बैठक होती थी। यह केवल नाम का ही बोर्ड था। अब इसका पुनर्गठन कर इस केवल चार सदस्यों तक सीमित कर दिया गया है और इसके प्रमुख एक पूर्व भारतीय राजदूत हैं। इस बोर्ड में बाह्य खुफिया के पूर्व प्रमुख, चीन पर विशेषज्ञता रखने वाला एक सेवा निवृत्त सैन्य अधिकारी और एक प्रतिष्ठित कानून विश्वविद्यालय का प्रमुख भी शामिल है।

एक चीन केंद्रित थिंक टैंक का भी निर्माण किया गया है। इसकी स्थापना अंदरुनी स्रोतों के उपयोग के जरिये की जाएगी। सरकार के इरादे से प्रतीत होता है कि चीन निकट भविष्य में एक बड़ा खतरा होगा।

इन बदलावों से वह संजीदगी दिख रही है जिसके साथ सरकार अब अपने राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को देख रही है। आखिरकार, इसने सार्थक निकायों की स्थापना की है जो अंतःविभागीय सहयोग को बढ़ाने एवं भविष्य के खतरों एवं चुनौतियों से निपटने के लिए एक ‘समग्र सरकारी‘ दृष्टिकोण विकसित करने के लिए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत कार्य करेगा। अगर यह प्रभावी हुआ तो शत्रुओं को रोकने के लिए आवश्यक क्षमताओं के विकास को इससे काफी बढ़ावा मिलेगा।

जहां इस प्रकार के कदम की लंबे समय से आवश्यकता थीं। वहीं वर्तमान सरकार के कार्यकाल के आखिरी समय में इसके गठन से शायद ही कोई समस्या आएगी। राष्ट्रीय नेतृत्व अब जल्द ही चुनावी मोड में आ जाएगा और सारा ध्यान बाहरी से बदल कर घरेलू राजनीति की ओर मुड़ जाएगा। अगर वर्तमान सरकार फिर से सत्ता में आ जाती है तो वर्तमान में सृजित निकाय कारगर बना रहेगा और भारतीय दृष्टिकोण और तैयारी को और बढ़ावा मिलेगा। अगर सरकार बदल जाती है तो इसका वजूद स्वतः समाप्त हो जाएगा क्योंकि नई सरकार का नजरिया कुछ अलग भी हो सकता है।

भारतीय राजनीतिज्ञों को निश्चित रूप से यह समझना चाहिए कि जो संरचनाएं कारगर हैं और सुरक्षा की तैयारी को बढ़ाती हैं, उन्हें अवश्य जारी रहना चाहिए। भले ही उनके प्रमुख सरकार बदलने के बाद भले ही बदल जाएं। किसी भी ऐसे देश की यह निशानी है, जो अपनी धाक अपनी सीमाओं से आगे दुनिया भर में जमाना चाहता है। प्रतिशोधवश किसी बात का केवल इसलिए तिरस्कार करना कि यह उसके पूर्ववर्तियों ने किया था, एक निम्न मानसिकता का प्रतीक है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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