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क्या अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में आधा सच बयां किया ?

सुप्रीम-कोर्ट, सेना

सैन्य अधिकारियों द्वारा सरकार के खिलाफ दायर किए गए गैर-कार्यशील उन्नयन मामले में सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के अंतिम दिन के दौरान  दावा  किया गया है कि अटॉर्नी जनरल ने कुछ चौंकाने वाले बयान दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अधिकारी पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग हैं जो महलनुमा बंगलों में रहते हैं और आर्मी पब्लिक स्कूल, कैंटीन, निशुल्क रेल यात्रा, सैन्य सेवा वेतन और कई प्रकार की अन्य सुविधाओं का प्राप्त करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी टिप्पणियों को न्यायपालिका द्वारा खारिज किया जाएगा क्योंकि वे वास्तविकताओं से वाकिफ होते हैं।





इस अप्रिय बयान पर टिप्पणी करने से पहले कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। पहला सवाल, किसने उनसे ऐसी टिप्पणियां करने को कहा?  रक्षा मंत्री या उनके रक्षा सचिव ने? इस बात के आसार नहीं हैं कि उनके जैसा अनुभवी व्यक्ति बिना किसी निर्देश के ऐसी बेबुनियाद बात कहेगा।

दूसरा  ये कि टिप्पणियां सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं या नौकरशाही के नजरिये का? अगर यह सरकार का दृष्टिकोण है तो रक्षा मंत्री तथा प्रधानमंत्री का दीवाली पर जवानों से मिलना और उनके लिए लंबे चौड़े दावे करना सब ढकोसला है जिसका उद्वेश्य केवल वोट बटोरना है। अगर रक्षा मंत्री ने ऐसा नहीं किया है तो क्या उन्होंने अपने रक्षा सचिव को इसके लिए फटकार लगाई है? यदि नहीं तो ऐसा लगता है कि वह इस नजरिये का समर्थन करती हैं। इससे यह तथ्य भी सामने आता है कि सशस्त्र बलों के सकारात्मक प्रदर्शन के कारण सरकार द्वारा वोट मांगने का दिखावा नकली है और सच्चाई यही है कि सरकार सेना के दर्जे को नीचा करने पर तुली हुई है और इसलिए चुनाव में उसका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए।

अटॉर्नी जनरल द्वारा की गई टिप्पणियों की सच्चाई से राष्ट्र भली भांति अवगत है। यहां तक कि उनमें से अधिकांश का प्रतिवाद करना भी अपमानजनक होगा क्योंकि प्रत्येक भारतीय सशस्त्र बलों के बलिदानों तथा कठिन सेवा स्थितियों से परिचित है। ताज्जुब की बात है कि जिसने भी इन टिप्पणियों का प्रारूप तैयार किया है, उसने स्पष्ट रूप से चूक कर दी है। यहां केवल कुछ टिप्पणियों की ही व्याख्या किए जाने की जरूरत है।

पहली बात, आर्मी पब्लिक स्कूलों का संचालन सेना कल्याण शिक्षा सोसाइटी द्वारा किया जाता है जो एक स्वतंत्र संगठन है और सरकार के अंतर्गत नहीं है। इसकी स्थापना सैनिकों के बच्चों की सेवा के लिए की गई जिन्हें अक्सर एक जगह से दूसरी जगह पर जाना होता है। इसके विपरीत सैन्य कैंटीन सेवाओं से प्राप्त लाभ का उपयोग दिल्ली में संस्कृति स्कूल के वित्तपोषण एवं सहायता में होता है, जिसकी स्थापना मुख्य रूप से नौकरशाहों के बच्चों के लिए की गई है। अब सरकारी फंड का दुरुपयोग कौन कर रहा है, इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए ?

दूसरी बात, सशस्त्र बल घाटी और उत्तर पूर्व में गोलियों का सामना करते हैं जिसके लिए वित्तीय हिसाब से मुहैया कराया जाने वाला जोखिम कारक नौकरशाहों को उपलब्ध कराए जाने वाले जोखिम कारक की तुलना में 50 फीसदी से भी कम है। आज तक के इतिहास में कोई भी नौकरशाह कभी भी हताहत नहीं हुआ है। सशस्त्र बलों के हताहतों की संख्या के लिए आप केवल राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में जाएं और वहां टंगी लंबी सूची पढ़ लें। फिर भी नौकरशाहों की मांग भी अधिक है और उसे अधिक मिलता भी है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने घाटी में कार्यरत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए जोखिम भत्ते में बढ़ोतरी की है। सेना के लिए अभी इस पर विचार भी नहीं किया गया है क्योंकि नौकरशाही इसकी राह का एक बड़ा रोड़ा बना हुआ है। एक बार फिर से यह सवाल उठा खड़ा होता है कि कौन फंड का दुरुपयोग करता है और किसे सर पर चढ़ा कर रखा गया है?

यह वही नौकरशाही है जो सैन्य अभियानों, गोलीबारी में घायल या दुर्घटनाओं के कारण चिकित्सा आधार पर बाहर रहने वाले जवानों को एक वर्ष तक पेंशन जारी किए जाने में देरी करती है। हाल ही में डोगरा रेजीमंट के संजू राम का मामला, जो सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ, इसका एक बड़ा उदाहरण है। उन लागों के लिए तो और अधिक समय लगता है जो अभियानों में अपनी जिंदगी गवां बैठते हैं या जिन्हें मृत घोषित कर दिया जाता है जबकि उनके शव बाढ़ या हिमस्खलनों की चरम स्थितियों के कारण मिल नहीं पाते। ऐसे मामलों में नौकरशाही वित्तीय बकाया राशि जारी करने से पहले शव का सबूत मांगती है। स्पष्ट रूप से नौकरशाही एक संवेदनाविहीन संगठन है।

तीसरी बात, जहां सशस्त्र बल अधिकारियों का बमुश्किल एक प्रतिशत संयुक्त सचिव अधिकारी के समकक्ष पहुंच पाते हैं, सिविल सेवाओं में लगभग सभी अधिकारियों का उस रैंक तक पहुंचना तय है। इसके अतिरिक्त  इसमें शामिल सेवा की अवधि काफी भिन्न होती है। चूंकि नौकरशाही में प्रत्येक व्यक्ति 60 वर्ष तक सेवा करता है, पेंशन भी काफी अधिक होती है। सारा कुछ सिविल सेवाओं के पक्ष में ही है। इसलिए काल्पनिक आधारों पर सशस्त्र बलों के लिए कुछ लाभों को खारिज करने से लगता है कि वे समानता के सीमित अवसरों को भी नकार रहे हैं। अगर इससे नौकरशाही चिढ़ती है तो यह और कुछ नहीं है बल्कि उनकी अपरिपक्वता और बचपना है।

भारत की नौकरशाही को इस प्रश्न का उत्तर अवश्य देना चाहिए कि देश के सशस्त्र बल भारत के हैं, पाकिस्तान के हैं या फिर चीन के हैं? जिस प्रकार वे सशस्त्र बलों के लिए निर्धारित किसी भी चीज पर आपत्ति करते हैं, ऐसी धारणा बनती है कि वे उन्हें पाकिस्तान या चीन का मानते हैं। अगर वे मानते हैं कि वे भारत के सशस्त्र बल हैं तो फिर वे अपनी ही लड़ाई लड़ते क्यों रहते हैं?

मुझे पूरी उम्मीद है कि केंद्रीय रक्षा मंत्री से अटॉर्नी जनरल (एजी) द्वारा की गई इस टिप्पणी के लिए अवश्य सवाल किया जाएगा। उनके जवाब से साफ हो जाएगा कि किसने एजी को ऐसे बल की, जो प्रति दिन अपनी जान कुर्बान करते हैं, साथ ही या तो पाक स्थित आतंकी ठिकानों को नष्ट करते हैं या उन पुलों का स्थान लेने के लिए जिन्हें नौकरशाही ने ठेका दिया था और मंजूरी दी थी और जो जल्द ही ध्वस्त हो गए, की जगह नए पुलों का निर्माण करते हैं, की ऐसी नकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। उनका जवाब चुनावों से पहले ही मांगा जाना चाहिए जिससे कि सरकार का सच्चा चेहरा देश के सामने दिखाया जा सके।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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