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पूर्व सैनिकों की मांगें और राजनीतिक दल  

रिटायर्ड सतबीर सिंह

देश की सीमा और आंतरिक सुरक्षा में तैनात रहे पूर्व फौजियों और पूर्व अर्ध सैनिक बलों के जवानों के तमाम संगठनों द्वारा उचित मांगों को लेकर कई वर्षों से लगातार आवाज उठाने के बाद उन पर ध्यान न दिया जाना यह दर्शाता है कि या तो केंद्र सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देना चाहती थी या यह भी हो सकता है कि वह वन रैंक वन पेंशन (OROP) या अन्य दूसरी मांगों से सहमत न हो। दोनों ही स्थितियों में सरकार का यह रुख न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। अब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। उम्मीदवार शहर-गांव, घर-घर जाकर चुनाव जीतने के लिए वोट मांगेंगे, इन स्थितियों में पूर्व सैन्य परिवारों के मतों की कीमत बढ़ना स्वाभाविक है। आज देश में लाखों मतदाता ऐसे हैं जिनका सीधा संबंध सेना व सशस्त्र बलों में मौजूदा सैनिकों तथा रिटायर्ड जवानों-अफसरों के परिवारों से है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम चुनाव के बीच तथा देश की वर्तमान सैन्य परिस्थितियों को देखते हुए राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणा पत्रों में सैन्य परिवारों के लिए कुछ न कुछ वादा जरूर करेंगे। बेहतर तो यही होगा कि चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दल देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले सेना व सशस्त्र बलों के मौजूदा तथा अवकाश प्राप्त जवानों की उचित मांगों पर न्यायोचित घोषणा करे। और सरकार बनने पर उसे बड़ी शिद्दत के साथ लागू करे। राजनीतिक दलों का यह कदम सीधे तौर पर राष्ट्रहित के लिए होगा।





वर्षों से अपनी मांगों को लेकर पूरे देश के कस्बों, जिला मुख्यालयों, यहां तक कि राजधानी नई दिल्ली के संसद मार्ग और जंतर-मंतर में धरना प्रदर्शन कर रहे इन संगठनों का यह कहना भी स्वाभाविक है कि अगर कोई राजनीतिक दल उनकी मांगों को अपने घोषणा पत्र में शामिल नहीं करेगा तो इन लोकसभा चुनाव में ‘नोटा’ का प्रयोग करेंगे यानी किसी भी दल को वोट नहीं देंगे। इस कदम से उनके आक्रोशित मन को भलीभांति समझा जा सकता है। एक सैनिक चाहे जवान हो या अफसर अपनी इज्जत, इन्साफ व रूतबे के लिए समर्पित होता है। उसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है। वह राष्ट्र से इसके अलावा कुछ और नहीं चाहता। शासन व समाज के हर नागरिक के लिए उनकी मांगों पर ध्यान न दिया जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय होना चाहिए।

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पूर्व फौजियों को अनुशासित धरना जिस तरह पिछले तकरीबन चौदह सौ दिनों (हाल की पाकिस्तानी हलचल के बाद फिलहाल स्थगित) से चल रहा है वह मामूली बात नहीं है। तपती धूप, तेज बारिश, कड़कड़ाती ठंड की परवाह किए बगैर तीनों सेनाओं के हर रैंक के फौजी प्रतिदिन बिना नागा अपने सम्मान, अधिकार और प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार और समाज के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए। जिस देश का सैनिक सड़क पर अपनी मांगों की गुहार लगा रहा है उस देश के लिए यह शर्म की बात है। देश के हर नागरिक को यह बात कतई नहीं भूलनी चाहिए कि वह जान हथेली पर रख कर वह देश की स्वाभिमान तथा सरहद की हिफाजत करते हैं। ऐसा जज्बा, जोश व जुनून पूरी दुनिया में बहुत कम देखने को मिलता है। सैनिक के लिए देश सर्वोच्च इसलिए होता है कि वह देश से प्यार करता है और उसकी रखवाली के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान कर देता है। ऐसी भावना, ऐसा मनोबल अनूठा है। ऐसा पराक्रम व शौर्य अनुकरणीय है। अगर इन हालात के बीच वे अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हैं तो एक तरह से उनके मनोबल को डिगाने की बात कही जाएगी।

इसलिए जरूरी है कि राजनीतिक दल बड़ी ईमानदारी के साथ और अच्छी नीयत के साथ इनकी मांगों पर गौर करें तथा अपने-अपने घोषणा पत्रों में विधिवत शामिल करें। यह समय की मांग है। हमें यह भी याद रखना होगा कि सेना और सशस्त्र बलों की मौजूदगी सुरक्षा का एहसास कराती है। सुरक्षा का एहसास ही हमें खेती करने, पढ़ाई करने, कल-कारखानों में काम करने, राजनीति करने तथा शांतिपूर्व जीने का अवसर देता है। लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्व सैनिकों, सैनिकों तथा उनके परिवारजनों की संख्या निर्णायक भूमिका निभा सकती है इसमें कोई दो राय नहीं।

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