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रक्षा मंत्रालय को अपना नजरिया बदलने की जरूरत

CRPF
फाइल फोटो

पुलवामा घटना के बाद पूरा देश प्रतिशोध की भावना से दहक रहा था। सरकार के कूटनीतिक एवं आर्थिक कदमों से लोग संतुष्ट नहीं थे। उनका असर तो कुछ समय बाद दिखता। देश का तापमान आसमान छू रहा था। सरकार पर सियासी दबाव का जोर पड़ने लगा था। विपक्षी दलों ने टाइमिंग, प्रतिक्रिया और खुफिया तंत्र की विफलता को लेकर सरकार से सवाल करना शुरू कर दिया था और मांग करने लगे थे कि सरकार न केवल इसका प्रत्युत्तर दे बल्कि इसकी जिम्मेदारी भी ले। सरकार पहले से ही दबाव में थी और अब वह कठिनाई में घिरती नजर आ रही थी।





आम भारतीयों के लिए प्रतिशोध केवल सशस्त्र बलों के माध्यम से ही मुमकिन था। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना बनाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर छोड़ दी थी और वह खुद व्यक्तिगत रूप से इसे कार्यान्वित करने को मंजूरी देते। सशस्त्र बलों ने हमेशा की तरह अपने काम को अंजाम दिया और बिना किसी बड़े विध्वंस के, जिससे अंतरराष्ट्रीय रूप से देश की आलोचना होती एवं अंततोगत्वा अवांछित रूप से तनाव बढ़ता, निर्धारित लक्ष्य को नष्ट कर दिया।

ऐसा नहीं है कि वर्तमान सरकार के तहत ऐसा पहली बार हुआ हो। उड़ी के बाद, सरकार को उस छवि को बनाये रखने के लिए ऐसा प्रत्युत्तर देना जरूरी था जिस छवि को प्रधानमंत्री ने अपने पूरे अभियान के दौरान पेश किया था। यह भी एक तथ्य है कि सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानी हमले का जवाब देने की हमेशा ही इच्छा जताई थी लेकिन उस वक्त मौजूद सरकारें उनका हाथ बांध दिया करती थीं।

जहां सरकार ने सशस्त्र बलों को कार्रवाई करने की अनुमति दे दी थी लेकिन इस बात का जोखिम हमेशा था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए जिसका नकारात्मक नतीजा सामने आए। इसलिए पहले की सरकारें कदम उठाने से हिचकिचाती थीं और पाकिस्तान की करतूतों का जवाब नहीं देती थीं। यहां तक कि कारगिल के दौरान भी पाक की नाभिकीय गीदड़भभकियों को देखते हुए और तनाव बढ़ाने के अनिच्छुक वाजपेयी ने यहां तक कि भारतीय वायुसेना को भी नियंत्रण रेखा पार करने की इजाजत नहीं दी।

इसमें कोई शक नहीं कि अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने की सशस्त्र बलों की क्षमता के प्रति ऐसा अटूट विश्वास और भरोसे के लिए दृढ़ और मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता होती है जिसके लिए निश्चित रूप से प्रधानमंत्री को श्रेय दिया जाना चाहिए। इससे यह भी संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री मोदी उस सूरत में भी यह जोखिम मोल लेने को तैयार थे अगर इसमें विफल रहने पर आगामी चुनावों पर इसका असर पड़ता। बेहद निम्न दर्जे की राजनीति के इस दौर में खासकर, चुनावों के दौरान की गई एक भी गलती का विपक्षी दल बहुत अधिक लाभ उठा सकते हैं।

वायु सेना के सफल हमले के बाद, जिसे पाकिस्तान ने स्वीकार किया था, इस पर जवाबी कार्रवाई बिल्कुल संभावित था। यह जवाबी हमला अगले दिन सुबह वायु सीमा के उल्लंघन के रूप में सामने आया। इस पर जवाबी कार्रवाई की गई और पाक विमानों को निरस्त कर दिया गया और उन्हें सेना के शिविरों के पास लेकिन निर्जन क्षेत्रों में अपने पेलोड गिराने को मजबूर कर दिया गया जिससे कोई नुकसान नहीं हो सका। पाक के एक एफ-16 को मार गिराया गया लेकिन इसके बदले भारतीय वायु सेना ने एक मिग 21 बीआईएसओएन और उसके एक पायलट को भी खो दिया जो विमान के ध्वस्त होने के बाद पाक अधिकृत कश्मीर में पैराशूट सहित कूद पड़ा था और उसे पकड़ लिया गया। हालांकि अब वह रिहा हो चुका है।

सशस्त्र बलों ने कभी भी देश को नीचा नहीं दिखाया है और जब भी उससे कहा गया है  उसने अपना काम बखूबी अंजाम दिया है। सशस्त्र बलों के अभियानों की सफलता ने सरकार को प्रोत्साहित किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि सीमा पार हमलों के सफल संचालन से सत्तारूढ़ भाजपा सरकार आगामी चुनावों में अपनी और अपनी नीतियों को अधिक सकारात्मक तरीके से उजागर करने में सक्षम होगी, खासकर जब ऐसा चुनावों के करीब हुआ है।

बहरहाल कहा जा सकता है कि इसके साथ-साथ केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में रक्षा मंत्रालय अब भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों को दबा कर बैठा हुआ है जिससे सशस्त्र बलों के हौसले प्रभावित होते हैं। मंत्रालय अब भी सेना के उचित एवं मौलिक मांगों में देरी कर रहा है और उनकी अनदेखी कर रहा है। मंत्रालय ने उस सशस्त्र बलों के दर्जे को ही कम कर दिया है जिसने देश को गौरव प्रदान किया और शायद सरकार के लिए आगामी चुनावों को लड़ने का एक मजबूत फलक साबित होगा। सशस्त्र बलों को छोड़ कर सभी को गैर-कार्यात्मक उन्नयन प्रदान कर दिया गया जबकि सरकार उसके खिलाफ अब भी सर्वोच्च न्यायालय में लड़ाई लड़ रही है, और उसका दर्जा केंद्रीय सेवाओं के बीच सबसे निम्न बना हुआ है।

गृह मंत्रालय ने पहले ही सीएपीएफ के लिए जोखिम तत्व को उन्नत कर दिया है। हवाई हमले को लेकर जारी भारी उत्साह और सीमा पर तनाव बढ़ाने की पाक की कोशिशों को लगातार मुंहतोड़ जवाब देने के बावजूद, सशस्त्र बलों के लिए जोखिम तत्व में बढोतरी की दूर दूर तक कोई उम्मीद नहीं दिख रही। क्या केंद्रीय रक्षा मंत्री इस बात का इंतजार कर रही हैं कि सेना कोई प्रस्ताव सामने रखे जिस पर उसकी नौकरशाही महीनों तक बैठी रहे।

सेना के सामने और कई दूसरे मुद्वे हैं जिन पर अब सरकार को ध्यान देना चाहिए। सेना प्रमुखों द्वारा कई अवसरों पर इन्हें रक्षा मंत्रालय के सामने उठाया गया है लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ। ऐसा कब तक चलेगा कि जो सेना देश को गौरवान्वित करती है और जिसकी सफलता को भाजपा सत्ता में वापस आने के लिए भुनाने की उम्मीद कर रही है, उसका अपना ही मंत्रालय उसकी अनदेखी करे। और ऐसा इसलिए है क्योंकि नौकरशाही जो सरकार के भीतर की सोच पर आधिपत्य रखती है, उन प्रस्तावों को दबाये रहती है जिसका सेना के मनोबल पर प्रभाव पड़ता है।

क्या प्रधानमंत्री और केंद्रीय रक्षा मंत्री के लिए यह महसूस करने का समय नहीं है कि देश के जिस सशस्त्र बल ने देश का रुतबा और सम्मान बरकरार रखा है, उन्हें उनका वाजिब हक देने का समय आ गया है? अगर सरकार लगातार सेना को हल्के में लेती रहेगी और उनकी अनदेखी करती रहेगी तो जो समर्थन सशस्त्र बलों की सफलता के कारण सरकार को मिला है, वह चुनाव के नजदीक आते आते उसके खिलाफ चला जायेगा। केंद्रीय रक्षा मंत्री को निश्चित रूप से अब अपने खुद के मंत्रालय को स्पष्ट रूप से दिख रहे नकारात्मक दृष्टिकोण से काम करने के बजाये सकारात्मक तरीके से काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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