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जम्मू-कश्मीर पर फैसला उचित, लेकिन बदलाव का असर देखा जाना बाकी

जम्मू-कश्मीर पुलिस
फाइल फोटो

फैसला हो चुका है…

जम्मू-कश्मीर अब राज्य के भीतर राज्य नहीं रहा और अब इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया है। जहां 70 वर्ष की गलती को दुरुस्त कर दिया गया है, वहीं इस फैसले के असर को देखा जाना अभी बाकी है। इससे संबंधित कानूनी बाधाएं भी सामने आएंगी और सुप्रीम कोर्ट में इस कदम पर सवाल भी उठाए जाएंगे। कश्मीर घाटी स्थित राजनीतिक पार्टियां इसका विरोध करने में आगे रहेंगी।





जहां देश के ज्यादातर हिस्सों और लद्दाख में खुशी का माहौल है, कारगिल में मायूसी थी। घाटी में प्रतिक्रियाएं अभी कम दिखी क्योंकि यहां अभी भी कर्फ्यू जारी है। इसकी असली परीक्षा तब होगी जब कर्फ्यू हटेगा। 12 अगस्त को बकरीद है और उस दिन वहां भारी संख्या में लोग जुटेंगे। तब वहां कैसे हालात होंगे, यही असली परीक्षा होगी। क्या सरकार तब तक स्थानीय लोगों को इस फैसले के लाभों को ठीक से समझाने की व्यवस्था कर चुकी होगी, यह देखना अभी बाकी है।

कुछ सियासी परिवारों  के लिए यह कदम एक बड़े झटके के रूप में सामने आया है जो इसी अनुच्छेद के बल पर पनपते रहे हैं और जिन्होंने इस स्थिति को पूरी तरह अपने अनुकूल समझ लिया था। वे कई दशक तक स्थानीय आबादी को यही समझाते आ रहे थे कि कश्मीर और भारत के बीच वास्तविक संपर्क अनुच्छेद 370 ही है। उन्होंने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि इस अनुच्छेद के कारण कश्मीरियों का आरक्षण देश भर के लिए अनुकूल नहीं हो सका, इसने विकास को धीमा कर दिया और अनुच्छेद 35ए खुद उसके अपने नागरिकों एवं महिलाओं के लिए भेदभावपूर्ण था।

हुर्रियत और घाटी के सियासी दलों द्वारा खेला जा रहा एकमात्र खेल उनकी बहुसंख्यक दर्जे को गवां देने को लेकर था। इस बहुप्रचारित मुद्दे की न तो कोई प्रासंगिकता थी और न ही कभी होगी। राज्य के नागरिक होने के बावजूद जम्मू एवं लद्दाख के निवासी घाटी में कभी पैठ नहीं कर सके। केवल घाटी के निवासी इन जगहों पर बसते रहे। संशोधित बदलावों के बावजूद  केवल वही संगठन, जो विकास को बढ़ावा देना चाहते थे, जिनमें शुरू में अधिकांश सरकार नियंत्रित संगठन थे, घाटी में आकर उद्योग स्थापित कर सकते थे। एक निवासी के रूप में यहां उद्योग स्थापित करने में दशकों का समय लग जाता।

कश्मीर के भीतर  आम लोगों को इससे बहुत मतलब नहीं है कि यह अनुच्छेद हटा लिया जाता है या बना रहता है। वे अमन चैन चाहते हैं और आजीविका का साधन चाहते हैं। युवाओं को इसके लाभ के बारे में आश्वस्त किए जाने की जरूरत है जिन्हें दशकों से सीमा पार के फर्जी अफवाहों, मस्जिदों से मजहबी जिहाद की बातों और उनके स्थानीय नेताओं द्वारा अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए बरगलाया जाता रहा है। इन्हीं लोगों को सही संदेश के साथ लक्षित किए जाने की आवश्यकता है। इसे जल्द से जल्द कर लेना ही सरकार की असली चुनौती है।

दुनिया कश्मीर को लेकर भारत-पाक विवाद से वाकिफ है और कई देशों को भारत द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और इसकी वैधता के बारे में जानकारी दी जा चुकी है। इसकी वजह पाक द्वारा की जाने वाली किसी भी कार्रवाई को पहले ही रोक देना है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश करेगा। भले ही वह इसे लेकर कोई ठोस प्रभाव न डाल सके  लेकिन इससे यह क्षेत्र चर्चा में आ जाएगा। पाक सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर और अफवाहें फैलाने के द्वारा घाटी में भी प्रचारित करना चाहेगा।

हालांकि भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय के किसी भी सलाह या सुझाव को मना कर सकता है  जैसाकि इजरायल फिलीस्तीन की भूमि को हड़पने के मामले में करता है, लेकिन दोनों देशों की स्थिति समान नहीं है। अमेरिका इजरायल का जोरदार समर्थन करता है जबकि वर्तमान परिस्थितियों में पाक सेना की सहायता से अफगानिस्तान से हटने की हताश कोशिश कर रहा अमेरिका फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहेगा।

दुनिया के देश बहुत गौर से देख रहे होंगे कि भारत सरकार के फैसले को स्थानीय जनता किस प्रकार स्वीकार करती है। थोड़ी हिंसा या विरोध प्रदर्शन तक तो ठीक है लेकिन ज्यादा हिंसा भड़की तो फिर मुश्किल है। अगर भारत इस परीक्षा में सफल होना चाहता है तो उसे यह अवश्य सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा के उपाय पूरे चाक चौबंद हों और उन्हें सही तरीके से कार्यान्वित किया जाए। सुरक्षा बलों को अधिकतम संयम से काम लेने की सलाह दी जानी चाहिए।

वर्तमान राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने से जो  आएगा, उससे सुरक्षा बलों को लाभ पहुंचेगा। केंद्र सरकार लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिये लद्दाख को नियंत्रित करेगी और सुनिश्चित करेगी कि चीन और पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक संसाधनों में कोई कमी न आ पाए। इसकी पूरी संभावना है कि जम्मू एवं कश्मीर में सुरक्षा लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास बनी रहे जैसाकि दिल्ली तथा पुद्दुचेरी मॉडल में अपनाया गया है। इससे स्थानीय पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेन्सियों पर राजनीतिक दबाव में कमी आएगी। इससे आतंकवाद को नियंत्रित करने एवं कानून व्यवस्था कायम करने में मदद मिलेगी।

संक्षेप में, फैसला करना आसान कदम था। स्थानीय लोगों को इसके लाभों के बारे में बताना, उन्हें आश्वस्त करना कि यह कदम उनके फायदे के लिए है, एक मुश्किल काम होगा। इस के साथ-साथ  प्रतिबंध और कर्फ्यू हटने के बाद फर्जी अफवाहों और हिंसा को भड़कने से रोकना भी कठिन काम होगा। अगर सरकार ने पहले से इसकी योजना बना रखी है तभी यह एक सफल बदलाव होगा। आगे आने वाले दिन इसका जवाब दे देंगे।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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