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घाटी में खतरनाक चुनौती है युवाओं का भटका मन

सुरक्षा कर्मियों पर पत्थर फेंकती छात्राएं

श्रीनगर में बृहस्पतिवार को कई दिनों से बंद शैक्षणिक संस्थान जैसे ही लिखाई-पढ़ाई के लिए खोले गए वैसे ही विद्यार्थियों ने जगह-जगह पर झड़पों के बाद सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर उन पर पत्थर बरसाए। परेशान करने वाली बात यह रही कि इन घटनाओं में बड़ी संख्या में छात्राओं ने हिस्सा लिया। कश्मीर घाटी में केन्द्र व राज्य सरकार तथा सुरक्षा बलों के लिए यह एक खतरनाक चुनौती है। यह एक ऐसी चुनौती है जिस पर नए सिरे से दोनों सरकारों, घाटी में तैनात सभी सुरक्षा बलों और संपूर्ण सैन्य तंत्र को गहन चिंतन के बाद अविलंब काम करना होगा।





आज जम्मू-कश्मीर के युवाओं का भटका मन पूरे सूबे को बर्बादी के रास्ते की ओर ले जा रहा है। अधिकांश युवा खासतौर पर अधकचरी सोच व धर्मांधता की वजह से पूर्व में मारे गए शीर्ष आतंकवादियों को अपना ‘हीरो’ मानकर अलगाववादी तत्वों का साथ दे रहे हैं और अपनी ही जमीन को खून से सान रहे हैं। पूरी घाटी में अमन-चैन गायब है। विकास ठप है। नफरत और दहशत का माहौल है। जिंदगी बंदूकों के साये में है। क्या यह सामान्य हालात हैं? क्या सामान्य जीवन जीने और खुशहाली के साथ तरक्की के रास्ते पर चलने का यह समुचित रास्ता कहा जा सकता है? अलगाववादी, आंतक के हिमायती कट्टरवादी युवाओं के मन को भटकाकर अपना उल्लू सीधा करने में बेशक छिटपुट रूप से कामयाब हो रहे हों पर घाटी के नागरिकों खासतौर पर नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि जिन पगडंडियों और जिन रास्तों पर चलने के लिए वे पत्थरबाजी कर रहे हैं, आतंकी बन रहे हैं, आतंक को धर्म से जोड़ रहे हैं वहां सिर्फ बर्बादी है। घाटी में बहुत खून बह चुका है पर न तो आतंकवादियों को कुछ हासिल हो सका है और न पाकिस्तानपरस्त अलगाववादियों को।

हकीकत यह है कि आज वहां का अवाम परेशान और दहशत में है। पाक की गोलीबारी से स्थानीय ग्रामीणों की मौत हो जाती है। स्कूल बंद करने पड़ते हैं। आतंकी मुठभेड़ों में क्रास फायरिंग के दौरान चमन कही जाने वाली धरती के बाशिंदे मारे जाते हैं। आखिर यह सिलसिला कब खत्म होगा? यह सवाल घाटी के नागरिक अब खुद से करने लगे हैं। अधिकांश बाशिंदे यह महसूस करते हैं कि खून कश्मीर के साथ-साथ पूरे देश का भी बह रहा है। अब तो इसका खात्मा हो।

ऐसे में जरूरी है कि घाटी के युवाओं के भटके-बहके मन को सामान्य हालात पैदा करने के लिए वापस लाया जाये। जरूरी हो तो शैक्षणिक संस्थाओं, गांव-कस्बों में समूह अथवा एक-एक युवा की काउंसलिंग हो। एक-दो बार नहीं, लगातार। यह सही है कि प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के डीजीपी तक सूबे के युवाओं से हिंसा का रास्ता छोड़कर देश की मुख्यधारा से जुड़ने की अपील कर चुके हैं। पर अब ऐसे ठोस बुनियादी काम करने की जरूरत है जिससे युवा स्वयं को सूबे व देश की तरक्की में अपना योगदान देने की बात महसूस कर सके। उनके भीतर छिपी सकारात्मक प्रतिभा को बाहर निकालकर निखारना व तराशना होगा। उनके भटके मन में वह ख्वाब पैदा करने होंगे जो उन्हें स्वयं तथा धरती के स्वर्ग को खुशहाल बनाएं। वे किताबें, नक्शे, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय देने होंगे जो उन्हें समग्र राष्ट्र के साथ जुड़कर एकता का पाठ पढ़ाएं। और ऐसा काम धंधा और रोजगार देना होगा जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाए। काम जटिल और मुश्किल है पर करना होगा।

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