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नाटो के अस्तित्व को लेकर संकट ?

नाटो
फो सौजन्य- गूगल

लॉस एंजेल्स से ललितमोहन बंसल   

नार्थ एटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइज़ेशन (नाटो) के अस्तित्व को ले कर एक बार फिर संकट है। 29 सदस्यीय देशों के इस संगठन ‘नाटो’ के मुद्दे क्या हैं, क्या वास्तव में उन्हें रूस से कोई ख़तरा है ? अब जब नाटो सदस्य देश रूस से हाथ मिला रहे हैं और उसके साथ सैन्य और व्यापारिक समझौते करने में लगे हैं, तो फिर इस संगठन के अस्तित्व का औचित्य क्या है? सवाल है, अमेरिका को इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी मंसूबों के बावजूद सीरिया के उत्तर-पूर्व से अपनी सेनाएँ बुलाने का औचित्य क्या था? ऐसे में नाटो के सदस्य देश टर्की की सेनाओं के सम्मुख इस्लामिक स्टेट से लोहा लेने और पश्चिमी देशों की हिमायती कुर्दिश सैन्य दल को असहाय छोड़ देना कहां की समझदारी थी? फ़्रांसीसी राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रों ने तो सीधे सीधे तंज कस दिया कि पहले हम यह तो तय कर लें कि हमारा असली शत्रु कौन है? रूस अथवा आतंकवाद? माली में जब उसके सैनिक आतंकवादियों से लड़ रहे थे, तब नाटो के सदस्य देश कहां थे ? नाटो देशों में एकता और सामंजस्य का अभाव क्यों है? हमें रूस से ही ख़तरा है तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से सीधी बातचीत करने में हर्ज ही क्या है?





नाटो संगठन के सचिव स्टोलनबर्ग की स्थिति यह है कि वह अपने सदस्य देशों को नाटो के अस्तित्व की गरिमा तो समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन विवश हैं। उन्हें भय है कि लंदन के उत्तर पश्चिम वेटफ़ोर्ड में मंगलवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय ‘नाटो’ शिखर सम्मेलन में फिर कोई व्यवधान न खड़ा हो जाए। ब्रसेल्स सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो देशों के सैन्य बजट में सहभागी देशों की ओर से उनकी जीडीपी के न्यूनतम दो प्रतिशत धन राशि जमा नहीं कराए जाने पर जर्मनी, फांस, इटली सहित बड़े देशों को आड़े हाथों लिया था। संभव है सीरिया के उत्तर पूर्वी हिस्से से अमेरिकी सेनाएँ हटाए जाने के ट्रम्प के एकतरफ़ा निर्णय पर इस बार फ़्रांस सहित यूरोपीय देश ट्रम्प के साथ नोंकझोंक पर उतर आएं? सीरियाई  पड़ोसी टर्की के प्रधान मंत्री अर्दोगन रिसिपी रूस से एस- 400 मिसाइल सुरक्षा सिस्टम ख़रीदे जाने के कारण नाटो सदस्य देशों की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। अर्दोगन हाल में व्हाइट हाउस में ट्रम्प से मिले ज़रूर लेकिन टर्की सेनाओं की ओर से कुर्दिश सैन्य बल पर हमलों पर वह ‘अपने मित्र’ के नाम पर कुपित नहीं हो सके? रूस से सुरक्षा कवच एस- 400 के मामले को तो टाल ही गए। आख़िर क्यों?

सुना है अब चीन के ‘पांच जी नेटवर्क’ और हुवाए मोबाइल फ़ोन उपकरणों में ख़ुफ़िया अंदेशों को लेकर वह नाटो सदस्यों को आगाह करना चाहते हैं कि वे चीन के पांच जी नेटवर्क पर भरोसा न करें। यह मुद्दा सदस्य देशों को कितना गले उतरेगा, कहना मुश्किल है। लेकिन उनकी यह कोशिश ज़रूर होगी कि वह इतर बैठकों में जर्मनी, फ़्रांस और इटली आदि बड़े देशों के शासनाध्यक्षों को घुट्टी पिला पाएं। हां, मेज़बान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री से वह नहीं मिल रहे हैं ?

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