vishesh

जेलों की बदहाली और सुप्रीम कोर्ट की फटकार

कोर्ट का आदेश

देश की जेलों के दयनीय हालात पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार का केंद्र पर कितना असर होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा जेलों की बदहाली पर बार-बार की जा रही टिप्पणियां केंद्र के साथ-साथ राज्यों के लिए शर्मनाक, दुखद और चिंताजनक हैं। देश की सर्वोच्च अदालत का यह कहना कि अधिकारियों की नजर में कैदी इन्सान हैं भी या नहीं? कई सवाल खड़े करता है। खुले शब्दों में कहा जाए तो यह टिप्पणियां काहिली बनी सरकारों को कटघरे में खड़ा करती हैं। कई बार लगता है कि जेल प्रशासन, जिम्मेदार अफसरों और जवाबदेह सरकारों के मुखियाओं की नजर में जेल के कैदी इन्सान ना होकर, कुछ और हैं। तमाम नियम-कानूनों, कायदों, जेल मैनुअल में वर्णित बातों का पालन नहीं होता। खाना-पीना, रहना-सोना और कार्य स्थल आदि पर कैदियों के साथ हर जगह, हर कदम पर अमानवीय व्यवहार शायद इसलिए किया जाता है कि अफसरों, मतहतों की नजर में वे एक अपराधी हैं। रसूक, पहुंच, ठसक, दादागिरी वाले बंदी जेल परिसर में पूरे शानों-शौकत के साथ रहते हैं। और सामान्य कैदी बद्तर हालात में। आखिर जेल प्रशासन का ऐसा भेदभाव किस लिए ? क्या यह न्यायोचित है ?





देश की सबसे बड़ी अदालत की इस कटु टिप्पणी से भी जिम्मेदार, जवाबदेह नीति-नियंताओं और नौकरशाहों का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए कि ‘सारी चीजों को मजाक बना कर रख दिया गया है’। क्या कैदियों के कोई अधिकार नहीं हैं। कई सालों से पुताई नहीं हुई है, नल काम नहीं कर रहे हैं, शौचालय काम नहीं कर रहे हैं। कमोवेश पूरे देश की जेलों की सच्चाई नहीं है। हालात तो यहां तक हैं कि तमाम सुधारों, चर्चाओं और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों-आदेशों के बावजूद सुधार नहीं हुआ है। पिछले पखवाड़े नई दिल्ली की तिहाड़ जेल की हाई-रिस्क वार्ड के 15 कैदियों ने दिल्ली हाईकोर्ट को पत्र लिखकर जेल की सुरक्षा में लगी तमिलनाडु स्पेशल पुलिस पर मनावाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया था। वैसे भी देश की तमाम जेलों में आए दिन मारपीट हिंसा, हत्या, गैंगवार की घटनाएं अखबार की सुर्खियां बनती रहती है। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश की बागपत जेल के भीतर पूर्वांचल के माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की गोलियां से भूनकर की गई हत्या को इसी परिपेक्ष में देखने की जरूरत है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट बार-बार केंद्र व राज्य सरकारों को आईना इसलिए दिखा रहा है कि पानी सिर से गुजरता दिख रहा है। ऐसे में सरकारों को संवेदनशील मन से, गंभीरतापूर्वक और योजनाबद्ध ढंग से काम करने की जरूरत है। जेल परिसर के भीतर कैदियों के लिए सामान्य जीवन जीने की न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं है। ऊपर से आहत, पीड़ित, अशांत मन उन्हें आत्म हत्या जैसा कदम उठाने को विवश करता है। वर्ष 2015 का आंकड़ा यह बताता है कि उस साल 1584 कैदियों की जेल में मौत हुई। यानी औसतन प्रतिदिन 4 कैदियों की मौत। ऐसे में क्या यह सभ्य समाज, जिम्मेदार प्रशासन और सरकारों के लिए चिंता की बात नहीं होनी चाहिए ?

हमें इस बात पर जागरूक संवेदनशील मन से सोचना होगा कि कैदी भी इनसान है, जीते-जागते मानव हैं। यह ठीक है कि वह किसी अपराध की सजा में वह वहां पर कैद हैं लेकिन अगर कैद के दौरान उन्हें एक बेहतर, जिम्मेदार, संवेदनशील नागरिक बनाना है तो अमानवीय व बद्तर हालात में रखकर उनमें सुधार की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है? इस पर तत्काल सोचने और संवेदनशील मन से काम करने की जरूरत है।

Comments

Most Popular

To Top