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आइये, हम सब मिलकर तिरंगा फहराएं…

तिरंगा

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले के बाद बदले हालात और सरहद पर चुनौतियों के बीच पूरा देश आजादी की 73वीं सालगिरह मना रहा है। दिल्ली के लालकिले से लेकर देशभर के स्कूल, कॉलेजों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, चौराहों, गली-मोहल्लों में आजादी का जश्न मनाने का उत्साह तथा तैयारियां जोरों पर हैं। परेड, प्रभात फेरियों में शामिल होने की उमंग, राष्ट्रगान-झंडा फहराने का जोश भी महसूस किया जा रहा है। पर क्या एक दिन की उत्सवनुमा छुट्टी मनाकर हम वाकई अपने कर्तव्य का पालन कर पाते हैं? नहीं।क्या आपको नहीं लगता कि आजादी का यह ऐतिहासिक दिन 15 अगस्त देशवासियों को बड़े संघर्षों से नसीब हुआ है। इस दिन की बुनियाद में अनगिनत देशवासियों का सर्वोच्च बलिदान है, कुर्बानियां हैं, यातनाएं हैं, खून-पसीना है। इसलिए 15 अगस्त राष्ट्रीय पर्व ही नहीं, उन बलिदानी वीरों, महावीरों और परमवीरों की याद का भी पर्व है जिनकी बदौलत स्वतंत्रता मिली और आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। गुलामी और आजादी केवल शब्द नहीं हैं, यह महसूस करने की बातें हैं। बंधन या गुलामी कोई भी नहीं चाहता। इसलिए जरूरी है कि हम ईमानदार निष्ठा व अटूट समर्पण के साथ देशभक्ति की भावना से लबरेज रहें, अपने भीतर वह भाव पैदा करें जो राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने, संविधान का आदर करने तथा देश की हिफाजत में तैनात सैनिकों के सम्मान से जुड़ा हो।





देश-दुनिया की नई परिस्थितियों और चुनौतियों के बीच आज हम भारत के आजाद नागरिकों एक बात खासतौर पर समझनी और करनी होगी वह है संविधान और सेना का हर कीमत पर सम्मान। जिस तरह भारतीय संविधान की छाया में सभी नागरिक हर तरह से सुरक्षित हैं उसी तरह सेना, सशस्त्र बल, पुलिस के उच्च कर्तव्य पालन से हम चैन की नींद सो पाते हैं, अपना कारोबार कर पाते हैं, पढ़ाई कर पाते हैं। जब हम चैन की नींद सो रहे होते हैं तब ये जवान बर्फीली हवाओं, तपते रेत, दलदली इलाकों, जंगली-दुर्गम क्षेत्रों, गली-चौराहों में धूल-धुएं के बीच अपनी ड्यूटी निभा रहे होते हैं। जरूरत पड़ने पर सुनामी, भूकंप, बाढ़ के समय अपनी मुस्तैद ड्यूटी निभाकर वापस अपनी बैरकों में चले जाते हैं। यह उनकी निष्ठा और उनके अनुकरणीय अनुशासन को दर्शाता है। आजादी की 73वीं वर्षगांठ पर देश के हर नागरिक को इसी तरह का आचरण करने और कर्तव्य पालन करने की जरूरत है।

कश्मीर घाटी और नक्सली क्षेत्रों के युवाओं को भी अब सोचना होगा कि आजादी का मतलब वह नहीं जो वे सोच रहे हैं। उनका भटका मन उन्हें सिर्फ बर्बादी के रास्ते पर ही ले गया। आतंकी और नक्सली बनकर उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। सिवाए खून बहने के। दोनों ही इलाकों में काफी खून बह चुका है। संविधान के दायरे में रहकर सकारात्मक रुख के साथ चलकर ही अमन-चैन तथा विकास की इबारत लिखी जा सकती है। यही सच्चाई इस बार के 15 अगस्त के पर्व पर स्वीकार करनी होगी।

आजादी के इस राष्ट्रीय पर्व पर देश के नीति-नियंताओं को नई सोच और अवधारणा के साथ इस बात की बहस तेज करनी होगी कि सेना तथा संविधान सर्वोच्च है। बिना इनके हम सुरक्षित नहीं हैं। सैनिकों और जवानों के जज्बे का कोई सानी नहीं। आज समूची सेना तथा सैन्य बलों को सम्मान की जरूरत है। सरहद से सड़क और गांव की पगडंडी तक जब उन्हें सम्मान मिलता है तो उनका सीना चौड़ा हो जाता है। लिहाजा जहां भी सैनिक मिलें उनका सम्मान हो। और उनकी गैर मौजूदगी में उनके माता-पिता, बच्चों, भूमि विवाद या जिन मसलों पर भी सहयोग की जरूरत हो, उसे देश के प्रति अपना कर्तव्य मानकर अगर हर नागरिक अपनी ड्यूटी निभाएगा तो एक मायने में सैनिकों का यही सर्वोच्च सम्मान होगा। नए युवाओं को भी सीमा की हिफाजत के लिए फौज में भर्ती होने का जज्बा व जोश बनाना होगा। इस पावन पर्व पर सरकारों को जवानों, पूर्व जवानों से किए गए वायदों को निभाने की बात और तेजी से बढ़ानी होगी।

इस स्तंभ के माध्यम से हम यह बात फिर दोहराना चाहते हैं कि आइये हम सब सेना और सुरक्षा बलों को जानें…समझे और जुड़ें। तभी उपयोगी व सार्थक होंगे 15 अगस्त व 26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्व।

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