vishesh

डोकलाम में चीन की चाल उलटी पड़ी

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

डोकलाम में  चीनी सैनिकों को सडक़ बनाने से रोककर भारत ने बिना लड़े ही एक बड़ा युद्ध जीत लिया है। चीनी रणनीतिज्ञ अपने प्राचीन  चिंतक सुन चू  की रचना आर्ट आफ वार के  उस सिद्धांत का अनुसरण कर रहे थे जिसमें सुन चू ने कहा था कि युद्ध लडऩे की सर्वश्रेष्ठ  रणनीति वही है जिसमें दुश्मन को बिना लड़े ही पस्त कर दिया जाए।





लेकिन रोचक तौर पर खुद चीन को ही अपनी इस रणनीति का शिकार होना पड़ा।  भारत ने बिना लड़े ही चीनी सेना को वहां सडक़ बनाने से रोक दिया और चीनी सेना उस इलाके से अपने बुलडोजरों के साथ पीछे जाने को बाध्य हुई।
चीन ने इसी रणनीति के अनुरुप भूटान के डोकलाम इलाके से भारत को अपने सैनिक पीछे  हटाने की चाल चली लेकिन इसमें कामयाब नहीं हो पाया।

16 जून को भारतीय सेना ने डोकलाम इलाके में सडक़ बनाने  के साजसामान लेकर पहुंचे चीनी सैनिकों को वहीं रोक दिया था और तब से भारतीय सेना को वहां से हटाने के लिये चीनी रणनीतिज्ञों ने तरह-तरह की   डरावनी चालें चलीं। चीन ने सोचा कि जिस रणनीति का इस्तेमाल कर उसने दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस  को अपने द्वीपों पर दावा करने से रोक दिया वही रणनीति वह भारत पर भी लागू कर भारत को अपने सैनिक पीछे हटाने पर मजबूर करेगा लेकिन 28 अगस्त को जब भारत ने  एकपक्षीय एलान किया कि दोनों सेनाएं अपनी तैनाती के इलाके से पीछे हट गई हैं तो चीन के जवाबी बयान में शर्मिंदगी और  तिलमिलाहट साफ झलक रही थी।

चीन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रहा था कि भारत की रणनीति चीन पर भारी पड़ी और चीन को अपना ही थूका हुआ चाटना पड़ा। आखिर  भारत को रोज-रोज बंदरघुडक़ी देने वाला चीन अपनी जनता को किस  मुंह से बताये कि वह  भारतीय सेना का बाल तक बांका नहीं कर सका।
भारतीय सेना को डराने के लिये चीन ने एलान किया था  कि चीनी सेना ने अपनी मिसाइलें तिब्बत के इलाके में भेज दी हैं और अपने  टैंक और तोपें तिब्बत सीमा पर भेज कर इनसे युद्धाभ्यास कर रही  है। यह भी कहा गया कि तिब्बत के इलाके में जितने अस्पताल हैं वहां ब्लड बैंक का भंडार बढ़ाया जा रहा है ताकि  भारतीयों को यह अहसास दिलाया जाए कि चीनी सेना भारत से युद्ध करने के लिये आमादा है।  भारतीयों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए यह भी बार-बार कहा गया कि भारत 1962 के युद्ध से सबक ले।
भारत ने इन धमकियों और बंदरघुड़कियों का रत्ती भर भी जवाब नहीं दिया। खुद भारतीय सामरिक पर्यवेक्षक भी हैरान थे कि चीन रोज-रोज भारत को डराने के लिये तरह-तरह के बयान दे रहा है और भारत  ने इन पर पूरी चुप्पी क्यों साधी हुई है। चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी का यह वाकयुद्ध वैसे ही था जैसे जंगल में विचरण करते  किसी हाथी पर कुत्ते भौकें और हाथी अपने मस्त अंदाज में बिना पीछे मुड़े आगे बढ़ता जाए। चीनी भी हैरान थे कि आखिर भारतीय हाथी डर क्यों नहीं रह रहा है।   शायद यह भारत की आर्थिक, कूटनीतिक और परमाणु ताकत ही थी जिसके बल पर भारत चीन से लोहा लेने को तैयार था और  जिसका चीन ने सही आकलन नहीं किया।

Comments

Most Popular

To Top