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भारत-जापान की एकजुटता से चीन होगा परेशान

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

एक कहावत है दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। अंतरराष्ट्रीय  रिश्तों में उतार चढ़ाव में भी यह कहावत काफी सटीक बैठती है। चीन के दुश्मनागत वाले तेवर के  खिलाफ जिस तरह भारत और जापान एकजुटता दिखा रहे हैं वह इसी की एक मिसाल पेश करता  है। 13 और 14 सितम्बर को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे का अहमदाबाद दौरा केवल बुलेट ट्रेन के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिये। भारत और जापान के प्रधानमंत्री इसके पहले पिछले तीन सालों में दस बार मुलाकात कर चुके हैं लेकिन अहमदाबाद की शिखर बैठक की कुछ अलग ही  सामरिक अहमियत है जिसका अंतरराष्ट्रीय  राजनीति पर दूरगामी असर पड़़ेगा।





भारत और जापान के बीच गहराता सामरिक रिश्ता इसीलिये चीन के लिये भारी  चिंता की बात है  क्योंकि  दोनों देशों की एकजुट ताकत के सामने चीन की दादागिरी नहीं चलेगी। वास्तव में भारत और जापान की एकजुटता देख कर चीन से त्रस्त दूसरे देश भी चीन के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाने लगे हैं। सबसे ताजा मिसाल है इंडोनेशिया की जिसने दक्षिण चीन सागर से लगे अपने तटीय इलाके में नातुना द्वीप पर चीन के दावे को ठुकरा दिया है।

मोदी-शिंजो शिखर बैठक से चीन को एक बार फिर यह सख्त संदेश मिलेगा कि उसकी दादागिरी से मुकाबला करने के लिये दूसरे देश भी लामबंद होंगे। भारत औऱ जापान की तरह दक्षिण पूर्व एशिया के दूसरे देश भी एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के बल पर चीन लाओस और कम्बोडिया जैसे देशों के जरिये दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के बीच एकता को भंग करने में कामयाब हो रहा है लेकिन चीन की कुटिल चाल अधिक दिनों तक नहीं चलेगी।

अपनी सैन्य और आर्थिक विस्तारवादी रणनीति के तहत ही चीन ने वन बेल्ट वन रोड की महत्वाकांक्षी योजना चलाई है लेकिन भारत और जापान ने जिस तरह इसकी काट पेश की और अफ्रीका के लिये ओबोर की  एक वैकल्पिक योजना एशिया अफ्रीका विकास गलियारा के तौर पर पेश की है वह चीन के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकती है। अफ्रीकी देशों को अब पता लगेगा कि ओबोर के जरिये चीन सम्पर्क मार्गों का  महज जमीनी और समुद्री जाल बिछा रहा है जिसका एकमात्र लक्ष्य एशिया और अफ्रीका के गरीब पिछड़े देशों में अपना घटिया सस्ता माल भेजकर वहां के बाजार पर कब्जा करना है लेकिन जब इन छोटे देशों को एक दिन पता लगेगा कि एशिया अफ्रीका ग्रोथ कारिडोर के जरिये भारत और जापान उनके गरीब लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करना चाहते  हैं तो चीन के असली मंसूबे उजागर हो जाएंगे।

भारत और जापान की एकजुटता की आंच दक्षिण चीन सागर में चीनी प्रभुत्ववादी रणनीति पर भी पड़ेगी। दक्षिण चीन सागर से होकर भारत का आधा से अधिक आयात निर्यात होता है इसलिये दक्षिण चीन सागर पर यदि चीन अपना प्रभु्त्व बनाने में कामयाब हो गया तो न केवल भारत बल्कि जापान अमरीका जैसे दूसरे बड़े व्यापारिक देशों के आर्थिक हितों पर भी भारी असर पड़ सकता है। सैन्य टकराव की हालत में चीन दक्षिण चीन सागर से हो कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बाधित कर सकता है। लेकिन भारत और जापान के बीच यदि सामरिक दोस्ती गहरी  हुई तो दोनों देश साथ मिल कर अपने सामरिक औऱ आर्थिक हितों की मिल कर रक्षा कर सकते हैं।

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