vishesh

आतंकवाद पर केन्द्र की सीधी नजर 

त्राल में मुठभेड़
फाइल फोटो
केन्द्र में शपथ ग्रहण के बाद अब सरकार की सीधी नजर आतंकवादियों पर है। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय 250 आतंकियों की नई सूची बन कर तैयार है जिस पर सुरक्षा बल कारगर रणनीति बना कर आतंकवादियों के खात्मे की तैयारी कर चुके हैं। केन्द्र के ये तेवर घाटी में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए सराहनीय कहे जाएंगे। पदभार संभालने के बाद नए केन्द्र गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा बलों को जिस तरह संयम की नीति अपनाने के बजाय आक्रामक रणनीति के निर्देश दिए हैं उससे यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि कश्मीर और आतंकवाद पर केन्द्र की सीधी नजर है तथा यही तेवर बने रहे तो घाटी में आतंकवाद जल्द दम तोड़ देगा। बीते कई दशक से घाटी में आतंकवाद ने अपना ऐसा फन फैला रखा है कि वहां सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक जीवन पटरी पर नहीं है। स्थितियां तो यहां तक हैं कि मौजूदा युवा पीढ़ी ने सामान्य हालात नहीं देखे हैं। यह भयावह है।
दरअसल घाटी में आतंकवाद कुल मिलाकर सीमा पार की देन है। जिसके लिए केन्द्र सरकार आतंक के फन को कुचलने के लिए एक कारगार रणनीति के तहत काम कर रही हैं। बीते दिनों में सीमा पार और सीमा के भीतर आतंक का खात्मा बहुत सोच-समझ कर किया जा रहा है। पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान डरा-सहमा तो है पर पूरी तरह सुधरा नहीं है। वह अभी भी आतंक को हवा देने में पीछे नहीं है। खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने आजाद कश्मीर में 16 आतंकी शिविर बनाए हैं और वहां भारत में घुसपैठ की ट्रेनिंग दी जा रही है। एक तरफ प्रधानमंत्री इमराऩ खान भारत से संबंध सुधारने के लिए अपनी जमीन पर भारत के खिलाफ आतंक को हवा न देने की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ ऐसे कारनामे इस बात के लिए पर्याप्त हैं कि भारत सजग-सतर्क रहे। पाकिस्तान को अब यह समझना होगा कि भारत की निगाह उसकी हर गतिविधि पर है और कान उसकी हर बात पर हैं। उसे यह बात भी गांठ बांधनी होगी कि नए जनादेश के बाद का यह नया भारत है। पलट कर ऐसा प्रहार करेगा कि दुश्मन की समझ में ही न आ पाए।
कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों द्वारा आये दिन आतंकी कमांडरों तथा आतंकवादियों को मौत के घाट उतारे जाने के बाद भय का माहौल है। फरवरी में पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षा बलों ने जैश-ए-मौहम्मद आंतकी गुट के खिलाफ ऐसी कारवाई की इस संगठन का जिम्मा संभालने के लिए घाटी में कोई आगे नहीं आया। पिछले दिनों आतंकी जाकिर मूसा के मारे जाने के बाद भी युवाओं में दहशत है। इस साल के पिछले पांच महीनों में 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए, जिसमें 23 विदेशी थे। अभी जो 250 सक्रिय आतंकियों की सूची बन कर तैयार है उनमें 10 मोस्ट वांटेड हैं। मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बल आतंकवादियों से आत्मसमर्पण के लिए बार-बार कहते हैं लेकिन ऐसा न करने पर जवाबी कारवाई में वे मारे जाते हैं। सुरक्षा बल सोची-समझी धारदार रणनीति के तहत इसलिए काम करते हैं कि घाटी में आतंक का खात्मा हो। आतंकी संगठनों में स्थानीय युवाओं की भर्ती न हो। सेना यह संदेश देती है कि जो बन्दूक उठाएगा मारा जाएगा। केन्द्र सरकार के तीखे तेवर भी इसी बात की ओर इशारा करते हैं। नए केन्दीय गृह मंत्री अमित शाह का सुरक्षा बलों के प्रमुखों को यह संकेत कि वे आलोचनाओं से बेपरवाह होकर जीरो टॉलरेन्स नीति पर काम करें, घाटी में आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए काफी है। लिहाजा ब्रेन वॉश के बाद बंदूक थामने वाले युवकों, भटके युवाओं और पत्थरबाजों को भी ठंडे दिमाग से समझना होगा कि कई दशक से आतंक की राह पर चलकर उन्हें आखिर क्या हासिल हुआ? अमन-चैन और खुशहाली तो बातचीत के रास्ते पर ही चलकर आएगी। जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं और बाशिंदों को यह बात खुद तथा बच्चों को समझाने की जरूरत है।





Comments

Most Popular

To Top