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पूर्व सैनिकों की मांगों पर केंद्र तत्काल ध्यान दे

जंतर-मंतर पर पूर्व सैनिक

भारत की तीनों सेनाओं से जुड़े पूर्व फौजियों का नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा शांतिपूर्ण धरना 1300वें दिन में प्रवेश कर लेने के बाद कहा जा सकता है कि या तो केंद्र सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देना चाहती या यह भी हो सकता है कि वह उनकी वन रैंक वन पेंशन की मांग से सहमत ना हो। वरना अब तक रेड्डी रिपोर्ट लागू हो चुकी होती। दोनों ही स्थितियों में केंद्र सरकार का रुख न्याय संगत नहीं है। यह सही है कि केंद्र सरकार ने पौने पांच साल में सेना के मनोबल बढ़ाने का काम किया है। प्रधानमंत्री स्वयं दीवाली समेत कई अवसरों पर सेना के जवानों के बीच अपनी छाप छोड़ते रहे हैं। ऐसे में बेहद जरूरी है कि प्रधानमंत्री स्वयं पहल करें और वायदे के मुताबिक वन रैंक वन पेंशन लागू करें जिसकी परिभाषा केंद्र सरकार संसद में बता चुकी है।





कल (4 जनवरी)  पूर्व फौजियों का अनुशासित धरना जिस तरह 1300वें दिन में प्रवेश कर गया वह मामूली बात नहीं है। कड़कड़ाती ठंड, तेज बारिश, तपती धूप की परवाह किए बगैर तीनों सेनाओं के हर रैंक के फौजी प्रतिदिन बिना नागा अपने सम्मान अधिकार व प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ रहे हैं। केंद्र सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। जिस देश का सैनिक सड़क पड़ अपनी मांगों की गुहार लगा रहा है उस देश के लिए निश्चय ही शर्म की बात है। देश के प्रत्येक नागरिक को यह बात कतई नहीं भूलनी चाहिए कि वह जान हथेली पर रखकर वे देश के स्वाभिमान तथा सरहद की हिफाजत करते हैं। ऐसा जज्बा, जोश व जुनून, पूरी दुनिया बहुत कम देखने को मिलता है। सैनिक के लिए देश सर्वोच्च इसलिए होता है कि वह देश से प्यार करता है और उसकी रखवाली के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान तक कर देता है। ऐसी भावना, ऐसा मनोबल अनूठा है। ऐसा पराक्रम व शौर्य अनुकर्णीय है। इन हालात के बीच अगर आज फौजी अपनी मांगों को लेकर पूरे देश के राज्यों, जिला मुखालयों में सड़कों पर हैं तो एक तरह से उनके मनोबल को डिगाने की बात मानी जाएगी। ऐसा धरने पर बैठे पूर्व फौजी मुखर शब्दों में मानते भी हैं। मौजूदा केंद्र सरकार और विपक्ष (पूर्ववर्ती सरकार) को राजनीति का लबादा ओढ़े बगैर खुले मन से सोचना होगा कि ये पूर्व सैनिक केवल वही मांग कर रहे हैं जिसका वादा उनसे कई दशक से किया जा रहा है।

OROP के 1300वां दिन

केंद्र सरकार को बड़ी शिद्दत के साथ अपनी मांगों पर गौर करना चाहिए, यह समय की मांग है। यहां पर सवाल पूर्व व वर्तमान सैनिकों की संख्या का नहीं बल्कि उचित मांगों का है। हमें यह याद रखना होगा सेना व सैन्य बलों की मौजूदगी सुरक्षा का एहसास कराती है। सुरक्षा का एहसास ही हमें खेती करने, पढ़ाई करने, कल-कारखानों में काम करने, राजनीति करने तथा शांतिपूर्ण जीने का अवसर देता है। और संख्या की दृष्टि से भी वह कई लाख हैं। गौरतलब है कि इन्हीं पूर्व सैनिकों ने पिछले साल 20 मई को जंतर-मंतर पर देश भर से आए तीनों सेनाओं के तकरीबन 5,000 जवानों की रैली में यह फैसला लिया था कि उनका हित चाहने वाले राजनीतिक दल को ही समर्थन मिलेगा। हाल ही में राज्यों के हुए चुनाव के बाद इसी महसूस भी किया जा सकता है। आने वाले समय में पूर्व सैनिकों, सैनिकों तथा उनके परिवारजनों की और भी निर्णायक भूमिका हो सकती है। अलावा इसके इस बात की भी उम्मीद की जा रही है कि पूर्व सैनिकों का वोट इतना प्रभावी जरूर बन जाएगा कि आसानी से कोई राजनीतिक दल उनकी मांगों को नदजअंदाज नहीं कर सकेगा।

उधर अर्ध सैनिक बलों का संगठन ‘कंफेडेरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन’ भी लगातार पूरे देश में आक्रोशित मन से साफ तौर पर कह रहा है कि वोट उसी को मिलेगा जो हमारी मांगों को अपने घोषणा पत्र में शामिल करेगा। देश मौजूदा दौर में सुरक्षा से जुड़ी तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार को सेना और अर्ध सैनिक बलों के पूर्व जवानों की मांगों पर देश हित में समझने तथा उन्हें पूरा करने की पहल करनी चाहिए।

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