vishesh

घाटी में आतंक का सफाया ही हो केंद्र का लक्ष्य

BSF जवान

जम्मू-कश्मीर में चार साल पुरानी गठबंधन सरकार गिरने तक हालात इस कदर बद से बदतर थे कि आतंकी हिंसा चरम पर थी। ना बोलने, लिखने की आजादी और ना किसी की सुरक्षा। सरहद के गांव से लेकर राजधानी श्रीनगर और जम्मू में आतंक व खौफ के साए में चलना लगभग सबका मना। ऐसे में सूबे में राज्यपाल शासन और केंद्र सरकार की आतंकवाद के खात्मे को लेकर की जा रही नई तेवर भरी पहल और उठाए गए रणनीतिक कदमों से इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि अब आने वाले दिनों में घाटी में आतंकवादियों की खैर नहीं। जो दिखाई भी दे रहा है। लेकिन अगर ऐसे धारदार कदम पहले उठाए जाते तो सेना और वहां के समाज को कम नुकसान उठाना पड़ता और हालात बेहतरी की तरफ और पहले बढ़ होते।





पर रमजान के बाद जिस तरह केंद्र सरकार ने अपनी कार्यनीति व रणनीति बदली तथा तेज तर्रार अफसरों, सूझबूझ वाले अधिकारियों और विशेष ऑपरेशन के लिए एनएसजी कमांडो की तैनाती का त्वरित फैसला लिया है उससे साफ है कि वह जम्मू-कश्मीर में स्पष्ट सोच के साथ आतंकवाद का पूरी तरह सफाया कर शांति बहाली करना चाहती है। इस बात में दो राय नहीं कि केंद्र सरकार का एक ही लक्ष्य है कि सूबे में आम आदमी की जिंदगी वापस पटरी पर आए, वहां के नागरिक गुणवत्ता भरा जीवन जीने लगें और मुख्यधारा से जुड़कर युवा अमनचैन के साथ खुशहाल व सामान्य जीवन जी सकें। पर घाटी में आतंकवाद के पूरे सफाए के लिए सरकार, सेना व सुरक्षाबलों के सामने पहले की ही तरह कई चुनौतियां हैं जिनसे पार पाना होगा। सबसे बड़ी चुनौती है स्थानीय युवाओं का बंदूक-राइफल थामकर आतंकवादी बनना। फिलवक्त जम्मू-कश्मीर में 210 आतंकवादी सक्रिय हैं।

दरअसल पाकिस्तान में लंबे समय से आतंकी गतिविधियों में लिप्त होकर घाटी में आतंकी घुसपैठ कराने और स्थानीय युवाओं को आतंकी बनाने का काम कर रहा है। यह बात पूरी दुनिया जानती है। एक समय सक्रिय आतंकवादियों का यह आंकड़ा 250 तक पहुंच गया था। लेकिन 210 सक्रिय आतंकियों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें सबसे ज्यादा दक्षिण कश्मीर के इलाकों में सक्रिय हैं इनमें से 65 फीसदी स्थानीय हैं और 35 फीसदी सीमा पार से आए आतंकवादी हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों की है। इसी गुट के आतंकवादी ज्यादा सक्रिय हैं। इसके बाद लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के हैं। एजीयू और अलबदर के कुछ गिने-चुने आतंकवादी हैं। इसलिए सक्रिय आतंकवादियों के खात्मे के साथ-साथ अब स्थानीय युवा आतंकवाद का रास्ता ना चुनने पाएं इस बात के लिए सभी को युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। यह सही है कि पिछले साल घाटी के 128 नौजवानों ने आतंकवाद को अपना पेशा बना लिया था और इस साल अब तक 55 नए लोग आतंकी संगठनों में शामिल हुए हैं। लिहाजा राज्यपाल शासन के दौरान विशेष ध्यान देकर भूले-भटके युवाओं को वापस लाने का काम सधे कदमों के साथ तेजी से करना होगा।

मौजूदा हालात में जिस तरह सुरक्षा एजेंसियां नई रणनीति तथा नए सैन्य व्यूह के साथ मुहिम को अंजाम दे रही हैं उसी तरह राज्य तथा पूरे देश की राजनीतिक पार्टियों को घाटी में व्याप्त आतंकवाद पर ‘राजनीति’ न करने की कसम खानी होगी। राजनेताओं को संयम बरतना होगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज तथा गुलाम नबी आजाद को आत्मघाती बयान देने से बचना होगा। खास तौर पर तब जब जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा राज्य की बेहतरी के लिए राजनीतिक नेताओं से सहयोग का आग्रह कर रहे हैं। आतंकवाद व नक्सलवाद के खात्मे का मुद्दा एक राष्ट्रीय मुद्दा है इनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई देश विरोधी तत्वों के विरुद्ध है।

जरूरी यह भी है कि सूबे में राज्यपाल शासन के दौरान हुई पुरानी गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ने की विशेष जरूरत है क्योंकि देखा गया है कि जब जब वहां राज्यपाल शासन लगा है अलगाववादियों को लाभ मिला है। लंबा राज्यपाल शासन लोकतांत्रिक संस्थाओं को पूरी आजादी के साथ स्वाभाविक रूप से काम करने में रुकावट बनता है। आतंवादियों के खात्मे के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशनों के दौरान यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राज्य की जनता का नुकसान न होने पाए।

Comments

Most Popular

To Top